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चेतना क्या है? || आत्मबोध पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आत्मचैतन्यमश्रित्य देहेन्द्रियमनोधिय:। स्वकीयार्थेषु वर्तन्ते सूर्यालोकं यथा जना:॥

आत्मचैतन्य के आश्रय में ही शरीर, इंद्रियाँ, मन और बुद्धि अपनी अलग-अलग क्रियाएँ करते हैं, जैसे सूर्य के प्रकाश में मनुष्यों की क्रियाओं का संपादन होता है।

—आत्मबोध, श्लोक २०

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमन। श्लोक से समझ आया कि आत्मा के आश्रय में शरीर की सारी क्रियाओं और सूर्य के प्रकाश के आश्रय में मनुष्य की सारी क्रियाओं का संपादन होता है। कृपया प्रकाश डालें। धन्यवाद!

आचार्य प्रशांत: समझाया जा रहा है कि आत्मा कोई वस्तु नहीं है, कोई विषय नहीं है। जैसे इस कक्ष में बहुत सारी चीज़ें दिखाई पड़ रही हैं प्रकाश में, पर प्रकाश अपने-आपमें कोई चीज़ नहीं है। सब चीज़ें दिखाई पड़ रही हैं प्रकाश में, लेकिन प्रकाश अपने-आपमें कोई चीज़ नहीं है। चीज़ माने विषय, वस्तु।

तो आत्मा क्या है?

आत्मा वो है जिसके होने से सब हो रहा है। सब हो रहा है, माने कहाँ हो रहा है? सब गतियाँ जहाँ हैं, उसको कहते हैं चेतना। सब पदार्थ, सब वस्तुएँ, सब विषय जहाँ हैं, उसको कहते हैं चेतना।

चेतना क्या है? जहाँ सब कुछ है, जहाँ आकाश भी है और आकाश के सारे ग्रह-नक्षत्र, सब तारामंडल हैं। चेतना क्या है? ये कमरा, जिसमें सब लोग हैं। चेतना क्या है? जिसमें भूतकाल है, भविष्य भी है। चेतना क्या है? जिसमें सपने भी हैं, तथ्य भी हैं। जो कुछ भी तुम कह सकते हो कि ‘है’, वो कहाँ हैं? चेतना में। तो जब आदि शंकराचार्य कह रहे हैं शरीर, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, इनकी क्रियाएँ और मनुष्य की क्रियाएँ, तो ये किसकी बात कर रहे हैं वो? चेतना की, क्योंकि चेतना में ही सारी क्रियाएँ हैं।

सब जड़-चेतन पदार्थ कहाँ हैं?

चेतना में। क्रिया-अक्रिया सब कहाँ हैं? चेतना में। उठे कुछ तो कहाँ उठे?

श्रोतागण: चेतना में।

आचार्य: गिरे कुछ तो कहाँ गिरे?

श्रोतागण: चेतना में।

आचार्य: था कुछ तो कहाँ था?

श्रोतागण: चेतना में।

आचार्य: नहीं है कुछ तो कहाँ नहीं है?

श्रोतागण: चेतना में।

आचार्य: ठीक है? आदि शंकराचार्य कह रहे हैं आत्मा चेतना का आधार है, चेतना के अंदर का कोई विषय नहीं।

समस्त विषय कहाँ स्थित हैं?

श्रोतागण: चेतना में।

आचार्य: चेतना में। आत्मा चेतना का विषय नहीं, आशय है कि आत्मा अचिंत्य है क्योंकि चेतना में जो कुछ भी है, उसका चिंतन किया जा सकता है, चेतना में जो कुछ भी है, उसे नाम दिया जा सकता है। किसी की चेतना में ऐसा कुछ है जिसका कोई नाम ना हो? चेतना में जो कुछ भी है, उसका आकार भी होता है, है न? चेतना में जो कुछ भी होता है, उसकी शुरुआत भी होती है और अंत भी होता है।

