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दर्द आज है, दवा अगले जन्म में चाहिए?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार हमें समझाया जाता है कि जो इस जन्म में परमात्मा को पा लेता है वही बुद्धिमान पुरुष है, तो इसी जन्म में उसे पा लो। इसमें जो जन्म की बात की जा रही है तो क्या अगला जन्म भी होता है? इस विषय में थोड़ा समझाइए।

आचार्य प्रशांत: यह तो सहज ही और बिलकुल प्रकट बात है- तुम्हें तकलीफ अभी है, तुम उसको अगले जन्म में मिटाओगे क्या? सारा अध्यात्म क्यों है? तुम क्यों किसी भी तरह की साधना कर रहे हो? तुम्हें कोई भी ज्ञान क्यों चाहिए? क्या तुम आनंद में हो? विश्राम में हो? सहज हो? अगर हो तो घर जाओ, जंगल जाओ, जन में जाओ, वन में जाओ, कुछ भी करो सब ठीक है।

बिलकुल मूलभूत बात पूछ रहा हूँ। पहली बात - कोई ये सब क्यों करे? उपनिषद क्यों पढ़े भाई? कोई दैवीय आज्ञा तो है नहीं कि पैदा हुए हो तो उपनिषद पढ़ने ही पड़ेंगे। क्यों आओ उपनिषद की तरफ? उपनिषदों की तरफ हम इसलिए आते हैं क्योंकि हम कष्ट में हैं। उस कष्ट का अनुभव तुम्हें कब हो रहा है? अभी। तो उसका समाधान तुम अगले जन्म में ढूँढोगे क्या? कि अभी अच्छे कर्म करो ताकि आगे अच्छा फल मिलेगा, ये बात ही कितनी हास्यास्पद है। लोग सवाल पूछते हैं, कहते हैं, "अगर पुनर्जन्म नहीं होता तो हम अच्छे कर्म क्यों करें? सही काम क्यों करें?" अभी के लिए भाई! तुम अभी तकलीफ में हो। तुम अपने ही प्रति इतने निष्ठुर हो गए हो क्या कि तुम्हें अपनी पीड़ा अनुभव ही नहीं हो रही? तुम अभी बहुत कष्ट में हो इसलिए सही काम करो ताकि तुम्हारी पीड़ा कम हो सके। ये अगले जन्म की क्या बात कर रहे हो? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं है तुम इतने निराश हो गए हो कि इस जन्म का तो कुछ हो ही नहीं सकता तो चलो आगे का देखा जाए?

