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दूसरों पर निर्भर गृहस्थ महिला कैसे बढ़े मुक्ति की ओर? || आचार्य प्रशांत, संत लल्लेश्वरी पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
17 min
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प्रश्न: आचार्य जी, लाल देद कह रही हैं, "देखते हुए अनदेखा करो; जानते हुए से अंजान बनो; और सुनते हुए को अनसुना करो," वैसे ही मैं एक गृहणी होते हुए किस तरीके से अपने अध्यात्म की ओर बढ़ रहे सभी क़दमों को अनदेखा कर सकती हूँ? क्या उनको अनदेखा करना ही मेरे लिए सही रास्ता है?

आचार्य प्रशांत: देखने के तरीक़े होते हैं; अनदेखा करने के लिए तो आँख बंद करनी होती है। कोई पूछे कि - "कैसे देखें?” तो मैं कहूँ कि फलानी जगह पर जाकर देखो। आप पूछें कि - "कुतुब मीनार कैसे देखें?” तो मैं क्या कहूँगा? मैं तरीक़ा बताऊँगा। मैं कहूँगा कि - "सुबह-सुबह ऐसे गाड़ी करिए, फिर वहाँ जाइए, फिर इतने बजे खुलता है, फिर टिकट लीजिए, फिर खड़े हो जाइए तो कुतुब मीनार दिखाई देगी।” आप मुझसे पूछिए कि - "कुतुब मीनार कैसे ना देखें?” तो मैं कहूँगा - "मुझे माफ करिए *(हँसते हुए)*।" अनदेखा करने की क्या विधि बताऊँ? आप पहले बताइए कि 'देखने' की मजबूरी क्या है?

आप कह रही हैं कि आप गृहणी हैं, आपका अध्यात्म की ओर झुकाव है, और घरवालों की ओर से विरोध इत्यादि है, तो आप कह रही हैं कि उनके विरोध को अनदेखा कैसे करूँ। अनदेखा ही है, करने दीजिए विरोध। उस विरोध का संज्ञान लेना ज़रूरी क्यों है? क्यों है ज़रूरी? क्यों है? अच्छा, जैसे बैठी हैं ऐसे ही बैठे रहिए। आपके पीछे (सत्र में) जो व्यक्ति हैं, उनके मूँछें हैं कि नहीं? जल्दी बताइए!

(प्रश्नकर्ता मुस्कुराती हैं)

मूँछ का मुस्कुराहट से कोई ख़ास संबंध नहीं है, बताना होगा।

प्रश्नकर्ता: देखना पड़ेगा।

आचार्य प्रशांत: देखना पड़ेगा न? तो मत देखिए तो नहीं पता चलेगा। हो सकता है पीछे वो मूँछ उमेठ रहे हों, कि मूँछ के बाल की कसम कृष्ण का नाम मत लेना। पर आप तो इधर देख रहीं हैं न? हो गया। यही है― ना देखने की विधि। जो मूँछ पर बहुत ताव देते हैं उन्हें पीठ दिखा दीजिए। ऐसे ही 'नहीं देखा' जाता। हाँ, देखने के लिए कुछ करना पड़ेगा; उठेंगी, घूमेंगीं, तो वो दिखाई देंगे। आप वो देखिए न जो देखने लायक है, तो फिर वो स्वमेव ही नहीं दिखाई देगा जो देखने लायक नहीं है। लेकिन हमारे पास देखने के कारण होते हैं। कारण क्या है? स्वार्थ। वो जो पीछे बैठा है वो मूँछों पर ताव ही नहीं दे रहा, वो कह रहा है "रोटी-पानी बंद कर दूँगा,” तो फिर तो उसकी बात सुननी पड़ेगी, उसकी ओर देखना भी पड़ेगा।

कमज़ोरियाँ हटाइए, स्वार्थ हटाइए। दूसरों से जो ले रही हैं उसे लेना बंद करिए, फिर उनके दबाव में नहीं आना पड़ेगा। ज़ाहिर-सी बात है न? है कि नहीं है?

