प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ध्यान में मन नहीं लगता है और बोलने में कठिनाई होती है और इसकी वजह से परेशान रहता हूँ। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: मुक्ति सबको चाहिए। बेचैन सभी रहते हैं। तड़प सभी को है। लेकिन मुक्ति के जो तरीक़े हम चुन लेते हैं, वह तरीक़े गड़बड़ होते हैं।
उन तरीक़ों में भी दो तरह की गड़बड़ होती हैं। दोनों बताए देता हूँ। एक तो भूल यह होती है कि हम सोचने लगते हैं कि दुनिया में कुछ हासिल करके, कुछ पाकर के, कुछ कमा करके, कुछ बन करके मुक्ति मिल जाएगी। एक तो यह भूल होती है और इस भूल से उबरता है आदमी, कहता है कि दुनिया में चीज़ें कमा करके चैन नहीं मिलने वाला, अध्यात्म की शरण में जाओ। तो अध्यात्म में वह एक दूसरी भूल कर बैठता है। अध्यात्म में वह यह भूल कर बैठता है कि वह ध्यान इत्यादि की कोई सार्वजनिक पद्धति उठा लेता है और सोचता है कि इससे मुझे भी लाभ हो जाएगा।
आपको जिसके लिए मुक्ति चाहिए वह अपनेआप को बड़ा अलग, बड़ा पृथक, बड़ा विशिष्ट समझता है। हो भले न, पर समझता यही है। अहंकार कहते है उसे। तो उसको आपको एक अलग, पृथक और विशिष्ट विधि ही देनी पड़ेगी।
आप कह रहें हैं ध्यान में मन नहीं लगता। जिस ध्यान में मन न लगे वह ध्यान है ही नहीं। ध्यान का अर्थ ही होता है कि मन के संस्कारों और संरचना के अनुरूप उसे एक ध्येय दिया जाए। ध्यान का तो अर्थ ही होता है कि मन को ऐसा ध्येय दे दिया कि मन प्यार में पागल हो गया। ध्येय से प्रेम नहीं तो ध्यान कैसे लगेगा?
फिर तो एक आंतरिक लड़ाई लड़ रहे होगे। मन कहीं और को भाग रहा है और तुम उसे खींच-खींच के तथाकथित ध्यान की ओर ले जा रहे हो, और अधिकांश लोगों के साथ ऐसा ही होता है। आमतौर पर मन भटके, न भटके, ध्यान के क्षणों में ज़रूर वह विक्षिप्त हो जाता है। वह लोग सोचते हैं इसमें मन की ग़लती है। लोग कहते हैं, ‘यह मन बड़ा नालायक है, बड़ा चंचल है। ध्यान में बैठना ही नहीं चाहता, इधर-उधर भागता है।‘





