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(भक्तिसूत्र-1) भक्ति प्रेम है, और प्रेम बिना ज्ञान नहीं || आचार्य प्रशांत कार्यशाला (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
74 min
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आचार्य प्रशांत: जी, स्वागत है! बताइए।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। कल मेरी एक ऑनलाइन प्रतिभागी सोमेश जी से बात हो रही थी, तो मैंने पूछा कि आज की कार्यशाला के लिए उनका प्रश्न क्या है। एक अजीब-सी बात उन्होंने कही कि आचार्य जी ने गीता पर जो चर्चा करी है उससे उनको बहुत सारे श्लोकों का एकदम वास्तविक अर्थ जानने को मिला। तो एक तरह से ऐसा हुआ कि पहली बार असली अर्थ क्या होता है वो समझ पाए। उन्होंने कहा, ‘क्या ऐसा हो सकता है कि आचार्य जी नारद भक्तिसूत्र पर भी इसी तरह की चर्चा करें?’

अब जब उन्होंने ये बात कही, तो मैंने उनसे कहा कि जितना मैं जानता हूँ शायद ‘भक्तिसूत्र' में चौरासी सूत्र हैं और आप एक दिन पहले बता रहे हैं, तो शायद ये संभव नहीं हो पाएगा। पर उनका ज़्यादा रुझान, झुकाव था इसकी तरफ़। और मैंने खुद भी देखा कि जितने भी प्रश्न आए हैं प्रतिभागियों के, उन पर यदि हम एक तरफ़ से देखें तो ‘भक्तिसूत्र' शायद सभी का उत्तर दे सकते हैं।

तो उन्होंने मुझसे थोड़ी जब बात करी, उसके ऊपर वो चाहते हैं कि कुछ सूत्र हम इकट्ठा करें कम-से-कम आपके सामने रखने के लिए, तो मैंने और उन्होंने रात को बैठकर — मुझे पता था कि चौरासी सूत्र तो अगर लेने बैठे तो पूरे दो दिन चले जाएँगे — तो कुछ सूत्रों की एक श्रृंखला बनाई है। मैं कोशिश कर रहा था कम करने की, पर अभी भी छत्तीस तो बचे हैं।

आचार्य: छत्तीस।

प्र: साथ में मैं एक चीज़ और कहना चाहूँगा, जो प्रश्न था उनका मुख्यतः वो ये था कि भक्ति और प्रेम में संबंध क्या है और भक्ति वास्तविक तौर पर कहते किसे हैं? साथ में वो इस चीज़ को जानने में और रुचि रख रहे थे कि जैसे हम हमेशा कहते हैं कि दो मार्ग होते हैं: एक होता है भक्तिमार्ग और एक होता है ज्ञानमार्ग, तो भक्ति और ज्ञानमार्ग में क्या अंतर है?

आचार्य: कार्यशाला का विषय प्रेम है। ठीक है! तो प्रेम से शुरू करके भक्ति तक जा सकते हैं। वहाँ से शुरुआत करी जा सकती है, समझाया जा सकता है। आप लोग नारद भक्तिसूत्र जानते हैं, क्या है?

तो जैसे हर मार्ग के अपने विशिष्ट ग्रंथ होते हैं — पारिभाषिक ग्रंथ, जिनसे परिभाषा ही मिलती है कि वो मार्ग क्या है — वैसे ही भक्तिमार्ग में नारद भक्तिसूत्र है जो कि अधिकारपूर्वक मार्ग की घोषणा करते हैं; और शांडिल्य भक्तिसूत्र हैं। और इन दोनों में भी ज़्यादा महत्त्व और लोकप्रियता नारद भक्तिसूत्र की रही है।

तो सूत्र जैसे होते हैं वैसे ही हैं, एकदम संक्षिप्त, अर्थपूर्ण। उनको समझ लेंगे तो हो जाएगा। तो शुरुआत वैसे ही जैसे सब सूत्रों में होती है।

अथातो भक्तिं व्याख्यास्याम:।।१।।

अब हम भक्ति की व्याख्या करते हैं।

सा त्वस्मिन परमप्रेमरूपा।।२।।

वह उसके प्रति परम-प्रेम का रूप रखती है।

वह उसके प्रति परम-प्रेम का रूप रखती है। किसके प्रति? उसके प्रति। ठीक है? कुछ अभी यहाँ पर कहा नहीं गया है कौन। वही जैसे वेदांत की शैली है न, ‘तत्' कहकर छोड़ देना। इशारे से, पॉइंटर में छोड़ देना। ठीक उसी तरीके से।

सा त्वस्मिन परमप्रेमरूपा।।२।।

‘वह' उसकी तरफ परम-प्रेम के रूप वाली है।

इसमें बेहतर होगा, ऐसे आगे बढ़ने से पहले कुछ बिलकुल आधारभूत बातें स्पष्ट कर लें। बल्कि वो बातें स्पष्ट हो जाएँगी तो फिर ये सूत्र अपनेआप स्पष्ट होने लगेंगे। है न? ऐसे एक-एक सूत्र लेंगे तो बात उतनी बनेगी नहीं। (बोर्ड की ओर संकेत करते हुए) इसको लेकर आइएगा, मैं इस पर लिखूँगा।

फर्स्ट प्रिंसिपल्स , एकदम जो आधारभूत सिद्धांत हैं उनको समझेंगे थोड़ा-सा। और उनको समझने के लिए… (वाइट बोर्ड पर एक तरफ भक्ति और दूसरी तरफ ज्ञान लिखते हैं)

गीता समागम में कितने लोग साथ हैं? (श्रोतागण हाथ उठाते हैं) ठीक है, बहुत सारे। तो जब हम वहाँ तीन की बात करते हैं तो कौन से तीन हैं?

श्रोतागण: अहम्, आत्मा और प्रकृति।

आचार्य: ठीक है न? उसमें जो मॉडल हम बनाते हैं उसमें कहते हैं कि अहम् बीच में है, उसके एक तरफ़ प्रकृति है, एक तरफ़ मुक्ति है। इधर (दायीं ओर) प्रकृति, इधर (बायीं ओर) मुक्ति। इधर (दायीं ओर) प्रवृत्ति, इधर (बायीं ओर) निवृत्ति या इधर (दायीं ओर) संसार, इधर (बायीं ओर) आत्मा। ऐसे ही कहते हैं न?

भक्ति और ज्ञान को पूरा समझना है तो उस मॉडल को थोड़ा-सा और रिफ़ाइन (परिशोधित) करके देखेंगे। (आचार्य जी वाइट बोर्ड पर भक्ति के कॉलम में गोलाकृति और ज्ञान के कॉलम में गोलाकृति खींचते हैं। उस गोलाकृति के केंद्र में एक बिंदु स्थापित करते हैं और उन दोनों ही गोला कृतियों की परिधि के बाहर भी एक-एक बिंदु स्थापित करते हैं)

(गोलाकृति के मध्य में स्थापित बिंदु की ओर संकेत करते हुए) ये जो अहम् है ये है बीच में इस बिंदु पर, तो ये पूरी क्या हुई? (गोलाकृति की परिधि की ओर इशारा करते हुए) ये जो सीमा है, बाउंड्री है, ये क्या हुई?