विशाल जी (सत्र के ही एक प्रतिभागी) , बोलिएगा इनको कि अभी आचार्य जी को ना सुनें। जल्दी बोलिए।

विशाल जी (सत्र के ही एक प्रतिभागी): आचार्य जी को ना सुनें।

आचार्य प्रशांत: क्यों मुस्कुरा क्यों रही हैं? उनकी बात मानिए, उठ के बाहर चली जाइए। क्यों नहीं जा रहीं?

प्रश्नकर्ता: मैं जानती नहीं इनको।

आचार्य प्रशांत: नहीं! क्योंकि ना सत्र का योगदान विशाल जी ने दिया है, ना वो आने-जाने का, लौटने का भाड़ा दे रहे हैं, ना उनको आपने अपने जीवन पर कोई अधिकार दिया है, तो इसीलिए वो कुछ भी कहते रहें उस से आपको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है। अभी यही विशाल जी वो व्यक्ति होते जो सत्र के बाद आपको गाड़ी पर बैठाकर के ले जाएगा यहाँ से, तो आपको उनकी बात सुननी पड़ती।

जिसके भी आश्रित रहोगे, एक बात पक्का समझ लो, वो अध्यात्म का तुम्हें समर्थन तो नहीं ही करने देगा। कोई तुम्हें आश्रय इसलिए देता ही नहीं है कि तुम अपना मन किसी कृष्ण या किसी कबीर को दे दो। ऐसा कोई नहीं होता। ऐसा अगर कोई मिल गया तुम्हें, जो तुम्हें आश्रय और सहारा देके भी तुम्हें भेज रहा हो कृष्ण और कबीर के पास, तो समझ लेना तुम्हें कृष्ण और कबीर ही मिल गए हैं।

आम आदमी तो कृष्ण से प्रतिस्पर्धा करता है न? वो कहता है, "अच्छा, रोटी मेरी खाती है और भजन कन्हैया के गाती है! जे नहीं चलेगा! मेरी रोटी खाती है, तो भजन भी मेरा ही गा।" जो भी लोग किसी के भी आश्रित हैं, वो ये उम्मीद बिल्कुल त्याग दें कि उन्हें अध्यात्म सुलभ हो सकता है। नहीं होगा। जिसके भी आश्रित हो, वो तुम्हारे जीवन के केंद्र पर खुद बैठना चाहेगा न? वो कहेगा - "मैं राजा हूँ तुम्हारा,” और अध्यात्म का मतलब होता है कृष्णों और कबीरों को राजा बना लेना। वो कहेगा - "मैं पागल हूँ? ख़र्चा मैं उठा रहा हूँ और गीत गा रहे हो कान्हा के! अगर कान्हा के गीत गाने हैं तो कान्हा से ही बोलो खर्चा उठाए।" बात सीधी है न? हो सकता है वो इन शब्दों में ना बोले, हो सकता है सभ्य हो, सुसंस्कृत हो, लेकिन भाव यही रहेगा। भाव यही रहेगा।

दो वर्ग के लोगों के लिए बड़ी समस्या है: एक वो जो बेरोज़गार हैं, और दूसरी, माफ करिएगा, गृहणियाँ—ख़ासतौर पर जो आश्रित गृहणियाँ हैं, जो कुछ कमाती-धमाती नहीं। इनको सबसे बड़ी सज़ा, और बड़ी दुःखदायी सज़ा ये मिलती है कि इनका अध्यात्म की तरफ़ बढ़ने का रास्ता बिल्कुल रोक दिया जाता है।