सातवीं-आठवीं की बात होगी, तो हमारे साथ एक पढ़ा करता था और उसका आठवीं में ही नाम पड़ गया था क्लास में 'बुढ़ऊ'। क्यों पड़ गया था? क्योंकि वो कक्षा के औसत विद्यार्थी से उम्र में लगभग दो साल बड़ा था और इतना ही नहीं था कुछ उसने ज़िन्दगी इस तरह से जी थी कि उसके बाल वही पंद्रह-वंद्रह की उम्र में सफेद होने लग गए थे तो उसका नाम क्या था? 'बुढ़ऊ'। तो आठवीं में जो परीक्षाएँ होती हैं, हाफ-इयरली , अर्धवार्षिक उनके नतीजे आए। बुढ़ऊ का वैसा ही नतीजा आया जो आना था। अब उसके बाद क्या देखा जाए? उसके बाद देखा जाए कि बुढ़ऊ सातवीं के लड़के-लड़कियों से मेल-जोल बढ़ा रहे हैं, उन्हीं के साथ खेल रहे हैं, उनको ज्ञान दे रहे हैं, मदद कर रहे हैं, सीनियर बन रहे हैं उनके सामने जाकर कि, "हाँ ऐसा हो सकता है-वैसा हो सकता है।" एक दिन बुढ़ऊ ने इन्तेहाँ कर दी- असेंबली में जाकर वो सातवीं की लाइन में लग गए। आठवीं का बुढ़ऊ जाकर कहाँ लग गया? सातवीं की लाइन में लग गया तो मैं मॉनिटर हुआ करता था। मैंने कहा, "ये ज़्यादा हो गया अब! और जो तुम कर रहे हो सो कर रहे हो वापस तो आओ", तो मुश्किल से उसको वापस खींचा। फिर पूछा कि कर क्या रहे हो? तो बोलता है- अगले साल की तैयारी। बोल रहा है, "तुम्हारा क्या है? तुम तो बीत जाओगे, हमें तो उन्हीं के साथ रहना है", तो ये सब जो पुनर्जन्म वाले हैं ये बुढ़ऊ जैसे हैं हमारे कि, "अब इस साल से तो कोई उम्मीद बची नहीं। हाफ-इयरली ने ही बता दिया है कि आगे क्या होना है। अभी जो परिणाम आए हैं वो हाफ-इयरली के ही हैं लेकिन हम यहीं पर उम्मीद खो चुके हैं पूरी कि किसी भी तरीके से हम नौवीं में पहुँचेंगे। तो अभी से हमने अगले जन्म की तैयारी शुरू कर दी है। सब सातवीं की लड़कियों से मेल-जोल बढ़ाना चालू कर दिया है और किताबें वैसे भी बिलकुल हमारी नई-की-नई थीं अब तो उनको हम बिलकुल ही नहीं छू रहे। अरे कहीं दाग-धब्बा लग जाएगा, खराब हो जाएँगी। एकदम साफ बचनी चाहिए अगले जन्म के लिए।"

ऐसे हैं सब पुनर्जन्म वाले, "क्यों मेहनत करें इस जन्म में? ये तो वैसे ही बर्बाद हो चुका है और बर्बाद इसलिए हो चुका है क्योंकि जन्म बर्बाद करने का बहुत पुराना अनुभव है हमें। पाँचवी भी दोहराए थे, छठी भी दोहराए थे, अब आठवीं भी दोहराएँगे।" बुढ़ऊ तो फिर भी होशियार थे आठवीं वो वाकई दोहराते तो उनका नाम वही लिखा जाता जो नाम उनका पिछले साल था लेकिन जो ये पुनर्जन्म वाले हैं ये महामूर्ख हैं। जो कर सकते हो वो भी कर लो। कष्ट भी अभी है, समाधान भी अभी है। पाप भी अभी है, पुण्य भी अभी है। कर्म भी अभी है, कर्मफल भी अभी है। बंधन भी अभी है और मुक्ति भी, अगर तुम्हें पानी है, तो अभी है। क्यों भविष्य पर इतना तुम भरोसा और इतना बोझ डालते हो? यहाँ भाई! आने वाले कल का भरोसा नहीं, तुम अगले जन्म के भरोसे बैठ गए? ये तो तुमने ज़बरदस्त यकीन कर लिया भविष्य पर। समझ रहे हो? आदमी वर्तमान से दूर भागता है भविष्य की ओर तो बाकी दुनिया के लोग तो भविष्य की ओर इतना ही भागते हैं, ये सोचते हैं कि जो आज नहीं मिला वो पाँच साल बाद मिल जाएगा; हमने तो इन्तहाँ ही कर डाली भविष्य की ओर भागने की- हम कह रहे हैं, "जो आज नहीं मिला वो पाँच जन्म बाद मिल जाएगा। भविष्य तो खत्म होने का ही नहीं है। भविष्य तो आता ही रहेगा। पाँच जन्म हैं, नहीं तो पाँच-सौ जन्म हैं, जल्दी क्या पड़ी है? "और उन पर हम ताने कसते हैं जो पाँच या दस साल बाद के ख्वाबों में जीते हैं, उनको हम कहते हैं- इनको देखो ये दस साल बाद का भरोसा बना कर बैठे हैं। और तुम जो दस जन्म बाद का भरोसा बना कर बैठे हो? तुम होशियार हो गए? जो दस साल बाद की योजना बना रहा है उसकी योजना तो फिर भी संभव है कि पूरी हो जाए, तुम्हारी कैसे पूरी होगी? आ रही है बात समझ में?