श्रोतागण: प्रकृति।

आचार्य: है न? संसार, प्रकृति, मन जो भी बोलिए इसको।

(गोलाकृति के बाहर स्थापित बिंदु की ओर इशारा करते हुए) ये आत्मा है। बाहर है। ठीक है? आत्मा कोई बाहर ऐसी बिंदु होती नहीं है, बस हम समझने के लिए कर रहे हैं।

अगर आप उसे कोई बिंदु बना देंगे, कोई लोकेशन बना देंगे, तो आपने उसको डिफ़ाइन (परिभाषित) कर दिया, सिचुएट (स्थापित) कर दिया। और अगर आपने उसको ऐसा कर दिया तो आपने उसको एक परिभाषा दे दी, आपने उसको कुछ मानसिक बना दिया। तो वैसी होती नहीं है, पर सिर्फ़ इस बात को जतलाने के लिए कि आत्मा प्रकृति के क्षेत्र से बाहर है, हमने उसको यहाँ पर एक बिंदु बना दिया। और ये बीच में क्या है? इसको क्या कहेंगे? (बनाए गए मॉडल को पुनः दर्शाते हुए)

श्रोतागण: अहम्।

आचार्य: तो अहम् वास्तव में तो प्रकृति के बीच में ही है न, उसके केंद्र में ही बैठा हुआ है न। ये सब दृश्य है और ये उसका क्या है? दृष्टा। (गोलाकृति के मध्य स्थापित बिंदु अहम् और गोलाकृति की परिधि पर फैली है प्रकृति) ये पूरा क्षेत्र है। ये क्या है उसका? क्षेत्रज्ञ।

तो शुरुआत करते हैं ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग को समझने से कि होता क्या है। ये जीव की अवस्था है। ये हम सबकी हालत है। (आकृति की ओर संकेत करते हुए)

ठीक है न?

यह हमसब की हालत है। हम ये हैं। (आकृति के केंद्र को दर्शाते हैं) हम यहाँ पर हैं। (केंद्र में) ये अहम् है। ये मैं हूँ। इसको आप ‘मैं’ लिख सकते हैं, आई (अंग्रेज़ी का मैं) लिख सकते हैं। अपने नोट्स में लिख लीजिए। यहाँ हमारे पास इतनी जगह नहीं है। तो ये जो बिंदु है बीच में, ये हम हैं। ये दुनिया है। (बिंदु के चारों ओर)

ठीक है?

और पहली बात ये है कि इस दुनिया में जो जीव है उसको दुख मिल रहा है। ये पहली सच्चाई है। ये स्थिति है हमारी और इस स्थिति में हमें दुख मिल रहा है। ये स्थिति है हमारी और इस स्थिति में हमें दुख मिल रहा है — ये हमारी सच्चाई है।

चाहे ज्ञान हो, भक्ति हो कुछ भी हो, उस पर बाद में आएँगे कि दोनों में अंतर क्या आ जाता है। पर शुरुआत दोनों की एक जैसी होती है। शुरुआत हम सबकी एक जैसी होती है। कि हम इस स्थिति में हैं और ये स्थिति हमारे लिए दुख की है।

ठीक है न?

दुख कैसे होता है? (परिधि माने प्रकृति से, केंद्र बिंदु माने अहम् की ओर आते हुए (अहम् मुखी) तीरों को चित्रित करके दर्शाते हैं) दुख ऐसे होता है कि यही जो प्रकृति है वो हम पर तरह-तरह से प्रभाव डालती है, हमें संस्कारित करती है, हमारी पहचान बनने की कोशिश करती है। यही होता है न? ये जो अहम् है ये अकेला तो रह नहीं पाता है। तो इसके ऊपर ये जो दुनिया है पूरी, वो क्या करती है? प्रभाव डालती है। (पहले भक्ति के खाने में बनाकर दर्शाते हैं, अब ज्ञान के खाने में भी बनाते हैं)

और ये प्रभाव ही दुख है। प्रभावित हो जाना ही दुख है, संस्कारित हो जाना ही दुख है। अपनेआप को भूल कर के दुनिया के साथ तादात्म्य माने आइडेंटिफिकेशन , यही दुख हुआ न! तो ये जीव की दुख की स्थिति है। ये बिलकुल आरंभिक स्थिति है। अभी न ज्ञान शुरू हुआ है, न भक्ति शुरू हुई है। अभी तो बस हमारी भुक्ति शुरू हुई है। भुक्ति माने? भोगना। ये हम भोग रहे हैं। ये पैदा होने का हम दंड भोग रहे हैं।

(चित्र को दर्शाते हुए) तो ये हमारी स्थिति होती है। इसको गौर से देखिए, ये हम सबकी स्थिति है। ये हम सब की स्थिति है! अब इसके आगे अंतर शुरू होता है, लेकिन वो अंतर भी बाद में आएगा।

यह स्थिति हमें पसंद नहीं है — ये बात पहली है। ये स्थिति हमें पसंद नहीं है, सबसे पहली ये बात है। किसी को दुख की स्थिति पसंद होती है क्या? कोई भी ऐसी हालत में सहज अनुभव करता है जहाँ दुनिया उसके ऊपर चढ़ी आ रही हो? कहिएगा! नहीं न?

तो क्यों नहीं हम सहज अनुभव करते, क्यों नहीं आनंदित अनुभव करते अगर सब आपके ऊपर चढ़े आ रहे हों तो? क्योंकि स्वभाव क्या है, बोलिएगा!

श्रोतागण: मुक्ति है।

आचार्य: मुक्ति है। और उस मुक्ति से इसको (अहम् को) क्या है?

श्रोतागण: प्रेम है।

आचार्य: प्रेम है। है न? तो चाहे कोई भी मार्ग हो, जहाँ दुख है वहाँ प्रेम है, प्रेम नहीं होता तो दुख नहीं होता। इस बात को थोड़ा अपने भीतर आने दीजिए। अगर आपको दुख का अनुभव हो रहा है, तो इसका अर्थ ही यही है कि आपको आनंद से प्रेम है। अगर आनंद आपके लिए एक वांछनीय, प्यारी चीज़ न होती, तो आपको फिर प्रभावित हो जाने से आपत्ति क्यों होती?

मुर्दा पड़ा होता है, मुर्दे के हाथ में आप बेड़ियाँ डाल दीजिए, उसे आपत्ति है क्या? क्योंकि उसे मुक्ति से कोई प्रेम अब रहा ही नहीं। तो प्रेम जब होता है तभी तो भीतर से दुख उठता है न, विद्रोह उठता है। यही सब होता है न?

बात समझ में आ रही है?

मुझे कुछ अच्छा लगता है, वो मुझे नहीं मिला, तभी तो मुझे बुरा लगेगा न? अगर मुझे कुछ भी भला, प्यारा लग ही नहीं रहा होता, तो मुझे कुछ बुरा लग सकता था क्या?

श्रोतागण: नहीं।

आचार्य: तो प्रेम सबसे पहले आता है। (बोर्ड पर भक्ति शीर्षक के साथ प्रेम लिखते हुए) तो यहाँ जो भक्ति है इसमें भी सबसे पहले प्रेम ही आता है। (बोर्ड पर अहम् के बिंदु की ओर इशारा करते हैं) और प्रेम नहीं है, इसकी वजह इस बेचारे की परेशानी है। इसकी परेशानी है, ये दुखी है।

इसको दुखी कैसे दिखाएँ? इसको हम इमोजी बनाएँगे। तो ये दुखी है। (भक्ति व ज्ञान के अहम् रूपी बिंदु पर दुखवाला इमोजी बनाते हैं) ये ठीक है, ये दिख रहा है? ये दुखी है। ज्ञानी ज़्यादा दुखी है। (आचार्य जी मुस्कुराते हैं व श्रोतागण हँसते हैं)

तो ये दुखी हैं। ठीक है? और ये दुख ही — मैं कह रहा हूँ — क्या है? प्रेम है। (ज्ञान शीर्षक के पास प्रेम लिखते हुए) प्रेम न होता अगर मुक्ति से, तो इन बंधनों से हमें दुख भी प्रतीत नहीं होता।

यह बात स्पष्ट है यहाँ तक?