परमेश्वर की ओर कैसे बढ़ोगे अगर पति ही परमेश्वर है? कैसे बढ़ोगे, बताओ? परम पिता की ओर कैसे बढ़ोगे अगर बात-बात पर घर पर पिताजी के आगे हाथ फैला रहे हो? और वो जो ऊपर बैठा है, उसको इन्हीं दो नामों से बहुधा संबोधित किया जाता है—या तो 'पति' या 'पिता'। बताने वालों ने साफ़ बता दिया है, पहले से ही चेतावनी दे दी है कि एक को ही बाप मानना, और एक को ही पति मानना। पर बेरोज़गार आदमी की दिक़्क़त  ये है कि वो बाप के सहारे बैठा है, और ना कमाने वाली स्त्री की मजबूरी ये है कि वो पति के सहारे बैठी है—तो लो ख़त्म हो गया न खेल सारा! ना परम पति मिलेगा ना परमपिता मिलेगा; यही वाले, नीचे वाले, गरम-पिता, गरम-पति मिल जाएँगे।

कोई और कारण हो नहीं सकता कि आपको पूछना पड़े कि - "गृहस्थ में रहते हुए भी अध्यात्म की ओर कैसे बढ़ूँ ? गृहस्थी की बातों को अनदेखा कैसे करूँ?” निश्चितरूप से अध्यात्म की ओर बढ़ने की इच्छा के सामने, गृहस्थी की मजबूरियाँ सामने आ रही हैं। आपकी भाषा में वो 'मजबूरियाँ' कहलाती हैं, मेरी भाषा में 'स्वार्थ'। आदमी मजबूर हो कैसे सकता है जब तक उसका स्वार्थ ना हो? बताइए मुझे। आप तो कह देते हो - "नहीं! नहीं! नहीं! मुझ पर कोई अंकुश नहीं लगा रहा।" ये बड़ा आम जुमला होता है। जैसे ही मैं कहूँगा कि आपको मजबूर किया जा रहा है अध्यात्म की ओर ना आने के लिए, तो मुझसे कहा जाएगा - "नहीं, मजबूर कोई कुछ नहीं कर रहा, वो तो हम अपनी ही ज़िम्मेदारी मानकर नहीं करते। हम से किसी ने कहा थोड़े ही है।" साहब, आप से कोई शब्दों में नहीं कहेगा, वो माहौल ऐसा बना दिया जाता है कि आपको ख़ुद ही लगने लगता है कि - "मेरी पहली ज़िम्मेदारी तो कढ़ाई और करछुल की है।" कोई मुँह से थोड़े ही कहेगा। ये बात ही भद्दी और अनैतिक लगती है अगर मुँह से और शब्दों में बयान की जाए, कि - "देखो, तुम कढ़ाई-करछुल करो, कान्हा को भूल जाओ"। कोई नहीं आएगा मुँह से ये बात बोलने। वो माहौल ऐसा बना दिया जाता है, हवा, फ़िज़ा ऐसी बना दी जाती है कि आप समझ जाते हैं कि भाई ज़िम्मेदारी का नाम है करछुल और कढ़ाई। या कोई और ज़िम्मेदारी, कुछ और, पर ले देकर के होता यही है—करछुल और कढ़ाई"।

अब मेरे पास जब देवियाँ आती हैं, महिलाएँ आती हैं और कहती हैं कि अध्यात्म की ओर उनको बढ़ना है, तो मैं उनकी भावना का आदर करते हुए उनको सबसे पहले कहता हूँ - "देखो, अगर ईमानदारी से अध्यात्म की ओर बढ़ना चाहते हो तो सबसे पहले स्वावलंबी हो जाओ, कमाना शुरू करो," और फिर उनका मुँह उतर जाता है। मुझपर ही ख़फ़ा हो जाती हैं। वो कहती हैं - "हम आए थे इनसे भजन, कीर्तन, जप और तप सीखने, और ये हम से कह रहे हैं जाओ और ऑफिसों में नौकरी के लिए अप्लाई करो। अरे, नौकरी करेंगे तो फिर जप-तप कब करेंगे?” तर्क तो बड़ी सुविधा का है कि - "देखिए, एक तो हम गृहणी हैं, हमारे पास वैसे ही समय कम बचता है, और दूसरा आचार्य जी आप इतने मूर्ख हो कि आप हम को बोल रहे हो कि जो समय बचा है उसमें भी जाकर के नौकरी करो। भाई, हम नौकरी करेंगे तो जप-तप, भजन-कीर्तन, ध्यान-भक्ति—ये सब कब करेंगे?”