काम करो काम!

खबर नहीं इस जग में पल की... ~ कबीर साहब

अगले पल का भी कुछ पता नहीं है। अभी भी मौका है जो कुछ निपटाना है, निपटा लो। जो कुछ भी लंबित पड़ा है उसको पूरा कर लो। सबसे मूर्ख आदमी वो है जो उस चीज़ को कल के लिए छोड़ रहा है, जो अभी ख़त्म की जा सकती है। तुम माया का सहारा ले रहे हो। माया माने समय। ये महामूर्खता की बात है। जो बिलकुल भरोसे का नहीं है तुम उसको विश्वसनीय मान रहे हो। तुमने समय को विश्वसनीय मान लिया, इससे बड़ी मूर्खता क्या होगी? समय सब बदल देता है। तुम्हें क्या लग रहा है कल की सुबह तुम्हारे भरोसे, अनुमान, अपेक्षा के अनुसार आने वाली है? बिलकुल भी नहीं। आज सुबह वो हुआ क्या जिसकी तुम्हें उम्मीद थी? तो तुम कल की सुबह पर इतना भरोसा कैसे कर लेते हो? कितना गहरा आलस और तमसा है भीतर कि तुम उठ करके अभी निपटाना ही नहीं चाहते जिसकी माँग तुमसे धर्म और कर्तव्य कर रहे हैं।

इसी को मैं कह रहा था आध्यात्मिक आदमी में एक बेचैनी होती है। कल को तकिया बना करके तो वो चैन से बिलकुल भी नहीं सो सकता। कल का तकिया उसके लिए काँटों के तकिए के समान होता है, उसे चुभता है। समय के चक्र में तो वैसे ही फँसे हुए हो, तुम और ज़्यादा समय को अपनी ज़िन्दगी में अधिकार दे रहे हो? कल पर भरोसा करके। धैर्य और आलस इनमें अंतर होता है। धीरज, प्रमाद नहीं होता। त्वरा होनी चाहिए एक जीवन में। जब बात आए सच की तो तुमको चाहिए एक ज़बरदस्त त्वरा भी जो कह रही है, "अभी मिल जाए", और अनंत धैर्य भी, जो कह रहा है कि, "अगर अभी नहीं मिला तो इसका मतलब ये नहीं है कि हम माँगना छोड़ देंगे", दोनों बातें। माँग तो यही है कि अभी मिल जाए लेकिन हठ ये भी है कि यदि अभी नहीं मिला तो भी हम माँगते तो रहेंगे अनंत काल तक। ये दोनों साथ चाहिए।

इसीलिए तो आध्यात्मिक हो पाना इतना मुश्किल है क्योंकि दो विपरीत से लगने वाले गुणों को एक साथ साधना पड़ता है। ज़बरदस्त अधीरता भी चाहिए जो ज़िद्द करके, हट करके कह रही हो, "अभी! अगर अभी हो सकता हो तो बिलकुल अभी! अभी! अभी! और अगर नहीं हो सकता, दस साल तक तो इस दस साल में हमारी माँग दम नहीं तोड़ देगी, दस साल बाद भी तुम हमको यहीं पर पाओगे, इतनी ही उत्कंठा से माँगते हुए- कि चाहिए! अभी दो! हम कायम रहेंगे अपनी माँगों को लेकर के, हम पिघल नहीं जाएँगे, हम हार नहीं जाएँगे, हमारा हठ दम नहीं तोड़ देगा", ऐसा आदमी चाहिए। जो कल पर भरोसा बिलकुल नहीं कर रहा है लेकिन अगर बात कल पर चली गई तो वो कल का मुकाबला करने के लिए भी तैयार है।

प्र: आचार्य जी, श्लोकों और उपनिषदों में समझाया जाता है कि ब्रह्म को जानो, तो ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रह्म कोई चीज़ है लेकिन ब्रह्म कोई चीज़ तो होती नहीं, तो इसको कैसे समझा जा सकता है?

