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देशप्रेम से बड़ा कुछ और है || (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते। आचार्य जी, एक परिचित हैं मेरे, उनसे कुछ चर्चा हो रही थी तो उस चर्चा के दौरान एक बात सामने आयी, तो उन्होंने कहा कि ये सवाल आचार्य जी से अगर पूछ सकते हैं तो सामने रखिएगा। चर्चा वो इस बात पर थी कि वो कह रहे थे कि भारत आज आर्थिक और सामरिक-दृष्टि से बहुत मज़बूत है, हम विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और चौथी सबसे बड़ी सेना रखते हैं। तो फिर आप क्यों कहते हैं कि भारत-राष्ट्र को आज बहुत ख़तरा है? थोड़ा समझाएँगे इस पर?

आचार्य प्रशांत: नहीं, जो पूछा है उसी में उत्तर बैठा हुआ है न! सेना ‘देश’ के पास है, अर्थव्यवस्था ‘देश’ की बढ़ी हुई है; देश एक राजनैतिक इकाई होता है, देश और राष्ट्र एक नहीं होते।

समझ रहे हो?

अगर साधारण भाषा में समझो तो, राष्ट्र आप हों इसके लिए आपको एक साझा आधार चाहिए, एक सिद्धांत चाहिए, जो आपको आपस में जोड़े हुए है। और देश बना रहे, बचा रहे, इसके लिए आपको सिर्फ़ राजनैतिक एकता चाहिए।

मैं पहले भी कह चुका हूँ कि भारत-देश का आधार भारत-राष्ट्र है; और ये दोनों बहुत अलग-अलग हैं। भारत ‘राष्ट्र’ तब भी था जब भारत ‘देश’ नहीं था। १९४७ से पहले क्या भारत-देश वैसी ही राजनैतिक इकाई था जैसा उसे आज देख रहे हो? और पीछे चले जाओ, १७५७ से पहले क्या भारत-देश राजनैतिक तौर पर वैसा ही था जैसा आज देख रहे हो? तो देश की परिभाषा, देश की सीमा तो लगातार बदलती रही है पिछले दो-हज़ार, चार-हज़ार सालों में, लेकिन भारत-राष्ट्र क़ायम रहा है, भारत-राष्ट्र यथावत रहा है।

ज़्यादातर लोग आज जो देश की बात करते हैं, वो अधिक-से-अधिक देशवादी हो सकते हैं, राष्ट्रवादी बहुत कम लोग हैं क्योंकि राष्ट्र का आधार ही कोई नहीं समझता। जब भारत हज़ार छोटे-छोटे राज्यों और रियासतों में बँटा हुआ था, राजनैतिक दृष्टि से, तब भी भारत-राष्ट्र एक था।

समझ रहे हो बात को?

क्यों एक था? क्योंकि कुछ ऐसा था जो हम सबको एक सूत्र में पिरोए हुए था। और वो जो हम सबको बाँध कर रखे हुए है, वो है भारत की आध्यात्मिकता; और उस आध्यात्मिकता में भी अगर और साफ़-साफ़ कहना है, तो वेदांत। भारतीय राष्ट्र बहुत ख़ास है, क्योंकि इसका आधार अध्यात्म है, ऐसे राष्ट्र और हैं नहीं दूसरे दुनिया में। ज़्यादातर राष्ट्रों का आधार क्या होती है? नस्लीयता, रेस , या धर्म, रिलीजन , या ज़बान, लैंग्वेज ; कुछ भी हो सकता है, क्रीड , रेस , *एथनिसिटी*। इन सब आधारों पर राष्ट्र बनते हैं और फिर वही राष्ट्र देश बन जाते हैं। और चूँकि वो सब राष्ट्र बनते ही बड़े हिंसक आधारों पर हैं, बड़े विभाजित आधारों पर हैं, इसलिए उनसे जो देश निकलते हैं वो भी हिंसक होते हैं; और फिर तमाम-तरह के विश्व-युद्ध होते हैं।

विश्व-युद्ध होते ही इसीलिए हैं क्योंकि—जैसे अब यूरोप है, उपमहाद्वीप एक; महाद्वीप ही है वो तो पूरा, उसमें इतने सारे देश हैं, उन देशों के आधार में भी राष्ट्र बैठे हैं। पर वो राष्ट्र इसलिए नहीं हैं क्योंकि उनको आपस में गूँथने वाली चीज़ कोई बहुत ऊँची चीज़ है, कोई हायर वैल्यू कोई ऊँचा मूल्य उन्हें राष्ट्र नहीं बना रहा। जर्मन-नेशन भी है और फ्रेंच-नेशन भी है; मैं कंट्री की नहीं बात कर रहा, मैं नेशन की बात कर रहा हूँ। वो किस आधार पर हैं? वो कैसे कहते हैं कि “हम एक हैं”? “हम एक राष्ट्र के हैं”, ये कैसे कह देते हैं वो? कोई बहुत ऊँचा मूल्य नहीं है, बस यही है कि, “भई! एक तरह से हम एक क़बीले के हैं, हम एक गुट के हैं, हमारी जगह एक है, हमारा खान-पान एक है, हमारी बोली एक है, हमारी नस्ल एक है, हमारा खून एक है, तो हम एक हो गए।” इस आधार पर आमतौर पर राष्ट्र बनते हैं; भारत-राष्ट्र इस आधार पर नहीं बना है।