तो शुरुआत तो प्रेम से ही होती है। अध्यात्म की भी शुरुआत प्रेम से ही होती है। किसी भी तरह का कोई भी यत्न करें आप, दुख से आज़ाद होने के लिए, शुरुआत उसकी प्रेम से ही होती है।

अब ये दो हैं और ये दो थोड़ा अलग-अलग तरीक़े के हैं। इधर हम कह रहे हैं ज्ञानी है, इधर कह रहे हैं भक्त है। हालाँकि शुरुआत में दोनों के प्रेम ही है, पर उसके बाद कुछ अंतर आ जाता है।

अंतर क्या आ जाता है? अंतर समझते हैं। ऐसे समझ लीजिए कि ये दोनों दो नये-नये बच्चे हैं जो स्कूल भेजे गए हैं। ये दोनों दो नये-नये बच्चे हैं जो स्कूल भेजे गए हैं। तो ये स्कूल में हैं अपने। और स्कूल के जो पुराने धुरंधर हैं, खिलाड़ी लोग, सीनियर्स (वरिष्ठ), वो क्या कर रहे हैं इनको? अब परेशान कर रहे हैं, बुली (परेशान करना) कर रहे हैं। वो इनको परेशान कर रहे हैं।

ठीक है?

ये दो हैं और ये दोनों ही परेशान करे जा रहे हैं, दोनों ही नये-नये स्कूल में भेजे गए हैं। स्कूल क्या है?

श्रोतागण: संसार।

आचार्य: संसार। (बोर्ड पर बने चित्र को दिखाते हुए) और ये है, ये है संसार की गुंडई । (चुटकी लेते हुए) ये बुली किया जा रहा है कि तुम पैदा हुए हो तो तुम्हें हमारे हिसाब से चलना पड़ेगा। संसार, समाज, देह की वृत्तियाँ – ये सब हमारे साथ क्या करते हैं? गला पकड़कर गुंडई करते हैं। कहते हैं, ‘तुम यहाँ आए हो न, नये-नये आए हो, फ्रेशर हो, तो अब तुम हमारे हिसाब से चलोगे।‌ तुम क्या हमारे हिसाब से चलोगे, आज तक जितने पैदा हुए हैं सब हमारे ही हिसाब से चले हैं। हमारा अपना नियम-क़ायदा है, वैसे ही चलोगे।’

तो ये हमारे साथ बुलींग करी जा रही है पैदा होते से ही। ठीक है? लेकिन उसके बाद ये दोनों चूँकि अलग-अलग हैं — दो अलग-अलग आप मान लीजिए, दो अलग-अलग लड़के हैं। तो दोनों की प्रतिक्रिया अलग-अलग हो सकती है।

(वाइट बोर्ड पर भक्ति के खाने में नीचे एक और गोला बनाते हैं, अहम् के केंद्र बिंदु को बाहर की ओर दर्शाते हुए तीरों से परिधि के बाहर आत्मा की ओर जाता हुआ बताते हैं व अहम् पर दुनिया द्वारा आक्रमण किए जाने वाले तीरों को वैसे ही चित्रित करते हैं) एक की प्रतिक्रिया ये हो सकती है कि वो कहे कि ये दुनिया इतनी गड़बड़ है, मुझे इसमें रहना नहीं। वो बाहर को भाग लेता है।

यहाँ था (आकृति के केंद्र में), यहाँ से वो बाहर को भाग लेता है। ये सब उस पर आक्रमण कर रहे थे, वो कहता है, ‘गंदे लोग हैं। और ये बाहर जो है, बाहर मेरे पिताजी हैं।' पिताजी स्कूल में छोड़कर निकल लिये थे, अंदर तो आये नहीं। गेट पर बोला, ‘बेटा, तुम तो जाओ अंदर। ये द्वैत की दुनिया तुम्हारी। (परिधि के अंदर अहम् की दशा बताते हुए)

(परिधि के बाहर आत्मा को दर्शाते हुए) ये अद्वैत पिताजी हैं। ये बाहर खड़े हुए हैं। हमको फँसा दिया है! तो ये (भक्त) जब देखता है कि यहाँ पिटाई हो रही है, तो एकदम यहाँ से भाग लेना चाहता है। ये कहता है, ‘मुझे उधर जाना है, मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं। तुम गड़बड़ लोग हो।'

(ज्ञानी के खाने को इंगित करते हैं) ये थोड़ा अलग तरीक़े का है। ये कहता है, ‘तुम मुझ पर आक्रमण करोगे, मैं तुम पर आक्रमण करूँगा।‌ आओ। तुम मुझे दुखी करोगे, मैं तुम्हें दुखी करूँगा।' (ज्ञान के खाने वाले अहम् पर परिधि की ओर जाने वाले तीरों के निशान चित्रित करते हैं) ‘और मेरा तुम पर आक्रमण करने का जो तरीका है उसका नाम है — जिज्ञासा, ‘तुम हो कौन?'’ (परिधि की ओर जाने वाले तीरों को जिज्ञासा नाम देते हुए)

ऐसे समझिए कि जैसे जो लोग आपको सताने आ रहे हैं — ये दोनों (ज्ञानी और भक्त) अपने-अपने स्कूल में हैं और ये दोनों घिर गए हैं नक़ाबपोश सीनियर्स से। किस से घिर गए हैं? नक़ाबपोश सीनियर्स से। और जाड़े का मौसम है, धुंध भी है। धुंध है और जो इनको दुखी करने आ रहे हैं ये सब, इन सबने क्या पहन रखे हैं? मास्क्स। ठीक है? और वो इनको दुखी कर रहे हैं। पहले तो वो बड़े-बड़े हैं, मज़बूत, और फिर उन्होंने क्या पहन रखे हैं?

श्रोतागण: मास्क्स।

आचार्य: और साथ-ही-साथ मौसम किसका है? जाड़े का। तो क्या छाया हुआ है? कोहरा। ये क्या है, यहाँ पर नक़ाब का होना और बाहर कोहरे का होना? ये है आवरण (नक़ाब) और ये है विक्षेप (कोहरा)। तो उनसे लड़ना बड़ा मुश्किल है।

जो आपको मारने आ रहे हैं, पहले तो वो मज़बूत हैं आपसे, दूसरे आप उनकी किसी से शिकायत भी नहीं कर पाओगे। आप उनका चेहरा ही नहीं देख रहे। आप उन्हें पलटकर वार ही नहीं कर पाओगे, क्योंकि कोहरा इतना है कि वो आपको ठीक से दिखाई नहीं देते। बल्कि एक पेड़ खड़ा होता है, आपको लगने लगता है, यही तो वो है दुश्मन जो मुझे मारने आया था। आप पेड़ को घूसा मार देते हो, आपके हाथ में चोट लग जाती है।

ये (भक्त) देखता है कि ये सब गड़बड़ है। ये कहता है, ‘ये जो जगत है, ये चीज़ ही ठीक नहीं है। मुझे सीधे जाना है पिता के पास। ये ग़लत जगह डाल दिया है मुझको। मैं बिलकुल समझ गया हूँ कि ये मामला ही यहाँ का ठीक नहीं है।'

ये (ज्ञानी) कहता है, ‘तुम हो कौन?’ और ये हाथ बढ़ा करके उनसे लड़ने की कोशिश करता है। ये बहुत छोटू है, पर इसके पास एक ताक़त है। उस ताक़त का नाम है – जिज्ञासा। ये कहता है, ‘तुम हो कौन? मैं तुम्हारा नक़ाब उतारूँगा।’ नक़ाब उतारने की ही प्रक्रिया को क्या बोलते हैं? जानना। ‘मुझे तुम्हारे नक़ाब उतारने हैं, तुम हो कौन सचमुच?’ तो इसका जो उत्तर है अपने दुख को, जब इसके साथ गड़बड़ करी जाती है तो ये है जिज्ञासा, ये कहता है, ‘मुझे तुम सबको जानना है।’

अब बात ये है कि ये जो सीमा है और सीमा से जो लोग आ रहे हैं, ये जो पूरा क्षेत्र ही है और उस सीमा से, इस क्षेत्र से जो लोग आ रहे हैं, ये वास्तव में अलग-अलग नहीं हैं। ये लोग ही हैं जिन्होंने ये सीमा निर्धारित कर रखी हैं। ठीक है न? तो अब ये इन पर पलट करके पूछता है, ‘तुम बताओ, तुम हो कौन? तुम हो कौन?’