आचार्य: हमेशा लोग ऐसे ही रहे हैं- जो झूठ को ब्रह्म समझकर, जो झूठ को सच समझ कर और भ्रम को ब्रह्म समझकर के उपासना करते रहे हैं तो इसीलिए ऋषि ने इतना ज़ोर देते हुए, इतना दोहराते हुए, बार-बार कहा है कि झूठे ब्रह्म को ब्रह्म मत जान लेना क्योंकि लोग किसकी उपासना कर रहे हैं? उसकी जो आँखों से दिखाई दे रहा है। लोग किसकी उपासना कर रहे हैं? उसकी जो कानों से सुनाई दे रहा है। किसी ने कोई कहानी बना ली है, किसी ने कोई प्रतिमा बना ली है, किसी ने कोई धारणा बना ली है और लोग उसी को सच माने बैठे हैं तो ऋषि बड़े प्रयास के साथ, बड़ा ज़ोर दे करके कह रहे हैं- झूठ से बचो! झूठ से बचो! समझ में आ रही है बात?

शब्दों से तुम उसका वर्णन नहीं कर पाओगे हालाँकि सारे शब्द तुम्हारे निकलते इसी प्रयास में है कि उसका वर्णन कर पाओ। आँखों से तुम उसे देख नहीं पाओगे हालाँकि आँखें आकुल उसी को ढूँढने के लिए हैं क्योंकि वो आँखों के पीछे है। आँखों से उसका पुराना परिचय है और आँखें अपने उस पुराने परिचित को खोजना चाहती हैं, जानना चाहती हैं। प्रकृति परमात्मा से आई है न? आँखें उसी परमात्मा से आ रही हैं। आँखों का बहुत पुराना परिचय है उससे और अब आँखें उसे खोज रही हैं लेकिन वो भूल ही गई कि वो तो परिचय पीछे का है आगे का नहीं है। आगे कैसे मिलेगा? आगे वो है ही नहीं वो पीछे है। आँखें जब अपने में प्रवेश करें तो उसे पा जाएँगी। शब्द जब स्वयं में प्रवेश कर जाए तो मौन हो जाएगा। मिल जाएगा वो। मन अगर संसार में ही डोलता रहेगा, मंडराता रहेगा तो नहीं पाएगा उसको लेकिन मन अगर अंतर्गमन करेगा, अपनी ही जाँच-पड़ताल करेगा तो शांत हो जाएगा, सत्य पा जाएगा।

ये तुमको बार-बार चेतावनी दी जा रही है- बाहर मत ढूँढने लग जाना। ये अंतर समझो- खोजने से नहीं मिलेगा, वो खोजी के मूल में है। अपने मूल में नहीं देखोगे तुम, इधर-उधर खोजते रहोगे तो बस समय खराब करोगे, निराशा मिलेगी और ज़्यादातर लोग क्योंकि समय ख़राब करते हैं इसीलिए ऋषि तुम्हें बार-बार सावधान कर रहे हैं जो सच है उसी को ब्रह्म जानो। उसको बिलकुल भी नहीं... नकार समझो, इतना ज़्यादा नकारने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? थोड़ा व्यवहारिक होकर सोचो। इतना ज़्यादा नकारने की और इतना बार-बार नकारने की आवश्यकता क्यों? क्योंकि ज़्यादातर लोग उस समय भी भ्रम की ही उपासना कर रहे थे।

प्र: इसमें आचार्य जी आपने एक चीज़ बताई की, आपने बोला कि प्रकृति वहीं से आई है तो उसको याद है उस चीज़ की, उसको पता है कि वो क्या है तो जब मतलब कहीं-न-कहीं हमें पता है सच क्या है तो जब हम बेचैन होते हैं तो हमें पता होता है कि हम बेचैन हो गए हैं, क्यों? क्योंकि हमें कहीं-न-कहीं पता है कि चैन क्या है। तो जब हमें पता ही होता है अंदर से कहीं-न-कहीं कि चैन ये है फिर भी पूरा जीवन एक के बाद एक, एक के बाद एक, ठोकरें खाते हुए भी, लगातार चलते हुए भी हम क्यों नहीं उसी की ओर... क्योंकि हमें पता तो है कहीं-न-कहीं तुम वहीं से तो आए हो तो फिर वो क्यों लगातार बाहर ढूँढता रहता है?