अब मैं कैसे समझाऊँ कि - "पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।" जो आश्रित है किसी दूसरे पर, वो सत्य की ओर नहीं बढ़ सकता। हाँ, सुख ले सकता है वो। पराधीनता में भी भौतिक सुख मिल सकते हैं, पर सत्य की ओर नहीं बढ़ पाओगे, क्योंकि सत्य का ही दूसरा नाम मुक्ति है।

अमुक्त रहते हुए सत्य की ओर कैसे बढ़ोगे?

हो सकता है आपके जीवन के तथ्य, जो बातें मैं कह रहा हूँ, उससे मेल ना खाते हों, लेकिन फिर भी अगर आप ये कह रही हैं कि अध्यात्म की ओर बढ़ना है और कुछ लोग, कुछ आवाज़ें, कुछ स्थितियाँ, मजबूरियाँ रोकती हैं, तो इसका मतलब यही है कि किसी-न-किसी दूसरी चीज़ पर निर्भर हुए पड़े हो, आश्रित हुए पड़े हो।

अपनी निर्भरता तलाशिए। जहाँ कहीं भी निर्भरता है, उससे पूछिए कि निर्भर होना किस पर सही है, 'वो', उसपर (ऊपर की ओर इंगित करते हुए), या संसार पर? और कुछ भी देखिए इतना महत्वपूर्ण नहीं होता कि आप उसे अपनी आज़ादी से ऊपर का दर्ज़ा दे दें। जितनी बातें आपको बताई गई हैं आज़ादी के विरोध में, उन सब को तत्काल झूठा जानिए, खारिज करिए। हमें बता दिया गया है कि - "नहीं! नहीं! नहीं! ज़िम्मेदारी बड़ी बात होती है, उसके लिए मुक्ति की कुर्बानी दे दो।" हमें बता दिया गया है कि - "प्रेम बड़ी बात होती है, उसके लिए मुक्ति की कुर्बानी दे दो।" झूठी बात!

प्रेम की तो परिभाषा ही है - "मुक्ति से प्रेम"। मुक्ति के अलावा जिस किसी से आप को प्रेम हो रहा है, वो प्रेम ही झूठा है। जिससे आप को प्रेम हुआ है, अगर वो आप को मुक्ति की जगह बंधन दे रहा है, तो वो प्रेम ही झूठा है।

लेकिन ये बड़ी प्रचलित बहानेबाज़ी है कि - "प्रेम मुझे इतना है कि मैं मुक्ति की ओर कैसे बढ़ूँ? प्रेम तोड़ कर मुक्ति की ओर थोड़े ही बढ़ेगें।"

जो प्रेम मुक्ति के रास्ते में बाधा बन रहा है, वो प्रेम नहीं है दुश्मनी है। अगर कोई वास्तव में आप से प्रेम करेगा, तो वो आप का हाथ पकड़ कर आप को ले जाएगा मुक्ति की ओर। और अगर आप की परिस्थितियाँ मुक्ति के रास्ते में बाधा बन रही हैं तो वो परिस्थितियाँ भी आप के लिए घातक हैं, विषैली हैं। उन परिस्थितियों से बाहर आइए।

मेहनत करनी पड़ेगी थोड़ी, सुविधा में बैठे-बैठे काम नहीं चलेगा। फिर उस पर कहा जाता है - "आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे मेहनत ही नहीं करते! आप को पता है एक आम गृहणी कितनी मेहनत करती है? उसको तो उसकी कोई तन्ख्वाह भी नहीं मिलती, मुआवज़ा भी नहीं मिलता।"देखिए, क्षमा करिएगा, लेकिन आप गृहणी हो करके घर में जो मेहनत करतीं हैं, अगर उसमें दम ही होता तो उस मेहनत ने आप को अब तक आज़ाद कर दिया होता न? अगर आप ने जो आज तक मेहनत करी है वो सार्थक दिशा में होती, और भरपूर होती, तो उसका फल अब तक आप को आज़ादी और मुक्ति के रूप में मिल गया होता न? मिल गया होता न? नहीं मिला न!