और ये भी मत समझिएगा कि भारत-राष्ट्र धार्मिक आधार पर बना है। धार्मिक आधार पर भी बहुत देश बनते हैं; पाकिस्तान है तो, लेकिन जो भारतीय राष्ट्र रहा है, वो धार्मिक आधार पर नहीं रहा है। जिन्हें हम आमतौर पर धर्म कहते हैं प्रचलित भाषा में, वो तो बहुत आए, बहुत गए, लेकिन बात ये थी कि देश आध्यात्मिक रहा, देश की रुचि रही सच्चाई में। ये देश आत्म-जिज्ञासा को बहुत गंभीरता से लेता रहा, ये देश जीवन के मर्म तक उतरने की कोशिश करता रहा, इसीलिए ये राष्ट्र के तौर पर बहुत अलग रहा, विशिष्ट रहा। अभी जितनी बार मैंने ‘देश’ कहा न, उसको ‘राष्ट्र’ सुनना!

समझ रहे हो?

अब हो क्या रहा है? हो ये रहा है कि तमाम कारणों से भारत में आज उच्चतर मूल्यों का ज़बरदस्त पतन हो रहा है, अध्यात्म या तो ख़त्म हो रहा है या जहाँ मौजूद भी दिखाई देता है तो बहुत नकली और बेईमानी-भरा है। और मैंने कहा कि भारतीय राष्ट्र का ही क्या आधार है? अध्यात्म; अध्यात्म नहीं रहा तो ‘राष्ट्र’ नहीं बचेगा, ‘देश’ हो सकता है बचा रहे। जिन्होंने सवाल पूछा, वो बिलकुल ठीक कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था बढ़ती जा रही है, दुनिया की शीर्ष पाँच अर्थव्यवस्थाओं में और सामरिक शक्तियों में आ गए हैं आप। और इस क्षेत्र में प्रगति हो रही है, और उस क्षेत्र में प्रगति हो रही है। वो सब होती रहेगी, देश बढ़ता रहेगा, लेकिन देश का जो आधार है, आम-भाषा में कहें कि देश की जो आत्मा है; आम-भाषा में, आत्मा, वो सूख चुकी होगी, बिलकुल, देश का अंतस नहीं बचा होगा। ऊपर-ऊपर से तो ऐसा लगेगा कि भारी तरक़्क़ी हो रही है, पर देश का हृदय खोखला हो चुका होगा।

इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि आज भारतीय राष्ट्र को जितना ख़तरा है उतना पहले कभी नहीं रहा। बहुत सारी आपदाएँ झेलीं हैं भारत ने, लेकिन भारतीय ‘राष्ट्र’ ने बहुत आपदाएँ नहीं झेलीं, और झेलीं भी तो बहुत ताक़त से, डट कर उनका मुकाबला किया और क़ायम रहा, विजयी रहा। आज जो आपदा है, वो भारत-देश के सामने कम है और भारत-राष्ट्र के सामने ज़्यादा है। ये अंतर आपको समझ में आ रहा है साफ़-साफ़?

देखिए, चीन आ कर गलवान में उपद्रव करता है, पाकिस्तान कश्मीर में करता है। ये खतरे राष्ट्र के सामने बहुत बड़े नहीं होते, क्योंकि राष्ट्र तो तब भी झेल गया था जब तैमूरलंग सीधे दिल्ली पर घुस आया था, राष्ट्र तो तब भी झेल गया जब तमाम एशियाई और यूरोपियन ताक़तों की उसको कई शताब्दियों की दासता झेलनी पड़ी, राष्ट्र तब भी सह गया और उसकी हस्ती मिटी नहीं। तो राष्ट्र को खतरा सीमाओं पर नहीं होता, सीमाओं पर किसको खतरा होता है? देश को; राष्ट्र को खतरा भीतर से होता है।