आत्मा अनादि, अनंत है; आत्मा निराकार है; आत्मा अनुपाधि है; आत्मा अनाम है। आत्मा के साथ ना कोई विशेषण जोड़ सकते हो, ना बता सकते हो कहाँ शुरू होती है, ना उसकी सीमाएँ बता सकते हो। चेतना में जो कुछ है, उसकी सीमाएँ हैं, नाम है, आता है, जाता है, रंग है, रूप है, आकार है; आत्मा अरूप है, निराकार है।

चेतना के होने से आत्मा नहीं है, चेतना के भीतर आत्मा नहीं है। आत्मा वो बिंदु है जिससे चेतना प्रस्फुटित होती है, या कह लो कि आत्मा वो महा आकाश है जिसमें चेतना के कई आकाश डोलते फिरते रहते हैं, आते-जाते रहते हैं। या तो कह सकते हो कि चेतना बिंदु मात्र है, शून्यवत है और उस बिंदु भर से समस्त ब्रह्मांड आविर्भूत होता है। ऐसे भी कह सकते हो, 'कुछ नहीं' है आत्मा; आत्मा वो 'कुछ नहीं' है जिससे सब कुछ आता है। और कहने वालों ने ऐसा भी कहा है कि आत्मा वो सब कुछ है जिसमें ये तुम्हारा छोटा-सा संसार समाया हुआ है और तृण मात्र, कण मात्र है।

सीख — कह मत देना कुछ आत्मा के बारे में, क्योंकि जब वो चेतना का विषय ही नहीं है, तो तुम कह कैसे रहे हो कुछ? आत्मा के बारे में कम बोलो, मन के बारे में बोलो। मन और चेतना अगल-बगल की बात हैं, मन और चेतना एक जैसी बात हैं। मन के बारे में बोलो, क्योंकि जो कुछ बोला जा सकता है, मन के ही बारे में बोला जा सकता है। अवलोकन करो तो किसका?

श्रोतागण: मन का।

आचार्य: मन का। ये ना करने लग जाना कि "मैं आत्मा का अवलोकन कर रहा था।" बहुत आते हैं ऐसे भी आध्यात्मिक जिज्ञासु, वो कहते हैं कि आत्मा के दर्शन करने हैं। ज़रूर! और बहुत गुरु हैं जो बताते हैं कि आत्मा का दर्शन कैसे किया जाता है।

आत्मा के आशीर्वाद से दर्शन करोगे तो किसका करोगे?

मन का, मन का कर लो। और मन के ही केंद्र को बोलते हैं अहम्। मन का दर्शन करो, मन का दर्शन करते-करते अहम् तक पहुँचोगे। जिसने अहम् को देख लिया, उसने अहम् को पिघला दिया। ये सब कुछ होता किसकी अनुकंपा से है? आत्मा की। उसके बल से सब है, उसकी अनुकंपा से सब है, उसके होने से तुम हो। इतने अहंकारी मत हो जाना कि अपने नन्हे हाथ बढ़ाकर कहो कि आत्मा को ही पकड़ लेना है। वो अनंत है, उसको कैसे पकड़ लोगे भाई?

तुम्हारे हाथों से एक हाथी का बच्चा तो पकड़ा ना जाए, असीम आत्मा कैसे पकड़ लोगे? हाथी का बच्चा भी छोड़ दो, अरे, बड़ा खरबूजा ना पकड़ा जाए। और आत्मा को पकड़ने निकलते हैं लोग, कहते हैं “आत्मा का अनुसंधान करना है।” अपनी औक़ात देखो! “आत्मा का अनुसंधान करना है”, किसे? "हमें!" अरे बाप रे बाप! तुम आत्मा का अनुसंधान करने निकले हो!

अहंकार की यही बात, चूँकि उसे अपनी सीमाओं का कुछ ज्ञान नहीं, इसीलिए वो असीम को भी तुच्छ समझने लगता है। जिसे अपनी सीमाओं का ज्ञान नहीं होता, उसमें असीम के प्रति आदर नहीं होता। किसी में असीम के प्रति यदि आदर है, तो समझ लेना कि उसमें अपनी सीमाओं का ज्ञान भी होगा — यही विनम्रता है।

अब तुम ये भी पूछ सकते हो कि “ठीक, इतना तो समझ में आ गया कि आत्मा चेतना का विषय नहीं हो सकती, लेकिन आपने ये क्यों कहा कि आत्मा की अनुकंपा से चेतना के सारे विषय अपना काम करते हैं?”