इसका मतलब वो जो आप घर पर मेहनत वगैरह कर रहे हैं, वो अपर्याप्त है, और बहुत महत्व, बहुत मूल्य की नहीं है। आप अपने आप को गौरवान्वित कर सकते हैं कि - "हम तो घर पर बहुत मेहनत करते हैं। देखो, हम कोई खाली थोड़े ही बैठे हैं। दूसरे लोग दफ्तर में काम करते हैं, हम घर में काम करते हैं।" नहीं, आप अपने आप को ये बहाना देते रहिए, ये बहाना चल नहीं रहा है क्योंकि इस बहाने के परिणाम सार्थक आप को दिखाई नहीं दे रहे हैं।

अभी एक देवी जी आईं, प्रौढा, वो बोलीं, यहाँ आते हैं तो अब पति ने धमकी देनी शुरू कर दी है कि - "तुम्हारी हैसियत ही क्या है घर में? तुम्हें हटा करके खाना बनाने वाली, झाड़ू-पोंछे वाली रख लेंगे।" आप को जीवन इसीलिए तो नहीं मिला है न कि खाना बनाएँ, और झाड़ू-पोंछा करें, और बर्तन धोएँ? और ये सब करने को आप नाम किस बात का दे देते हैं? प्रेम का और ज़िम्मेदारी का।

नहीं, मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि ये सब आप के (प्रश्नकर्ता की तरफ हाथ जोड़ कर निवेदन करते हुए) साथ हो रहा है। मैंने अभी आप के प्रश्न को एक व्यापक रूप दे दिया है। आप के प्रश्न को मैंने पूरी स्त्री जाति का, कम-से-कम सब गृहणियों का प्रश्न बना दिया है। मैं आप से कोई बात अभी व्यक्तिगत तौर पर नहीं कह रहा हूँ। कुछ मैं ऐसा कह दूँ जो आप के किस्से से मेल ना खाता हो, तो बुरा मत मानिएगा। ठीक है? अभी मैं सब महिलाओं को, सब गृहणियों को संबोधित कर रहा हूँ।

हम इसी में इतराए रह जाते हैं कि - "हम तो घर का काम करते हैं।" और आप जो घर का काम कर रहे हैं, और आप जिनके लिए काम कर रहे हैं, वो आप के काम को दो कौड़ी की क़ीमत नहीं देते। वो आप को धमकी दे देते हैं कि - "अभी तुम को निकाल कर के झाड़ू-पोंछे वाली और खाना बनाने वाली, बर्तन धोने वाली रख लेंगे। ज़्यादा मुँह मत चलाया करो हमारे सामने।" तो फिर समझ जाइए न कि आप को उस काम में समय अपना बर्बाद करना है या नहीं करना है। करना चाहते हैं? जिनके लिए आप ये सब काम कर रहे हैं, जब वो आप के काम को मूल्य ही नहीं देते, सम्मान ही नहीं देते, तो ये काम करके लाभ है? हाँ, इस काम में लेकिन दिन पूरा खपता है, कि नहीं खपता है? पूरे परिवार का इतना बड़ा झोला भर के कपड़े धोते हो, और जिनके कपड़े धोते हो, उनके लिए कोई मूल्य नहीं धुले हुए कपड़ों का। वो कहते हैं - "कपड़े ही तो धुले हैं, लॉन्ड्री में धुल जाते।" काहे धो रहे हो कपड़े? पर फिर डर लगता है, कहते हो - "हमें और तो कुछ आता नहीं है कपड़े धोने के अलावा। अगर हमने कपड़े भी नहीं धोए तब तो ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगी कि हम एकदम ही खाली हैं"।