(भक्त के खाने की ओर संकेत करते हैं) इसने ये करा है कि मुझे नहीं जानना है कि तुम हो कौन? मुझे नहीं जिज्ञासा करनी है। मैं तो बस ये समझ गया हूँ कि शांति, तृप्ति, आनंद तो मुझे मिलता है बस पिता के पास। मुझे पिता को खोजना है। मुझे ये यहाँ पर क्या चलता है, दुनिया क्या चीज़ है, बंधन कहाँ से आते हैं, मोह और आसक्ति में संबंध क्या है — ये सब जानने वगैरह में मेरी बहुत रूचि है नहीं। मुझे तो सीधे ये पिताजी चाहिए।'

इन्हीं को आत्मा बोल लो और चाहे भक्त की भाषा में भगवान बोल लो। वो कहता है, ‘मुझे तो इनको चाहिए।' अब दोनों के साथ क्या होता है? ये भागने की कोशिश करेंगे, तो ये यहाँ पर आकर के फँस जाते हैं। यहाँ पर आ के क्यों फँस जाएगा? अब बताओ वजह।

क्योंकि ये (भक्त) चाहता है कि ये जो है, ये इसको कूद जाए। (सीमा रेखा को) कैसे कूदेगा? क्या कूद सकता है? क्यों नहीं कूद सकता है? क्योंकि ये (सीमा रेखा), ये (नक़ाबपोश सीनियर्स ) और ये (भक्त) एक ही हैं। (बोर्ड पर समझाते हैं कि गोलाकृति की परिधि, परिधि के अंदर जो अहम् पर प्रभाव डालते हैं — नक़ाबपोश सीनियर्स और केंद्र बिंदु अहम् या भक्त स्वयं)

नहीं समझ में आ रही है बात?

ये है एब्यूज़र (शोषक), ये है एब्यूज़्ड (शोषित) और ये है एब्यूज़ (शोषण)। (बोर्ड पर बनी गोलाकृति पर समझाते हैं कि शोषक माने सीमा रेखा या प्रकृति, शोषित माने भक्त और शोषण माने नक़ाबपोश सीनियर्स का प्रभाव) तो ये मूल सिद्धांत है, इसको अच्छे से समझ लीजिएगा — एब्यूज़र, द एब्यूज़्ड एंड एब्यूज़ आर वन। (शोषक, शोषित और शोषण एक ही हैं)

उसी को ज़्यादा शास्त्रीय भाषा में कह देते हैं कि अनुभव्य, अनुभोक्ता और अनुभव, तीनों एक होते हैं। ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय, तीनों एक होते हैं। अब ये तीनों एक हैं। ये तीनों एक ही हैं। ये तीनों ही क्या हैं? इन तीनों को अगर मैं एक संयुक्त नाम देना चाहूँ तो क्या नाम होगा?

श्रोतागण: प्रकृति।

आचार्य: बहुत बढ़िया! प्रकृति नाम होगा। प्रकृति में ही परिधि है। प्रकृति में ही प्रभाव हैं और प्रकृति में ही प्रभव है। प्रभव माने? प्रभव माने? पैदा होना, जन्म लेना। भव — पैदा हुआ। ठीक है? ये तीनों प्रकृति में ही हैं। तो ये तीनों एक ही हैं वास्तव में। (भक्त या अहम् का उल्लेख करते हैं) लेकिन ये जो भागने की कोशिश कर रहा है, उसको ये बात पता नहीं।

तो ये क्या सोच रहा है? ये सोच रहा है कि मैं इसको लाँघ जाऊँगा। (यहाँ बोर्ड पर बनी गोलाकृति की सीमा रेखा या प्रकृति का उल्लेख करते हैं) इसको पिताजी के पास जाना है। इसको अपने भगवान के पास जाना है। ये सोचता है कि मैं इसको लाँघ जाऊँगा।

वो लाँघ क्यों नहीं सकता? क्योंकि वो ख़ुद ही वही है। जबतक तुम हो, तबतक ये जो सीमाएँ हैं और ये दुख है, तबतक वो हट नहीं सकती। तो ये (भक्त) भागेगा तो बहुत ज़ोर से, पर यहाँ पर (सीमारेखा की ओर संकेत) आकर अटक जाएगा। और यहाँ पर जो अटक रहा है वो एक एग्ज़िस्टेंशियल बैरियर (अस्तित्वगत बाधा) है।

तुम एग्ज़िस्ट (अस्तित्व रखना) करते हो न? तो फिर तुम प्रकृति की परिधि का उल्लंघन नहीं कर सकते। अगर तुम हो तो तुम इस सीमा को नहीं तोड़ पाओगे। यहाँ (सीमा रेखा) पर आकर अटकता है। जब यहाँ (सीमा रेखा) पर अटका हो या यहाँ (सीमा रेखा के भीतर) पर अटका हो, बात तो एक ही है।

ये भक्त की दशा है। वो यहाँ (सीमारेखा) पर आकर अटकता है। चाहे यहाँ (सीमारेखा पर) अटका हो, चाहे यहाँ (सीमारेखा या प्रकृति के अंदर, संसार में) अटका हो, बात एक ही है।

अब भक्त के सामने दो विकल्प होते हैं। एक तो विकल्प ये है कि बेईमानी कर ले। वो विकल्प उठेगा आत्मरक्षा की चाह से। क्यों? क्योंकि उसे पता है कि अगर उसे ख़ुद को बचाए रखना है तो वो इसको (सीमा रेखा या प्रकृति को) नहीं पार कर पाएगा। उसने बड़ी कोशिश करके देख ली। ये बिंदु (भक्त) इसके (सीमारेखा या प्रकृति के) बाहर जा ही नहीं सकता।

ये जो ‘मैं’ है, ये प्रकृति के बाहर जा ही नहीं सकता। आप ये नहीं कह सकते कि संसार तो है, मैं नहीं हूँ। या मेरा संसार तो है, मैं नहीं हूँ। या ममत्व तो है, पर अहम् नहीं है। वो हो नहीं पाता। तो ये यहाँ पर चाहे तो एक प्रकार की बेईमानी कर सकता है। और बहुत सारे लोगों से हो जाती है जो भक्तिमार्ग पर चल रहे हैं।

ये (भक्त) कहता है, ‘मैं अगर बाहर जाता हूँ तो मैं मिट जाऊँगा। पिताजी तो बाहर हैं, उनसे मिलने के लिए जाना कहाँ पड़ेगा मुझे?’ ‘पिताजी तो बाहर हैं तो उनसे मिलने मुझे कहाँ जाना पड़ेगा?’

श्रोतागण: बाहर।

आचार्या: ‘और अगर मैं बाहर गया तो मेरा क्या होगा? मैं मिट जाऊँगा।’ तो वो चाहे तो एक बेईमानी कर सकता है। बेईमानी ये कर सकता है कि ये जो पिताजी हैं इनको अंदर खींच ले। और अपनेआप को बता दे कि मिलन हो गया, योग हो गया, बात बन गयी। लेकिन उससे कुछ बात बनेगी नहीं। क्योंकि तुम्हारा दुख ये था कि तुम इस सीमा के अंदर हो तो रह तो उसके अंदर ही गए। और अंदर खींच करके फिर तुम क्या करते हो?

उनको भीतर खींच लिया और वो जो बाहर थे, माने जिनका प्रकृति से कोई लेना-देना नहीं था, तुम उन्हें प्रकृति की धारा में डाल देते हो। तुम जैसे हो तुम उनको बिलकुल वैसे ही बना देते हो। तुम अपने सारे गुण-दोष अपने भगवान पर भी आरोपित कर देते हो।

ये भक्त ने गड़बड़ करी है कि ख़ुद बाहर जाने की जगह क्या करा उसने? अपने भगवान को अंदर ले आया।

समझ में आ रही है बात?

