प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मैं पिछले सोलह सालों से विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ा रही थी। तो पिछले एक साल से मेरा बिलकुल मन नहीं था, अपनी सेवा को जारी रखने का। तो मैंने एक भयभीत दृश्य देखा। मेरे आसपास, जहाँ पर मैं रहती हूँ; वहाँ पर जानवरों पर बहुत अत्याचार होते हैं। ख़ासतौर पर गायों पर और जो गली के सामान्य जानवर हैं। तो अब मैंने अपनी नौकरी से अन्ततः अपना मन बना लिया है कि मैं उसको जारी नहीं करूँगी। और पशुओं के लिए, जानवरों के लिए मैं कुछ करना चाहती हूँ। मन में मेरे बहुत सारे द्वन्द हैं कि ये सही रहेगा या नहीं रहेगा। पिछले एक वर्ष से मैं आपको सुना रही हूँ लगातार। और मेरे पति तो काफ़ी मेरा, मेरी बात को वो समर्थन करते हैं कि मुझे अब उसको छोड़ देना चाहिए। और जो मेरा मन करे वो उसको करना चाहिए।
आचार्य प्रशांत: आप आगे बढ़ें। और बार-बार अपनेआप से यही पूछ लें कि दोनों तलों पर लाभ है न, और किस तल पर कितना। एक तल पर तो आपको ये लाभ होगा कि व्यक्तिगत तौर पर आपको थोड़ा हल्कापन लगेगा; थोड़ा आनन्द लगेगा; ग्लानि की भावना थोड़ी कम रहेगी। कुछ ग़लत हो रहा हो; उसको देखते रहो और उसके बारे में कुछ करो। नहीं तो भीतर एक अपराधभाव आ जाता है। जब आप कुछ करने लगेंगे तो अपराधभाव थोड़ा कम हो जाएगा। तो ये सब आपके व्यक्तिगत लाभ हो गये। और दूसरा लाभ उन जानवरों को होगा। तो आपको देखना है कि ऐसा तो नहीं है कि इनमें से एक ही लाभ हो रहा हो। दोनों लाभ आवश्यक हैं। और इन दोनों लाभों में भी वरीयता किसको देनी है? जो बड़ा सामाजिक कारण है। समाज में मैं पशुओं को भी शामिल कर रहा हूँ। उनको भी हम कह सकते हैं न एनिमल पीपल। तो उनको भी शामिल कर रहे हैं एज़ पीपल। तो आप जो करें उसमें आपको तो लाभ हो ही। आपसे ज़्यादा लाभ उनको हो। ठीक है?
मैं सावधान इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि कई बार ये जो सामाजिक सक्रियता होती है; सोशल एक्टिविज्म; वो स्वयं को फील गुड (अच्छा लगना) कराने का एक बहाना बन जाती है। उसमें समाज के लिए तो जो आप करते हैं; सो करते हैं। समाज से ज़्यादा फिर अपने लिए कर रहे होते हैं। उसमें ऐसा हो जाता है कि समाज को पाँच रुपये का आपने लाभ पहुँचाया और अपने भीतर जो अहम् बैठा था उसको पिच्चानवे रुपये का लाभ पहुँचा दिया। वो नहीं होना चाहिए। वो होता है इसलिए आपको मैं पहले ही सावधान करे दे रहा हूँ।