आचार्य: क्योंकि तुम अपने लिए चैन माँग रहे हो। तुम कह रहे हो तुम्हें चैन मिल जाए। 'तुम्हें' चैन मिल जाए। तुम्हें ऐसा चैन मिल जाए जिसका तुम अनुभव कर सको। तुम कह रहे हो 'मुझे' चैन मिल जाए। तुम ये नहीं कह रहे कि 'चैन हो', 'चैन मात्र हो'। वो तो बहुत छोटी बात होती है न? चैन! सिर्फ शांति! तुम उसमें एक अवांछित तत्व घुसेड़ देते हो- 'मुझे' शांति मिले। अब तुम चाह रहे हो ये दोनों एक साथ हों। क्या? शान्ति और मैं। 'मुझे' चैन मिले, इसलिए मिलता नहीं क्योंकि ये दोनों साथ हो नहीं सकते। तुम्हीं तो बेचैनी हो। तुम्हारे बचे-बचे तुम्हें चैन कैसे मिलेगा? तुम अपने लिए माँग रहे हो, तुम अनुभव करना चाहते हो।

अध्यात्म के रास्ते में जो सबसे बड़ी बाधा है वो ये है कि तुम्हें अनुभव चाहिए, तुम्हें शांति का अनुभव चाहिए, तुम्हें सत्य का अनुभव चाहिए और अनुभव तुम्हें हो सके इसके लिए तुम्हें बचे रहना होगा। तुम खुद को बचा ले गए तो अध्यात्म हो नहीं सकता। सारी दिक्कत ही यही है कि हम रसास्वादन में लग जाते हैं। हर प्रकार का अनुभव एक तरह के भोग की माँग है। जब तुम कहते हो कि खाना स्वादिष्ट है तब तुम यही तो कह रहे हो कि तुम्हें स्वाद का अनुभव हुआ, "आ हा हा हा!" अनुभव ही तो भोग है। इसी तरीके से तुम शांति का भी भोग करना चाहते हो, कंज़्मप्शन ! "मुझे शांति मिले।" ठीक वैसे जैसे तुम बोलते हो- मुझे पैसा मिले, मुझे कुछ मिले, मुझे कुछ मिले... तो किसके लिए मिले? "मुझे अपने लिए मिले।" तो शांति मुझे मेरे लिए मिल रही है तो मैं खत्म होऊँगा या और मोटा जाऊँगा?

श्रोतागण: मोटे हो जाएँगे।

आचार्य: इसलिए नहीं मिलती। माँग तो तुम सही चीज़ रहे हो पर 'ग़लत आदमी' के लिए। तुम्हें परमात्मा तो चाहिए पर किसके लिए? अपने लिए। तो वो मिलेगा नहीं।

प्र: लेकिन आचार्य जी, पूरे उपनिषद में तो यही बोला है कि- तुम कोशिश करो, तुम जानो, तुम जानो और ये बात बोली जा रही है कि जब तक तुम रहोगे तुम जान नहीं पाओगे तो 'मैं' को बोला जा रहा है कि 'मैं' को ही मिटा दिया जाए तो ये बड़ी ही विरोधी...