शंकराचार्य कह रहे हैं, "आत्मचैतन्य के आश्रय में शरीर, मन, बुद्धियाँ अपनी-अपनी क्रियाएँ करते हैं, जैसे सूर्य के प्रकाश में मनुष्य क्रिया करते हैं।" ये तो ठीक है कि आत्मा विचार का, मनन का, चैतन्य का विषय नहीं हो सकती, लेकिन ये क्यों कह रहे हैं आप कि आत्मा वो बिंदु है जिससे चेतना प्रस्फुटित होती है?

वजह है। चेतना में जो भी कुछ हो रहा है, वो एक अपूर्णता के चलते हो रहा है। तुम कहीं जाते हो, यूँ ही नहीं चले जाते, तुम जाते हो क्योंकि तुम्हें कुछ चाहिए। यहाँ तक कि जड़ पदार्थ भी एक तरह से पूर्णता की तलाश कर रहे हैं। ये (चाय का कप उठाते हुए) ऐसे रखा है तो रखा रहेगा और ऐसे खड़ा करूँ या ऐसे खड़ा करूँ तो गिर जाएगा। जड़ पदार्थ भी क्रिया कर रहा है, क्योंकि उसको स्टेबल इक्विलिब्रियम (स्थिर संतुलन) चाहिए, ये (कप को सीधा रखते हुए) स्टेबल-इक्विलिब्रियम है। जड़ पदार्थ भी अनस्टेबल (अस्थिर) नहीं रहना चाहता। तो चैतन्य जीव तो स्थिरता की तलाश कर ही रहे हैं, जो जड़ है, वो भी स्थिरता की तलाश कर रहा है।

हाई एनर्जी मॉलिक्यूल (उच्च ऊर्जायुक्त अणु) चाहता है कि एक्सोथर्मिक रिएक्शन (ऊष्माक्षेपी प्रतिक्रिया) करे और लो एनर्जी मॉलिक्यूल (निम्न ऊर्जायुक्त अणु) बन जाए। एक्सोथर्मिक रिएक्शन होता ही यही है कि उस अणु में ऊर्जा बहुत थी—और ऊर्जा माने बेचैनी—उसने कुछ ऐसा करा कि ऊर्जा बाहर निकल जाए, धमाका हो जाए, आग लग जाए, विस्फोट हो जाए, तापमान बढ़ जाए। इन सब में क्या होता है? ऊर्जा निकल जाती है और फिर वो एक लो एनर्जी मॉलिक्यूल बन जाना चाहता है।

रेडियोएक्टिविटी (रेडियोधर्मिता) में भी यही होता है। रेडियोएक्टिव मॉलिक्यूल (रेडियोधर्मी अणु) क्यों बार-बार विखंडित होता रहता है? ताकि वो अंततः नॉन-रेडियोएक्टिव हो जाए; टूट-टूटकर, टूट-टूटकर, टूट-टूटकर वो ऐसा हो जाए कि उसे और टूटने की ज़रूरत ना पड़े। अहंकार भी तो यही चाहता है कि “मुझे तोड़ो, मुझे तोड़ो, मुझे तोड़ो। अंततः मैं ऐसा हो जाऊँ कि मुझे टूटने की ज़रूरत ही ना पड़े।” ये चेन रिएक्शन (श्रृंखला अभिक्रिया) है। हमारी ज़िंदगी भी तो चेन रिएक्शन ही है न? हम चाहते हैं कि टूटते रहें, टूटते रहें, टूटते रहें।

