प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। हर समय तो हमसे ध्यान की अवस्था में रहा नहीं जा सकता। जब कभी भी पुरातन प्रणाली की तरह ध्यान लगाने की कोशिश करती हूँ तो ध्यान जैसा कुछ अनुभव तो नहीं होता पर हल्का सा सहस्रार में कंपन और भूमध्य के बीच तनाव क्यों होता है, जब भी किसी पवित्र स्थान पर होती हूँ तो? क्या ये महज़ एक भ्रम है या कोई अवस्था जो ध्यान को ला सकती है? ध्यान से सम्बन्धित आपके और अन्य दार्शनिकों के प्रवचनों में भी थोड़ा अंतर है। कृपया प्रकाश डालें।
आचार्य प्रशांत: क्या करोगी ध्यान का? करना क्या है ध्यान का? ध्यान क्यों? बिलकुल ज़मीन पर आकर बात करो। तुम एक ज़िंदगी जी रहे हो, मान लो तुमने कोई ग्रन्थ नहीं पढ़ा है, मान लो कोई गुरु इत्यादि तुम्हारे जीवन में नहीं है। ध्यान क्यों? बोलो, ध्यान क्यों? कोई रिवाज़ है? कोई फैशन (प्रचलन) है? क्या है ध्यान?
प्र: हम कौन हैं यह कैसे जानेंगे?
आचार्य: अरे! क्यों जानना है? तुम्हें अभी बताया ही नहीं गया कि 'कोहम' बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है, तुम्हें काहे को जानना है? ज़मीन पर आकर बिलकुल बात करो।
प्र: फिर इस ही ज़िंदगी में फँसे रह जाएँगे।
आचार्य: हाँ, तो समस्या यह है कि फँसे हुए हो, तो उसके बारे में तो कुछ लिखा ही नहीं। यह ऐसी सी बात है चूहा चूहेदानी के भीतर है और पूछ रहा है कि मैं कौन हूँ। अरे! तू कोई भी होगा, अभी तू बाहर निकल। चूहेदानी के भीतर वाले को सहस्रार पूछना चाहिए या यह पूछना चाहिए कि बताओ कौनसा खटका दबाऊँ कि बाहर आ जाऊँ? और बाहर आने के लिए भले बिल्ली से संधि करनी पड़े तो भी कर लूँगा पर अंदर नही रह सकता।




