प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं अपना प्रश्न एक उदाहरण से प्रारम्भ करूँगा। जैसे आज़ादी के तुरन्त बाद भारत और पाकिस्तान जो साथ में देश थे वो अलग हो गये। और उसके कुछ समय तक भी पाकिस्तान नहीं चल पाया और उसमें से भी पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों अलग हो गए। तो आचार्य जी, मेरा प्रश्न यह है कि हम जो मनुष्य हैं वो समय के साथ-साथ दलों में क्यों बँट जाते हैं। राष्ट्र, धर्म, जाति और उनमें क्यों बँट जाते हैं। और उसके बाद भी सबडिवीज़न (उपखंड) भी उसी में हो जाता है। और इसके लिए हमें क्या करना चाहिए।
आचार्य प्रशांत: क्या करना चाहिए तो आ जाएगा जब समझ जाओगे जब कि हम बाँटते क्यों हैं। भीतर जो अहम् होता है न वो बड़ी छोटी चीज़ होता है। वो अपने चारों ओर ऐसे सीमा खींचकर रखता है। अपने होने के लिए ही उसको विभाजन करना पड़ता है, ठीक है? उदाहरण के लिए, मैं चोपड़ा खानदान का वंशज हूँ, कुलदीपक हूँ। तो विभाजन करना पड़ गया न? अब आप चोपड़ा खानदान के कुलदीपक हैं और बग़ल में कौन लोग रहते हैं? वो कुमार फ़ैमिली। तो आप उनसे अलग हो गए, आपको होना पड़ेगा। जो चोपड़ा लोग हैं वो कुमार लोग नहीं हो सकते। वो दो अलग-अलग लोग हो गए, बस हो गया। और आप चूँकि स्वयं को जानते नहीं तो इसीलिए आपको कहना पड़ता है कि आपका क्या नाम है, अमित चोपड़ा।
जब आप ख़ुद को नहीं जानते कि आपकी असली पहचान क्या है, तो आप अमित चोपड़ा बन जाते हो। और अमित चोपड़ा बनते ही बग़ल में जो सुनील कुमार रहता था, उससे तो आप अलग हो गए न। लो हो गया बँटवारा, बात ख़त्म। अहम् को अपने होने के लिए किसी-न-किसी से चिपकना पड़ेगा, ठीक है? उस बेचारे की मजबूरी यह है कि वो सबसे नहीं चिपक सकता, वो छोटू है। वो उछलकर के किसी एक की पॉकेट (जेब) में घुस सकता है। जैसे चूहा छोटा-सा कोई। आप यहाँ इतने लोग बैठे हो, आप सबकी पॉकेट में वो इकट्ठे नहीं घुस सकता। और अपने जीने के लिए ज़रूरी है वो किसी-न-किसी की पॉकेट में घुसे ज़रूर। अहम् फ्री रेडिकल (मुक्त मूलक) की तरह है, अकेले नहीं चल पायेगा बहुत देर तक। वो कहीं-न-कहीं जाकर के रिएक्शन (अभिक्रिया) करेगा। तो वो जाकर के कहाँ घुस गया है? द चोपड़ास की जेब में।