आचार्य: कोई विरोधाभास नहीं है। यही तो बोला जा रहा है जब तुम कह रहे हो कि पूरा उपनिषद कह रहा है जानो तो यही तो जानना है कि- "बेटा! तुम्हें तो हटना पड़ेगा।" यही बात तो जाननी है और क्या जानना है? कुछ ऐसा थोड़े ही जानना है जो जान कर तुम और बड़े ज्ञानी कहलाओ। यही जानना है कि तुम ही गड़बड़ हो, तुम्हारा ही मामला फँसा हुआ है। जानने को और कुछ भी नहीं है। सारा जानना तुम्हारे नकार का काम है। परमात्मा को पाने जैसा क्या है? एक तरफ तो कह देते हो कि वो सर्वव्यापक है, सार्वभौम है, अंतर्यामी है और फिर कह रहे हो दौड़ लगाकर उसको पाना है।

अंतर्यामी है, सर्वव्यापक है तो दौड़ लगाकर मिलेगा क्या? वो तो हर जगह होगा। बस उस जगह नहीं होता जहाँ पर तुम होते हो। एक बिलकुल खाली स्थान है जहाँ बस तुम मौजूद हो और तुमसे कोई कहे कि, "जगह को खाली कर दो चलो!" या इसको पलट कर ऐसे कहते हैं कि उसको कोई कहे कि, "इस जगह में ख़ालीपन लाना है" और तुम और दौड़ लगा रहे हो कि खालीपन कहीं से ढूँढ कर ले आऊँ, खालीपन कहीं से ढूँढ कर ले आऊँ तो तुम्हें एक बात ही समझ में नहीं आ रही है, क्या? खालीपन लाना नहीं है, तुम्हें खुद को बाहर निकालना है। जगह तो खाली ही थी, तुम्हीं वहाँ पर अतिरिक्त, अनावश्यक भरे पड़े हो। बाहर निकलो!

ये अध्यात्म की पूरी प्रक्रिया है- खालीपन चाहिए और उस खालीपन में तुम्हीं बाधा हो, तुम्हें ही बाहर हटना है तो सारा ज्ञान बस यही है। कोई विशेष ज्ञान नहीं बता देगा कि ऐसा होता है, वहाँ होता है, फलानी जगह पर कमल की पंखुड़ी पर परमात्मा बैठा है, आसमान में खासतौर पर दिव्य शक्तियाँ हैं, आत्माएँ हैं, जिनको डाउनलोड करना है- ये मूर्खता की बातें हैं। अहंकार हटाना है इसके अलावा अध्यात्म की कोई विषयवस्तु नहीं होती।

प्र: जैसा बताते हैं कि ये ऋषि जो थे, जिनसे उपनिषद निकले, ये जंगलों में रहते थे। तो ये बात उन्हें कहाँ से पता चलती थी कि समाज में...

आचार्य: जब ये बात पता चली तभी तो जंगल में पहुँचे। जब देखा कि दुनिया में सब गड़बड़ उपासना चल रही है तभी तो भग कर जंगल गए। ऐसा थोड़े ही है कि जंगल पहुँच करके उनको पता चला कि समाज में गड़बड़ है। समाज में गड़बड़ थी ये जान करके फिर जंगल गए।

प्र: अपडेटेड कैसे रहते थे कि क्या चल रहा है?

आचार्य: वो समझ गए थे देखकर कि दुनिया ऐसी ही है, बदलनी नहीं है। अपडेट तो उस चीज़ का लेना है न जहाँ कोई नई ख़बर आनी हो? नई खबर क्या आनी है? प्रकृति के गुण कुछ ऐसे हैं कि लोग भ्रमित होते रहेंगे। उसमें कुछ बदल नहीं जाना है, तो उन्हें पता है। फिर जिनसे ये बात कही जा रही है वो तो नए-ताजे लोग हैं न? ऋषिवर तो जंगल में हैं पर शिष्य तो जंगल में नहीं पैदा हुए न? तो शिष्यों का हाल देख कर के समाज का हाल पता चल गया ऋषिवर को क्योंकि शिष्य कहाँ से आ रहा है? समाज से आ रहा है। तो शिष्य को देखा और समझ गए कि समाज की क्या दुर्दशा है "कि आ गए बेटा तुम भी?"

