प्रश्नकर्ता: मुझे दिखाई पड़ रहा है कि सत्यवती के पिता का लालच एक भयानक युद्ध का बीज था। भीष्म एक कुशल राजनेता और विद्वान होते हुए भी ये देख क्यों न सके? क्या उनका अपना भी कोई लालच था? हमारे जीवन में जब लालच बीज रूप में ही हो तो उसे कैसे देखें? लालच किन-किन रूपों में आ सकता है? क्या इसे देख पाना संभव भी है? क्या लालच का तभी पता चलता है जब परिणाम सामने आते हैं?
आचार्य प्रशांत: बहुत सारी बातें बोली हैं आपने। हाँ, भीष्म का अपना लालच था। भीष्म का लालच था कि उन्हें एक सुयोग्य पुत्र कहलाना था, उन्हें सत्य से ज़्यादा पिता प्यारे थे। उन्होंने जो भी प्रतिज्ञा ली, किसकी ख़ातिर ली? पिता के सुख की ख़ातिर। और ये भी वो देख रहे हैं कि पिता इसलिए नहीं दुखी हैं कि पिता को शिव नहीं मिल रहे, कि राम नहीं मिल रहे; पिता दुखी इसलिए हैं क्योंकि उनको सुगंधित तन वाली सत्यवती नहीं मिल रही थी।
अब पिता दुखी बैठे हैं कि पहली पत्नी भग गई, पहली कौन थी? गंगा। पहली पत्नी भाग गई तो बड़ा अकेलापन लगता है, फिर गए तो वहाँ पर वो मछुआरिन दिखी, सत्यवती। अब कहानी कहती है कि पहले उससे दुर्गंध आती थी, फिर ऋषि आए, ऋषि ने उसको कुछ वरदान दे दिया तो वो सुगंधित हो गई, उससे सुगंध की लपटें-सी निकलने लगीं, ऐसी वो। बात कुछ नहीं है, मछुआरिन है तो शरीर से थोड़ी बास आना ज़ाहिर-सी बात है। फिर कोई ऋषि आए होंगे, कुछ जड़ी-बूटी दे गए होंगे कि लगा लिया कर तो बदबू कम मारेगी। वो ऋषि जड़ी-बूटी भी दे गए, साथ में एक बच्चा भी दे गए।
(श्रोतागण हँसते हैं)
पहले ऐसे ही था, मामला खुल्लम-खुल्ला। महाभारत तुमको बड़ी शिक्षा देगी, यहाँ कोई शर्म-लिहाज़ नहीं है, आवश्यकता भी नहीं। बात मज़ाक से आगे की भी है। तो वैसे तो पिता हैं, राजा का धर्म होता है प्रति-क्षण प्रजा की सेवा में उद्यत रहना। ठीक? और ये कौन-से राजा हैं जो इसी दर्द में तड़पे जा रहे हैं कि वो कामिनी मछुआरिन नहीं मिल रही? और भीष्म को ये देखना चाहिए था न? और उसके बाद, जैसी वो, वैसे ही उसका बाप। वो कह रहा है कि “नहीं, नहीं, ये नहीं है, वो नहीं है। राजा की बीवी होने से क्या होगा, राजपाट की भी तो कुछ आश्वस्ति दो।" और फिर एक-के-बाद एक भीष्म प्रतिज्ञा ही किए जा रहे हैं, कभी कह रहे हैं, “गद्दी पर नहीं बैठूँगा”, कभी कह रहे हैं कि “कुँवारा रह जाऊँगा”, और फिर कह रहे हैं कि “नहीं, सदा सिंहासन का सेवक रहूँगा।" तो ये भीष्म का लालच था कि सुयोग्य पुत्र कहलाओ, भीष्म ने भी देह के रिश्ते को बड़ी प्रधानता दे दी। भीष्म-प्रतिज्ञा न हुई होती तो महाभारत नहीं हो सकती थी।