लेकिन अगर भक्त सच्चा है और उसकी निष्ठा दोषपूर्ण नहीं है तो वो कहेगा, ‘नहीं, उनको अंदर नहीं ला सकता। अच्छे से जानता हूँ वो इसके अंदर के हैं नहीं। वो इसके अंदर के होते तो वो भी इन्हीं के जैसे होते। और अगर वो इसके अंदर के ही हैं तो फिर कुछ भी प्रयास करने से फ़ायदा क्या! अंदर तो ये सब भी थे।' कहता है, ‘वो हैं तो बाहर के ही।'

फिर वो पूछता है कि अगर बाहर जाना है तो मुझे क्या करना पड़ेगा? और बाहर जाने का तो एक ही तरीक़ा है — जान लो कि ये (सीमारेखा), ये (अहम्) और ये (सीमारेखा के अंदर का संसार) एक हैं। यहाँ पर भक्त को ज्ञान उदित होता है। यहाँ पर भक्त को ज्ञान उदित होता है क्योंकि अगर वो ज्ञान नहीं है तो भक्त इस सीमा (सीमारेखा) पर आकर के सिर फोड़ता रहेगा, कभी बाहर नहीं जा पाएगा।

भक्ति की जितनी विधियाँ हैं, वो सब आज़माता रहेगा – भजन, कीर्तन, कथा, सत्संग, ये सब भक्ति की विधियाँ होती हैं। वो ये करता रहेगा, लेकिन यहीं पर अटक के करता रहेगा। ये ऐसी-सी बात होगी कि वो दीवार पर आकर अटक गया है और यहाँ पर सारी विधियाँ आज़मा रहा है। बाहर जाने की वो हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है। ये दीवार है, और पीछे से उसको धमाधम-धमाधम पड़ रही है लगातार, पिटाई चल रही है, लेकिन ये दीवार तोड़ने की या लाँघने की वो हिम्मत नहीं दिखा पा रहा क्योंकि दीवार के उल्लंघन का मतलब होता है स्वयं का उल्लंघन।

ये जो दीवार है यही मैं हूँ। ये (अनुभव्य), ये (अनुभव) और (अनुभोक्ता) ये तीनों एक हैं (परिधि, परिधि के अंदर चलने वाली क्रियाएँ या संसार व अहम् की ओर इशारा करते हैं)। इसी को त्रैत बोलते हैं। यही त्रैत कहलाता है; तीनों एक ही हैं।

त्रैत और द्वैत — बात एक ही है। द्वैत में बस हम ये बोल देते हैं कि साहब, सामने दृश्य है, इधर दृष्टा है। वो बात ठीक है। उसी को थोड़ा और फैला के बोल देते हो तो यही बोल देते हो कि वो रहा दृश्य, ये रहा दृष्टा और बीच में रहा दर्शन।

द्वैत में हम बस इतना बोल देते हैं कि सामने जो है वो ज्ञात वस्तु है, विषय है, इधर ज्ञाता है, ज्ञानी। त्रैत में हम बात को और विस्तृत करके बोल देते हैं कि इन दोनों के बीच में जो संबंध है उसको ज्ञान बोलते हैं। तो ज्ञान और ज्ञाता और वो ज्ञेय — वस्तु; वो एक ही चीज़ है। तो ये जो त्रैत है, ये तीनों एक हैं।

ठीक है न?

या ये कह दो कि दोनों एक हैं, जैसे भी बोलना चाहो। भक्त कुछ भी कोशिश कर ले, इसके पार नहीं जा सकता। तो यहाँ पर आकर के उसको ज्ञान का सहारा लेना ही पड़ेगा। और ज्ञान का सहारा अगर नहीं लेगा तो भक्ति अधूरी रह जाएगी; या फिर भक्ति में पाखंड आ जाएगा।

अगर भक्त ज्ञान का सहारा नहीं लेता, अगर भक्त ज्ञान से वंचित है, तो उसकी भक्ति में निसंदेह त्रुटि रहेगी। क्योंकि वो फिर क्या करेगा? वो जानता तो है नहीं। वो ये करेगा फिर — दोहराइए मेरे साथ — वो क्या करेगा?

ख़ुद बाहर जाने की जगह अपने भगवान को प्रकृति में ले आ लेगा। ख़ुद जैसे उसका जन्म-मरण हुआ है, कहेगा, ‘मेरे भगवान का भी ऐसे जन्म होता है, ऐसे मृत्यु होती है।' ख़ुद वो जो कुछ करता है वही सारी बातें अपने…। ख़ुद उसके अपने जितने भाव होते हैं वो भी भगवान पर भी डाल देगा, बोलेगा, ‘एक दिन ऐसा हुआ कि भगवान कुपित हो गए; एक दिन ऐसा हुआ कि भगवान दुखी हो गए; कामना की पूर्ति कर दी भगवान ने!'

ये सारी बातें किस पर लागू होती हैं? इस पर (संसार में)। लेकिन वो वही बातें किस पर लागू करने लगेगा? ‘जो अच्छे लोग होते हैं, भगवान बाद में उनको अच्छा फल देता है।' आप कोई अच्छा काम करें किसी के लिए तो अच्छा फल तो दे ही देता है। ये तो सौदेबाज़ी, व्यापार में भी होता है।

ये सब कहाँ होता है? ये अंदर होता है। पर वो यही बातें किस पर लागू कर देगा? अपने भगवान पर लागू कर देगा कि भगवान कौन हैं — भगवान कर्मफल का दाता है। भगवान कर्मफल का दाता है। अब कर्मफल को किसी दाता की ज़रूरत ही क्यों पड़ती है — मैं ये पूछ रहा हूँ। आप मूर्खता करें तो मूर्खता का परिणाम तो दुख होना ही होना है न, उसमें किसी दाता की तो कोई आवश्यकता है नहीं।

आस्तिक, नास्तिक दोनों मूर्खता में पाँच-मंज़िली इमारत से कूद गए। एक ईश्वर को मानता है, एक नहीं मानता। दोनों का कर्म एक है तो दोनों को कर्मफल भी तो एक ही मिलेगा न। क्या कर्मफल? दोनों की हड्डियाँ टूटेंगी। उसमें किसी दाता की तो आवश्यकता है नहीं। कर्म है तो कर्मफल उसके पीछे-पीछे…।

लेकिन जो भक्त है, जो हिम्मत नहीं दिखा पाया ज्ञान पाने की, वो अपनी सारी उपाधियों को, अपने सारे गुणों को अपने ईश्वर पर भी आरोपित कर देगा। वो अपने ईश्वर को हू-ब-हू अपने ही जैसा बना देगा। उसको एक मानवीय रूप दे देगा और इस तरह की सारी चीज़ें करेगा।

कहेगा, ‘मरने के बाद वो जो मेरा ईश्वर होता है, वो तय करता है कि कौन स्वर्ग में, जन्नत में जाएगा, किस को नर्क, दोज़ख़ मिलेगी।’ ये सब बातें इस तरह की शुरू कर देगा। ये सब बातें ख़ूब हुई हैं न?

