हिंसा तो हिंसा है ना। आदमी हिंसक है, यहाँ एक तरीके से हिंसा करेगा, वहाँ दूसरे तरीके से हिंसा करेगा। घर में एक तरह से हिंसा करेगा, दफ़्तर में दूसरे तरीके से हिंसा करेगा। दफ़्तर में वो अपने चपरासी का शोषण करेगा, घर में आके बीवी-बच्चों का शोषण करेगा। जो धार्मिक है, वो धार्मिक तरीके से शोषण करेगा। जो अपने आप को नास्तिक बोलता है, वो दूसरे तरीके से शोषण करेगा। शोषण तो सभी करेंगे। जब तक भीतर ज्ञान नहीं है, तब तक व्यक्ति हिंसक तो रहेगा ही रहेगा। अहिंसा के रूप, रंग, तरीके अलग हो सकते हैं।
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प्रश्नकर्ता: ये आपकी क्लैरिटी ऑफ थॉट बहुत है। ये जो है न, मतलब कभी-कभी ऐसा लगता है न कि, कितना पढ़ना पड़ेगा, कितना समझना पड़ेगा — टू हैव दैट।
आचार्य प्रशांत: पढ़ने का तो वक्त ही नहीं मिलता।
प्रश्नकर्ता: आप पढ़ते तो हो, बोले रात को।
आचार्य प्रशांत: मैंने कहा था, रात में दो काम होंगे — व्यक्तिगत समय मिला तो पढ़ लेंगे हम, और नहीं तो आप दिन भर की जो सब धूल थी, वो रात में साफ करेंगे।
ज़्यादातर तो समय धूल साफ करने में चला जाता है। पढ़ना मेरा लगभग 8 साल से, जो मेरी पढ़ने की गति थी, वो 20% रह गई है। नहीं तो मेरी ज़िन्दगी में एक समय ऐसा था जब मैं महीने में चार-चार, पाँच-पाँच, शायद छह-सात-आठ किताबें भी निपटा रहा था। तो अभी लगभग 3000 किताबें हैं मेरी