प्र: आचार्य जी, पहले आपने एक उदाहरण दिया था। उदाहरण ये था कि प्यासे को जब पानी चाहिए, चाहिए उसे पानी ही लेकिन वो रेत चबाने लग जाता है। इसी तरह से मन या अहंकार को चाहिए विगलन या ब्रह्म चाहिए और वो माया में फँस जाता है तो उसका कारण क्या यही है कि माया ज़्यादा आसानी से उसे मिल जाती है? क्या यही कारण है? प्यासा रेत क्यों चबाने लग गया?

आचार्य: वही उपलब्ध है और कोई बात नहीं है। वही सामने भी है, उसी की उपलब्धता के उदाहरण भी है चारों तरफ, सब वही काम कर रहे हैं तो वो बहुत सहज, बहुत प्राकृतिक लगता है। तुम्हारे सामने दाल रखी है। सभी दाल खा रहे हैं, तुम भी हाथ बढ़ा दोगे। पहली बात तो सामने रखी है और दूसरी बात सभी खा रहे हैं।

प्र: इसमें उसकी क्या कोई ग़लती है?

आचार्य: देखो! जो भुगते उसकी ग़लती। पेट तो तुम्हारा ही खराब हुआ न? तो ले देकर ग़लती तुम्हारी है क्योंकि अपने कल्याण की ज़िम्मेदारी तो व्यक्ति की ही है। तुम दे भी लो दूसरे को दोष, तुम्हें मिल क्या जाएगा? तुम दूसरे को दोष दे भी लो कि, "मेरी ज़िम्मेदारी नहीं थी मैं तो दूसरों की वजह से बहक गया।" इससे तुम्हें क्या फायदा मिल गया?

तो अध्यात्म में ये बहुत केंद्रीय बात होती है कि उत्तरदायित्व हमारा है। किसी भी वजह से हमने कोई भ्रम पाला, किसी भी वजह से हमने कोई उल्टा-पुल्टा अनर्थ किया, हम वजह को दोष नहीं देंगे, ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेंगे क्योंकि अंततः कष्ट किसने झेला? हमने झेला। ज़िम्मेदारी हम अपने ऊपर लेंगे।

प्र: ऐसा सिस्टम है क्यों जिसमें माया सर्वव्यापी है और ब्रह्म छुपा हुआ है? इसका क्या कारण है?

आचार्य: "किसके लिए है?" ये पूछा जाता है। "क्यों है?" नहीं। तुम्हें लग रहा है कि है, हो सकता है उसको ना लग रहा हो कि है। जो माया में फँसा हुआ है माया उसके लिए है, जो माया में नहीं फँसा हुआ है उसके लिए माया नहीं है। तो ऐसा थोड़े ही है कि माया कोई सार्वजनिक चीज़ है या माया कोई वस्तुगत, ऑब्जेक्टिव चीज़ है कि तुम पूछो कि, "ये है माया और ये क्यों है?" नहीं! ये सिर्फ उसके लिए है जो इसमें फँसा हुआ है, जो इसमें नहीं फँसा हुआ है उसके लिए है ही नहीं। तो ये मत पूछो कि, "माया क्यों है?" फिर प्रश्न पलट कर तुम्हारे ऊपर आ जाता है, ज़िम्मेदारी तुम्हारी हो जाती है।

अब प्रश्न क्या हो गया? कि, "तुम फँसे क्यों हुए हो?" हो गई न गड़बड़। "माया क्यों है?" इसमें ज़िम्मेदारी किसके ऊपर आ गई? दोष किसके ऊपर आ गया? माया के ऊपर। "तू है ही क्यों?" और "मेरे लिए क्यों है माया?" अब इसमें ज़िम्मेदारी किसके ऊपर आ गई? मेरे ऊपर आ गई कि, "भाई! मैं ऐसा क्यों हूँ कि मुझे माया ही माया दिखाई देती है?"

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