आपको समझ में आ रहा है वो सब बातें कहाँ से आ रही हैं? वो सब बातें आ रही हैं अहम् की रक्षा की चेष्टा से। ‘मैं बाहर नहीं जाना चाहता तो मैं उसको भीतर ले आऊँगा। और जो-जो बातें सब मुझ पर लागू होती हैं, वो सब बातें मैं उस पर भी लागू कर दूँगा।’

उदाहरण के लिए, मैं जन्म देता हूँ तो मैं कह दूँगा, ‘उसने ये दुनिया बनाई है।' मैंने ये (चश्मा दिखाते हुए) बनाया, मैंने ये (माइक दिखाते हुए) बनाया; ये सब बनाया न? ये निर्माण का काम मैंने करा तो मैं कह दूँगा, ‘भाई, वो बड़ा वाला बाप है। मैंने ये दो-चार चीज़ें बनाई हैं, उसने पूरी दुनिया ही बनाई है। वो इस पूरी दुनिया का रचयिता है।’

ये मैंने क्या करा? मैं जैसा हूँ मैंने उसको वैसा बना दिया। मैंने कहा, ‘मैं थोड़ी-बहुत चीज़ बनाता हूँ, उसने ज़्यादा बड़ी चीज़ बनाई है। स्केल का अंतर है, डायमेंशन (आयाम) का अंतर नहीं है। मैंने चार चीज़ें बनाई हैं, उसने चार हज़ार चीज़ें बनाई हैं। मैंने अपना घर बनाया है, उसने सबका घर बनाया है। लेकिन ले-देकर किया उसने भी वही है जो…।’

ये सब, सब धर्मों में हुआ है। एक-एक धर्म में यही हुआ है कि आपने कह दिया है — है तो वो मेरे ही जैसा, बस ज़रा-सा मुझसे आगे है। ‘मेरे दो हाथ हैं, उसके दस हाथ हैं। मैं एक जगह पर हो सकता हूँ, वो हर जगह पर हो सकता है।'

समझ में आ रही है बात?

पर मैं एक जगह पर रहता हूँ, वो भी दस…?

श्रोतागण: दस जगहों पर रहता है।

आचार्य: तो उसको भी मैंने बना स्थानीय ही दिया कि वो भी किसी-न-किसी स्थान का है। भले ही मैं एक जगह पर हूँ, हम कह देते हैं वो एक-साथ पाँच जगह पर है। ये सब क्या हुआ है? ये गड़बड़ हुई है कि आपने ख़ुद बाहर जाने की जगह उसको भीतर ला दिया। लेकिन सच्चा भक्त कौन होता है? सच्चा भक्त ज्ञानी भी होता है। बिना ज्ञान के कोई भक्ति चल ही नहीं सकती है।

ठीक है?

तो फिर वो यहाँ पर आ के जब दस बार संघर्ष करता है, लहुलूहान होता है, सिर फुड़वाता है भक्त, तो फिर वो कहता है कि बाहर जाना है अगर मुझे, मेरा प्रेम अगर सच्चा है तो फिर मुझे कोई सही विधि पकड़नी होगी। जो सही विधि होती है वो आत्मज्ञान की ही होती है।

वहाँ पर यहाँ (सीमा रेखा) पर आकर के इसको देखना पड़ता है कि हम सब एक हैं और अगर मुझे बाहर जाना है तो उसका एक ही तरीक़ा है कि मुझे मिटकर ही बाहर जाना होगा। मुझे मिटकर ही बाहर जाना होगा। भक्त यहाँ पर अपनी हस्ती का विसर्जन कर देता है। तो भक्त समर्पित करता है अपने होने को।

कहता है, ‘मेरे पास जो कुछ था मैंने तुझे दे दिया मेरे भगवान! मेरा सबकुछ तेरा है। यहाँ तक कि मेरा मोह भी तेरा है, मेरी ममता भी तेरी है, मुझे अगर क्रोध है, वासना है तो वो सब भी तेरे ही हैं। मेरे पास जितने तरीक़े के गुण-अवगुण हो सकते थे, सब मैंने तुझको दे दिये।'

तो उसी का नतीजा फिर ये होता है कि भक्ति में प्राकृतिक गुणों के लिए भी जगह हो जाती है। क्योंकि आप कहते हो ‘मेरे पास जो कुछ है सारा, सब मैं तुझे दिये दे रहा हूँ।’

ठीक है?

अब जैसे कांता भक्ति होती है, कांता भक्ति क्या होती है? अपने भगवान को बड़ा श्रृंगारित करके देखना। जो सबसे सुंदर रूप हो सकता है, उसमें उसको देखना। तो यहाँ पर आकर भक्त कह रहा है कि मुझमें बड़ी वृत्ति थी कि मेरे साथ कोई हो जो बहुत सुंदर हो या पूरी दुनिया में मुझे सुंदर-सुंदर अनुभव हों, वो सारी सुंदरता ला कर मैंने किसमें बिठा दी? अपने भगवान, तुझमें बिठा दी।

इसी तरह वात्सल्य भक्ति होती है। वात्सल्य भक्ति क्या होती है? कि भगवान को अपना छोटा-सा बच्चा मान करके उसको खिलाना-पिलाना, नहलाना, कपड़े पहनाना, ये सब करना।

तो अब एक महिला है मान लीजिए थोड़ा पुराने ज़माने की, और उसने जीवन भर करा ही यही है कि बच्चे पाले हैं, तो उसका पूरे जीवन जो वास्ता ही पड़ा है वो किस भाव से पड़ा है? वात्सल्य भाव से ही पड़ा है। वो माँ ही बन चुकी है। उसके चार-पाँच बच्चे हैं और अब उसकी जो पूरी पहचान है, वो मातृत्व की ही बन चुकी है।

उसकी पूरी पहचान ही मदर्ली (माता-संबंधी) हो चुकी है क्योंकि उसने यही करा है। वो अठारह-बीस साल की थी तब उसने पहली बार जन्म दिया, फिर पैंतीस-चालीस साल तक और जन्म ही देती रही। तो वो कहती है, ‘मेरे पास और कुछ है ही नहीं भगवान तुझको देने को। मेरा जो ‘मैं’ है, वो माँ बन चुका है।'

वो कहती है, ‘मेरा जो ‘मैं' है, वो मैं नहीं रहा’, वो क्या हो गया है? वो माँ हो गया है। ‘क्योंकि मैं तो जन्म ही देती रही, जन्म ही देती रही — बच्चे, बच्चे, बच्चे, बच्चे।' तो ‘मैं’ माँ बन गया है। तो कहती है कि मैं तो माँ ही हूँ, और तो कुछ हूँ ही नहीं, तो मैं तेरी भी माँ ही बन जाती हूँ।

अब यहाँ पर आकर के भक्त कह रहा है कि मैं अगर अपना आपा बचाता हूँ तो मैं इसको लाँघ नहीं सकता। तो वो कहता है कि ‘मैं’ के साथ प्रकृति की जितनी भी चीज़ें एसोसिएटेड थीं, जुड़ी हुई थीं, मैं उनको छोड़ना चाहता हूँ।

भक्त ‘मैं’ को सीधे नहीं छोड़ता। भक्त सीधे-सीधे ‘मैं’ को नहीं छोड़ता। भक्त कहता है, ‘ये जो ‘मैं’ है, ये ऐसा होता है : एक टाँग वाला। (आचार्य जी स्वयं एक टांग पर खड़े होकर दिखाते हुए) और एक टाँग पर ‘मैं’ बहुत देर तक और बहुत दूर तक…। ये दूसरी टाँग क्या होती है? ये कोई विषय होता है। अगर ये (एक टाँग) माँ है, तो ये (दूसरी टाँग) क्या है? बच्चे के बिना माँ कितनी देर तक टिकेगी? अगर बच्चा नहीं है तो माँ को माँ बोलेगा भी कौन? माँ तभी तक है जबतक…?

श्रोतागण: बच्चा है।

आचार्य: इसी तरीक़े से, ये (एक टाँग) अगर धनी है तो ये (दूसरी टाँग) क्या है?

श्रोतागण: ग़रीब।

आचार्य: तो भक्त कहता है, ‘मेरा जो कुछ भी है, मैं तो अपना ‘मैं' विसर्जित नहीं कर पाऊँगा’, क्योंकि उसमें ज्ञानी जितना ज्ञान नहीं है। कहता है, ‘लेकिन ‘मैं' के साथ जो कुछ सांसारिक, प्राकृतिक जुड़ा हुआ है वो मैं, मेरे ईश्वर! मैं तुझको दिये देता हूँ।' तो कहता है, ‘मेरा धन भी किसका हुआ? मेरे भगवान का हुआ।’ मैं माँ हूँ, तो मेरा वात्सल्य भी किसका हुआ?