हम लोग कहते हैं, "हम बड़े देश-प्रेमी हैं", बड़ा इसमें गर्व अनुभव करते हैं, लेकिन देश-प्रेम के नाम पर हम प्रेम बस देश की सीमाओं से करते हैं, कि “सीमाओं पर खतरा नहीं होना चाहिए।“ और सीमाओं के अंदर ही जो बैठे हुए हैं, जो दीमक की तरह देश के अंतस को ही चाट गए, खोखला कर दिया भीतर से, उनकी परवाह हम कभी नहीं करते, उनके ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलते। और देश के भीतर जो सबसे बड़ी दीमक लगी है वो क्या है? वो सारी ताक़तें, जो अध्यात्म को नष्ट करे दे रही हैं, जो आपके भीतर से उन सब मूल्यों को सुखाए दे रही हैं जो ज़िंदगी को ऊँचा बनाते हैं; वो सब ताक़तें जो आपको बता रही हैं कि ज़िंदगी तो है ही इसीलिए कि खाओ-पियो मौज करो, किसी भी कीमत पर अपना स्वार्थ आगे बढ़ाओ, और एक दिन मर जाओ!

जिन ताक़तों ने भारतीयों को ये सिखा दिया न, वो ताक़तें भारतीय राष्ट्र की हत्या करने पर उतारू हैं, और ये ऐसी हत्या होगी जिसका हमें पता भी नहीं चलेगा, क्योंकि ऊपर-ऊपर से सब-कुछ साधारण, सामान्य चलता रहेगा। सड़कों पर गाड़ियाँ चलती रहेंगी, लेकिन गाड़ियों के भीतर जो लोग बैठे होंगे, उनके भीतर कुछ सूख चुका होगा, रसहीन हो चुके होंगे। अर्थव्यवस्था खूब बढ़ रही होगी, लेकिन वो अर्थव्यवस्था फिर वैसी ही होगी जैसी दुनिया के किसी भी दूसरे देश की होती है। इतने देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्थाएँ बहुत बड़ी-बड़ी हैं, वैसे ही भारत भी हो जाएगा; भारत की विशिष्टता पूरी तरह नष्ट हो जाएगी। और ये बहुत अजीब बात होगी, कि इतनी शताब्दियों की राजनैतिक-ग़ुलामी राष्ट्र को नुकसान नहीं पहुँचा पायी ज़्यादा, राष्ट्र को सबसे ज़्यादा नुकसान तब पहुँच रहा है जब हम राजनैतिक रूप से आज़ाद हैं।

जब हम ग़ुलाम भी थे राजनैतिक रूप से, तो ‘देश’ ग़ुलाम था; राष्ट्र का वजूद ज़ोरों से धड़क रहा था सीने में, राष्ट्र को कोई खतरा नहीं हो रहा था, देश ग़ुलाम था। आज ‘देश’ आज़ाद है और ‘राष्ट्र’ मरणासन्न है। और किसी के कानों पर जूँ नहीं रेंग रही, किसी को पता ही नहीं चल रहा, क्योंकि जो मृत्यु हो रही है, जिस हत्या की मैं बात कर रहा हूँ, वो सूक्ष्म है, वो दिखाई नहीं देती आँखों से। आँखों से तो यही दिखायी देगा, कि “अर्थव्यवस्था तरक़्क़ी कर रही है, सेना बड़ी हो रही है, नये-नये तरीके के बाज़ार खुल रहे हैं, लोगों के पास पैसा आ रहा है”, यही दिखायी देगा, लगेगा, “बड़ी तरक़्क़ी हो रही है, बड़ी तरक़्क़ी हो रही है।" उस तरक्की के भीतर जो मौत हो रही है, अंदरूनी, वो आँखों से दिखायी पड़ेगी नहीं। इसीलिए आज जितना बड़ा खतरा है उतना बड़ा खतरा कभी नहीं रहा।

देश-प्रेमी आप हों, अच्छी बात है, मैं आपसे कह रहा हूँ राष्ट्र-प्रेमी बनिए, राष्ट्र-प्रेमी; बड़ा अंतर है। देश-प्रेमी होने से बहुत ऊँची बात है राष्ट्र-प्रेमी होना, खासतौर पर भारत-राष्ट्र का प्रेमी होना, क्योंकि भारत-राष्ट्र विशेष है। किसी छोटे सिद्धांत पर नहीं खड़ा हुआ है भारत-राष्ट्र, भारत-राष्ट्र उस उच्चतम सिद्धान्त पर बना है जो आदमी के जीवन को सार्थक बना सकता है, जिसका नाम है आत्म-जिज्ञासा, आत्मज्ञान, अध्यात्म, सच्चाई; उसी को आप और नामों से भी — बोध कह सकते हैं, प्रेम कह सकते हैं, करुणा कह सकते हैं। ये आधार हैं हमारी राष्ट्रीयता के, इसको बचाइये! देश बचाना यदि ज़रूरी है, तो देश से ज़्यादा ज़रूरी है बचाना राष्ट्र को; राष्ट्र-प्रेमी बनिए।

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