अगर ऐसी बात है, तो कोई नया ज्ञान सीखो, कला सीखो, बाहर निकल के कोई कुशलता सीखो। जीवन मत ख़राब करो वैसे ही पड़े रह-रह करके जैसे पड़े हो। उसमें कोई गौरव नहीं है। वो जीवन की बर्बादी है। और यदि काम नहीं कर रहे हो तो उसका सब से भयावह नतीजा यह निकलता है कि संसार से कट जाते हो, तुम्हें कुछ पता ही नहीं होता दुनिया में क्या चल रहा है। घर में एक सुविधाजनक जगह पर बैठ जाते हो कई अधिकारों के साथ। क़रीब-क़रीब रानी ही बन जाते हो घर की। और दुनिया में क्या चल रहा है, उसका कुछ पता ही नहीं है। दुनिया में बाहर निकलो तो फिर आटे-दाल का भाव पता चले। उसका क्या नतीजा होता है? मानसिक विकास नहीं होने पाता फिर।

टी.वी. पर ये अधिकांश सीरियल जो आते हैं दोपहर में, वो किनके लिए आते हैं? किनके लिए आते हैं? या तो बच्चों के लिए, या गृहणियों के लिए। देखते हो किस कोटि के रहते हैं? उनका बौद्धिक स्तर क्या रहता है? उनका इंटेलेक्चुअल लेवल देखा है कैसा रहता है? कैसा रहता है? एकदम ही शून्य। क्योंकि बना ही ऐसा लिया है घर पर बैठे-बैठे अपने आप को कि कोई भी आकर बेवक़ूफ़ बनाए जा रहा है। टी.वी. वाले भी बेवक़ूफ़ बना रहे हैं।

अब जब मैं ये सारी बातें बोल रहा हूँ, तो मुझे ये भी पता है कि बहुत सारे लोग इसे भी कहेंगे 'मीसोजिनि' है। मुझसे कहा जाएगा कि - "आप के अंदर, गृहणियों द्वारा जो गृह-कार्य किया जाता है, उसके लिए कोई सम्मान नहीं है। यू आर डिबेसिंग द हाउसवाइफ।" हाँ मैं ऐसा कर रहा हूँ, और जानबूझकर कर रहा हूँ।

देखो, थोड़े समय के लिए घर का काम स्वेच्छा से चुनना एक बात होती है, और घर का काम लत बन जाए और मजबूरी बन जाए, ये बिल्कुल दूसरी बात होती है। होती है कि नहीं? थोड़े समय के लिए घर का काम स्वेच्छा से तो पुरुष भी चुन सकते हैं, कि - "साल-दो-साल हम घर पर ही रहेंगे, घर का ही काम-धंधा अपना देखेंगे।" वो कोई भी कर सकता है। पर घर का काम आपके लिए एक अपरिहार्यता बन जाए, आप का जीवन ही बन जाए, ये बिल्कुल दूसरी ही बात है। और उसी बात का खौफ़नाक परिणाम फिर ये होता है कि घर पर क़ैद रहे-रहे आप अध्यात्म की ओर भी नहीं बढ़ सकते। फिर घर पर जो होता है वो बहुत नकली किस्म का अध्यात्म होता है, कि पूजा-अर्चना कर ली, थोड़ा धूप-बाती कर दी, घंटी बजा दी, सुबह-सुबह नहा लिए, नहाने के बाद देवताओं पर थोड़ा सा पुष्प-जल चढ़ा दिया। ये सब घर में ख़ूब करतीं हैं महिलाएँ। इससे क्या होगा? सारी पूजा-अर्चना अंततः किसलिए है? सत्य के लिए है और मुक्ति के लिए है। ये सब करके सत्य और मुक्ति मिल रही है क्या? तो ये तुम घर में क्या घंटी बजाया करते हो? घर में घंटी मत बजाओ, बाहर निकलो। वही साधना है, वही अध्यात्म है आप के लिए।

आप को कुछ नहीं मिलेगा उपनिषद पढ़ के, अगर आप क़ैद में हो। जो क़ैद में है, उसके लिए साधना है दीवारों को तोड़ो और बाहर आओ। क़ैद के भीतर बैठे-बैठे तुम गीता का पाठ कर रहे हो, ये कोई साधना नहीं हुई। ये कोई अध्यात्म नहीं है।

ये बहानेबाजी है।

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