वो कहता है, ‘देखो भाई, मैं भूल नहीं सकता कि मैं पति हूँ। मैं पति हूँ।’ तो सूफ़ियों ने क्या करा? उसको क्या बना लिया? प्रेमिका बना लिया कि पत्नी बना लिया। ये कहलाती है दांपत्य भक्ति। (आचार्य जी मुस्कुराते हैं) हाँ, दांपत्य भक्ति। कि मैं भूल ही नहीं पा रहा हूँ, मैं भूल ही नहीं पा रहा हूँ कि हूँ तो मैं पति ही और मुझे पत्नी चाहिए।

इसी तरीक़े से पत्नी है, वो भूल ही नहीं पा रही कि वो पत्नी है क्योंकि ज़िंदगी भर उसने पत्नीत्व ही निभाया है। उसको इसी की ट्रेनिंग , प्रशिक्षण मिला है — ‘मैं तो पत्नी हूँ। मैं तो पत्नी हूँ।' तो उसने क्या करा? उसने कहा, ‘ठीक है। अगर पत्नी हूँ ही, मैं बराबर पत्नी। तो पति मैं बनाये लेती हूँ ईश्वर को। तू पति है।‌’ तो ये मीरा बाई का तरीक़ा हुआ।

समझ में आ रही है बात, ये क्या चल रहा है?

वैसे ही एक व्यक्ति है, उसका जीवन दासता में ही गुज़र रहा है और ये बात देख रहा है वो। उसको सब दबाते हैं — मोहल्ले वाले, पड़ोसी वाले; उसकी अपनी सारी वृत्तियाँ उसको दबाती हैं। दफ़्तर में उसका बॉस उसको दबाता है। दुकानदार उसको दबाता है, व्यवस्था दबाती है, सरकार दबाती है, समाज दबाता है। तो वो क्या है? दास है। वो कहता है, ‘दास तो मैं हूँ ही, अब एक काम करता हूँ, और किसी की दासता बर्दाश्त नहीं करूँगा। सिर्फ़ तेरी!’ ये कहलाती है दास भक्ति। ‘मैं दास हो गया।'

कह रहा है, ‘देखो, तुम मुझसे सीधे बोलोगे कि ‘मैं’ मुक्त है, कि अहम् का स्वभाव है मुक्ति, तो वो मुझसे होगा नहीं। क्योंकि मैं बहुत गहरा अब फँस चुका हूँ। तुम मुझे बोलोगे कि तुम मुक्त हो, मुक्ति ही स्वभाव है, तो वो बात मेरे लिए बस सूचना बन के रह जाएगी, वो ज्ञान भी नहीं बनेगी।

तो मैं एक काम करता हूँ — देखो, मुक्त-वुक्त कुछ नहीं हूँ मैं, हूँ तो मैं दास ही। लेकिन अब मैं ये कहूँगा कि मैं अपने…। और अगर मैं उसका दास हूँ अपने ईश्वर का, तो उसका लाभ ये मिलेगा कि अब फिर मुझे दुनिया में किसी की दासता नहीं करनी पड़ेगी।

तो ये भक्ति के तरीक़े हैं कि तुम्हारे पास जो कुछ है, वो तुमने सौंप दिया। तुम्हारे पास जो कुछ है, वो तुमने सौंप दिया।

तो भक्त यहाँ पर आकर ये काम करता है। वो जो चीज़ होती है जिसके साथ ‘मैं' जुड़ा होता है — ‘मैं’ अपने स्थायित्व के लिए, अपनी स्टेबिलिटी के लिए, ‘मैं’ हमेशा किसी विषय से जुड़ा करता है, ठीक है! (वाइट बोर्ड पर लिखते हैं ‘मैं + विषय = जीव’)

‘मैं’ हमेशा किसी विषय से जुड़ा करता है। तो भक्त क्या करता है कि इस बिंदु पर इस विषय का वो क्या करता है? त्याग भी नहीं, वो समर्पण करता है। ये जो आप सब देखते हो न कि ‘पत्रम् पुष्पम् तोयम्’, ये सब जो दिया जा रहा है, वो सूचक होता है बस। किस चीज़ का? जो आप जाकर के भगवान को ये सब अर्पित करते हो कि ये ले लो, अब वो क्या करेंगे आपके नारियल का और आपके…।

कहीं से आप गेंदे का फूल तोड़ लाये हो और चढ़ा रहे हो, उन्हें तो कुछ चाहिए नहीं। वो सूचक होता है इस बात का कि भैया, जो कुछ है वो आपको ही दिये दे रहा हूँ। क्योंकि अगर आपको नहीं दे रहा, तो जिनसे लिया है, वो मार डालेंगे।

अगर आपका दास नहीं हूँ, तो जिसका दास हूँ, वो मार डालेगा। अगर आप पति नहीं हो, तो फिर मेरा जो पति है, वो मार डालेगा। आप पत्नी नहीं हो, तो जो मेरी पत्नी है, वो खा जाएगी। आप सखा नहीं हो, तो जो मेरे बाकी सब सखा हैं, ये बड़े कुसंगी हैं, ये बर्बाद कर देंगे। तो मेरे सखा भी कौन? तुम ही बनोगे।

तुम ही हो बंधु सखा तुम्हीं हो।

अगर तुम वो नहीं हो सब कुछ जो मेरे पास है, तो जो बाकी जितने हैं वो मुझे कहीं का नहीं छोड़ेंगे।

समझ में आ रही है बात?

तो भक्त का तरीक़ा ये नहीं है कि भक्त कहे कि मेरा कोई सखा नहीं। ‘नेति-नेति’ नहीं बोलेगा भक्त। भक्त नहीं बोलेगा कि मेरा कोई नहीं है। भक्त क्या बोलेगा? ‘अब हैं तो वो सब हैं ही, वो तुम ही हो। तुम ही हो।’ माता कौन? तुम। बाप कौन? तुम। बंधु कौन? तुम। पत्नी कौन? तुम। पति? तुम। बच्चा भी कौन मेरा? छोटू भी तुम ही हो; मेरे बाप भी तुम ही हो और मेरा…।

अब ये बात अजीब-सी है कि कभी तो हम बोलते हैं कि तुम पिता हो और कभी हम वात्सल्य भक्ति में उसको…। वो करते हैं न? देखा होगा, महिलाएँ श्रीकृष्ण की एक छोटी सी साथ में ले करके…। तो ये अजीब बात है। ये विरोधाभासी बात हो गयी कि एक ओर तो कह रहे हो कि पिता हैं, दूसरी ओर हम कह रहे हैं कि वो पुत्र है। ये कैसे हो गया? ये ऐसे ही हो गया।

बोली, ‘देखो, मैं स्त्री हूँ, मेरे पिता से भी मेरा रिश्ता है। मैं क्या करूँ, मैं रिश्ता छोड़ नहीं सकती। क्योंकि मैं भूल नहीं सकती कि मैं पुत्री हूँ। और मेरे छोटू से भी मेरा रिश्ता है। मैं भूल ही नहीं पाऊँगी कि मैं माँ हूँ। तो फिर मेरी मुक्ति का तो एक ही तरीक़ा है कि अगर मैं पुत्री हूँ तो तू बाप है और अगर मैं मम्मी हूँ तो तू छोटू है।’ और कोई तरीक़ा है नहीं फिर।

ये समझ में आ रही है?

