आचार्य प्रशांत: पूछ रहे हैं— मैंने आपके वीडियोज़ अपने ब्रेकअप के बाद सुनने शुरू किये। जब मुझे जीवन ने पीड़ा दी, उसके बाद ही मैं आपको ध्यान से घंटों तक सुन पाया। अब मैं मौज़ में हूँ।पर वो बीता एक साल जो मैंने रो-धोकर बिताया, वो न होता अगर मैं आपको पहले सुन लेता। हमसब लातों के भूत क्यों हैं? सीधे सच को क्यों नहीं अपनाते?
देखो, सीधा सच अगर तुमको सीधा-सीधा दिखने लगे, सीधे सच को सीधे ही देखने की अगर तुम्हारी मंशा ही हो जाए तो झूठ का खेल फिर तत्काल ही ख़त्म हो जाएगा न! ये जो इतना प्रपंच चल रहा है—नाटक-नौटंकी; ये होगा ही नहीं। सीधा सच अपने मुक़ाबले में किसी को ठहरने नहीं देता। उसका कोई उत्तर नहीं होता, उसका कोई सानी नहीं होता, उसका कोई विरोध किया नहीं जा सकता। तो खेल बड़ा एकतरफ़ा हो जाएगा अगर एक तरफ़ साक्षात सत्य है और दूसरी तरफ़ झूठ। झूठ मुक़ाबले में कहीं ठहरेगा ही नहीं।
खेल चलता रहे, अगर यही हमारी भीतरी इच्छा है तो फिर बहुत ज़रूरी है कि सच और झूठ के इस मुक़ाबले में किसी तरह से कुछ छल करके सच का पलड़ा हल्का किया जाए और झूठ को किसी तरीक़े से मज़बूत किया जाए।
बात समझ रहे हो न?
अगर मुक़ाबला सफ़ाई से हो, ईमानदारी से हो तो सच और झूठ की लड़ाई जैसी कोई चीज़ होगी ही नहीं क्योंकि सच के मुक़ाबले झूठ एक पल भी कहाँ ठहरेगा? लेकिन दुनियाभर में हम देखते हैं कि सच-झूठ का मुक़ाबला चल रहा है, लगभग बराबरी का चल रहा है। कभी सच, कभी झूठ। तुम ये भी कह सकते हो कि अक्सर तो अनुभव में ये आता है कि झूठ ही ज़्यादा जीत रहा है।
ऐसा सिर्फ़ तब हो पाएगा, जब सच-झूठ आमने-सामने हों और सच के खिलाफ़ तुमने कई तरीक़े के भ्रम और तर्क तैयार कर रखे हो और झूठ के पक्ष में तुमने कई तरीक़े की चालें चल रखी हों। सिर्फ़ तब ऐसा हो सकता है कि दो ऐसी ताक़तें जो बेमेल हैं, जिनकी शक्ति की आपस में कोई तुलना ही नहीं है, वो दोनों ताक़तें आपस में करीब-करीब समान शक्ति वाले प्रतिद्वंदियों की तरह उलझा दी जाए।