तो जितने पदार्थ चेतना में गति कर रहे हैं, चाहे वो मनुष्यरूपी पदार्थ हों या जड़रूपी पदार्थ हों, वो सब कहीं-न-कहीं पहुँचना चाहते हैं; सबको चैन चाहिए। चेतना के भीतर जो कुछ है, वो चैन की तलाश कर रहा है, उसी चैन को आत्मा कहते हैं, उसी शांति को आत्मा कहते हैं। इसीलिए आत्मा का दूसरा नाम शांति है। चेतना में जो कुछ है, अशांत है; उसको जो चाहिए, उसका नाम शांति है और अगर शांति मिल गई तो चेतना का जो पूरा ब्रह्मांड है वो सिकुड़ करके पुनः बिंदुवत हो जाता है। तो इसलिए कहा जा रहा है कि जब चेतना शांत हो करके वापस बिंदु में समा जाती है, तो निश्चित रूप से वो उसी बिंदु से उद्भूत भी हुई है।

तुम जितने अशांत हो, तुम उतनी गति कर रहे हो, और जितने तुम शांत होते गए, उतनी तुम्हारी गति सिकुड़ती गई, सिकुड़ती गई, अंततः तुम रह गए बस एक बिंदु, उस बिंदु का नाम आत्मा है। जब तुम शांत हो करके बिंदुवत हो जाते हो, तो स्पष्ट है कि अशांति में उसी बिंदु का विस्तार तुम्हारी अशांत चेतना बन जाता है।

(प्रश्न पढ़ते हुए) कह रहे हैं, “आचार्य जी, जब मैं आत्मा के बारे में सोचता हूँ…।”

(श्रोतागण हँसते हैं)

अभी क्या बात हो रही थी—कि आत्मा के बारे में?

श्रोतागण: सोचना नहीं है।

आचार्य: सोच मत देना, बात भी मत करना। और सवाल ही कहाँ से शुरू हो रहा है? “आचार्य जी, जब मैं आत्मा के बारे में सोचता हूँ तो इस निष्कर्ष पर आता हूँ...।” सोचा ही भर नहीं है, निष्कर्ष भी निकाल लिया—“...कि आत्मा का नाम बस एक विधि मात्र है हमें हमारे झूठ दिखाने के लिए। लेकिन जब मैं आपको या अन्य संतों को सुनता हूँ या भजन सुनता हूँ तो मेरा ये भाव गहराता है कि सत्य का अस्तित्व सही में है और बस सत्य ही है।”

दोनों ही बातें हैं, कोई विरोधाभास नहीं है। सत्य है भी और सत्य झूठ को काटने की विधि भी है। ठीक है, इसमें तुम विरोध क्यों देख रहे हो? कोई विरोधाभास नहीं। आगे तुमने लिखा ही यही है, “मन को इन दोनों बातों में विरोधाभास लगता है। कृपया मार्गदर्शन करें।”

जो है ही, वही तो काटेगा उसको जो नहीं है। जो असली है, उसी के संपर्क में आ करके तो तुम नकली को नकली कह पाओगे। असली से तुम्हारा कोई संबंध, कोई संपर्क ही ना हो, तो नकली भी दावा करता रहेगा असली होने का। उसकी पोल थोड़े ही खुलेगी, या खुलेगी? नकली की पोल खुलती ही तब है जब असली की झलक मिल जाती है, और एक झलक मिली नहीं असली की कि नकली धराशायी। इसीलिए नकली असली से बहुत घबराता है।

सौ साल तुम नकली के साथ रह लो, और असली की एक झलक मिल जाए पाँच सेकंड के लिए, वो सौ साल हल्के पड़ जाएँगे। झूठ के साथ तुम्हारा सौ साल का नाता हो, झूठ के साथ तुम्हारा सौ साल का संबंध हो, कसमें हों, वादे हों, वो सब ख़त्म हो जाता है सच के साथ एक मिनट के सान्निध्य से। वो एक मिनट सौ साल पर भारी पड़ जाता है। झूठ इसीलिए थरथराता रहता है कि कहीं सच आस-पास ना हो। “हमारा खेल है तो बहुत पुराना, लेकिन भस्म क्षण भर में हो जाता है।”

कोई विरोधाभास नहीं है।

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