ये भक्त का तरीक़ा हो गया। तो भक्त के पास जो कुछ होता है, ‘मैं' और विषय मिलाकर जीव बनता है, भक्त इसको (विषय को) छोड़ता है। छोड़ता नहीं है, त्याग नहीं, समर्पण करता है। वो ले जा के देता है। ठीक है? ले जा के देता है।

है त्याग और समर्पण एक ही बात, पर उसमें भाव अलग-अलग है। त्याग में आप कहते हो कि मैंने इसका मिथ्यात्व जान लिया, इसलिए छोड़ रहा हूँ। मिथ्यात्व माने उसकी जो वैल्यू है, उसका जो मूल्य है, वो शून्य है, इसलिए छोड़ रहा हूँ।

ज्ञानी क्या बोलता है? छोड़ इसलिए रहा हूँ क्योंकि इसका मूल्य शून्य है। भक्त बोलता है, ‘देखो भैया, मेरे लिए इसका बड़ा मूल्य है। मेरी हिम्मत ही नहीं कि मैं बोल दूँ कि फ़लानी चीज़ का मूल्य मेरे लिए…।

मेरे लिए पत्नी का बहुत बड़ा मूल्य है। मैं ये नहीं कह सकता कि पत्नी शून्य है। मैं नहीं कह पाऊँगा और कहूँगा तो बेईमानी हो जाएगी, झूठ होगा। तो मैं एक काम करूँगा, मेरे लिए पत्नी बड़ी चीज़ है, तो मैं तुम्हें ही पत्नी बना रहा हूँ।’

‘ये जो हल्का-हल्का सुरूर है, ये तेरी नज़र का कसूर है।’ जो बात प्रेमिका को बोला करते थे, वो बात अब उनको बोला करेंगे। ‘तुमने करा है ये।’

समझ में आ रही है बात?

(चित्र में बने उस जगह को संकेत करके जहाँ भक्त संसार के दुखों से बचकर भागना चाहता है) तो यहाँ पर आकर के जो ये भक्त है वो विषय का समर्पण कर देता है।

इसका समर्पण करते ही क्या गिरता है? ये ‘मैं’ गिरता है। और ‘मैं' के गिरते ही क्या गिरेगा? ये तीनों क्या थे? (अनुभव्य, अनुभोक्ता और अनुभव)

श्रोतागण: एक ही थे।

आचार्य: एक ही थे। ‘मैं’ गिरा तो क्या गिरा? सब गिर गया। (भक्ति वाले खाने में उस गोलाकृति के नीचे जिसमें अहम्, संसार और प्रकृति दर्शाया गया है, उसके नीचे एक बिन्दु बनाते हैं) जब सब गिर गया तो मामला यहाँ ये बचा और ये है अद्वैत। (चित्र की ओर संकेत करते हैं) ये पूरा, ये द्वैत का विश्व था। ये द्वैत का विश्व था। तो भक्त द्वैत से अद्वैत की यात्रा करता है, उसका ये तरीक़ा होता है।

समझ में आई बात?

ये भक्ति मार्ग है। स्पष्ट हो गया ये? ये भी स्पष्ट हो गया है कि भक्त अटक कहाँ पर सकता है? स्वयं बाहर जाने की जगह अपनी दुनिया वैसी ही चलानी है जैसी चल रही थी, उसमें भगवान को और घसीट लाए अंदर। सब कुछ अपना वैसे ही करना है।

उदाहरण के लिए, एक फैक्ट्री लगायी हुई है जिसमें ख़ूब बेईमानी करी जाती है। एक्साइज़ से लेकर कस्टम्स तक हर तरीक़े के टैक्स (कर) की चोरी की जाती है; गंदा माल बनाया जाता है, सब गड़बड़ करी जाती है। लेकिन उसमें बहुत बड़ी मूर्ति किसकी लगा दी है? और उसमें ख़ूब पूजा कराई जाती है; किसकी?

‘तो मैं तो वही रहूँगा जो मैं हूँ, और अपनी काली करतूतों में मैं भगवान को भी अंदर ले आऊँगा।' और भगवान को ले जा करके क्या करा? स्वर्ण मुकुट पहना दिया है; किस पैसे से? काली कमाई के पैसे से। काली कमाई के पैसे से मूर्ति को स्वर्ण मुकुट पहनाया।

तो मैं तो नहीं बदलूँगा, मैं तो अंदर ही रहूँगा। तुझे भी अंदर ला करके अपनी करतूतों में शामिल कर लूँगा। और निन्यानवे प्रतिशत भक्ति ऐसी ही होती है।

‘मुझे अपनी हरकतें तो चालू ही रखनी हैं। मुझे मौज-मस्ती करनी है, मैं अपनी मौज-मस्ती में तुझे भी अंदर ला दूँगा। और फिर दावा क्या करूँगा? कि ये जो मौज-मस्ती है, ये तो धार्मिक है। ये मैं मौज-मस्ती थोड़े ही कर रहा हूँ, ये तो मैं भक्ति कर रहा हूँ। ये मौज-मस्ती नहीं है, मनोरंजन नहीं है, ये भक्ति है।'

साहब, आप वही कर रहे हो जो दुनिया में कोई भी और करता है। बस उसमें आपने भगवान का नाम और जोड़ दिया है। ये आप ग़लत कर रहे हो। ये आप भगवान के साथ भी धोखा कर रहे हो। वो है न कि देते हैं भगवान को धोखा, इंसान को क्या छोड़ेंगे!

तो ज़्यादातर जो भक्त होते हैं — बहुत दुर्भाग्य की बात है — वो भगवान को भी धोखा देते हैं। वो वही कर रहे होते हैं जो उन्हें इस क्षेत्र में करना है, बस उसमें वो भगवान का नाम और जोड़ देते हैं। जो कि कहीं से भी ठीक नहीं है।

ठीक है?

लेकिन सच्चे भक्त की बात एकदम निराली होती है। जो सच्चा भक्त होता है, उसकी बात ही दूसरी होती है। (बोर्ड पर लिखे ‘मैं' तथा ‘विषय' की ओर संकेत कर कहते हैं) बड़े ये विचार का विषय है कि सीधे इसको छोड़ना ज़्यादा हिम्मत की बात है या इसको छोड़ना।

क्योंकि आप अगर माँ को लोगे न, आप जानवरों में भी ले लो, तो कई बार वो अपने विषय को, माने अपने बच्चे को, माने अपने बछड़े को बचाने के लिए अपनी जान देने को तैयार हो जाती है। तो बड़ा मुश्किल है ये बताना कि आपका जो मनचाहा विषय है, जब वो आपकी ज़िंदगी से छूट रहा होगा, तो आप उसको बचाओगे या ख़ुद को बचाओगे।

बात बँटी हुई है, कुछ कह नहीं सकते। कई बार ऐसा हो सकता है कि आप अपनी रक्षा के लिए कह दो — अच्छा चलो, मेरी जो चीज़ है उसको ले जाओ भाई, क्या करें! लेकिन हमने ऐसा भी देखा है कि चीज़ जब इतनी प्यारी हो जाती है — प्यार से आशय यहाँ मोह से है क्योंकि यहाँ प्रेम नहीं होता। ये जो समीकरण है, प्रेम का तो है नहीं, ये मोह और आसक्ति का है।

ठीक है न?

हमने ऐसा भी देखा है कि व्यक्ति इतना ज़्यादा आईडेंटिफ़ाइड (पहचान का) हो जाता है अपने विषय से, कहता है, ‘विषय नहीं छोडूँगा, प्राण छोड़ दूँगा।' देखा नहीं है लोग दंगों में जान दे देते हैं? देखा नहीं है क्या? लोगों को देखा नहीं है कि उन्हें नंबर चाहिए थे, नंबर नहीं आए बोर्ड में, तो अपनी जान दे दी।

वो ‘मैं’ तक को छोड़ने को तैयार हो जाते हैं, विषय को छोड़ने को तैयार नहीं होते। वो कहते हैं, ‘लालच नहीं छोडूँगा! लालच की ख़ातिर बैंक में घुसूँगा डकैती मारने और वहाँ गोली खाकर मर जाऊँगा।'

अब विषय क्या था? विषय था पैसा। वो पैसे का लालच नहीं छोड़ पाया, उसने प्राण छोड़ना बल्कि…। तो बड़ी हिम्मत चाहिए विषय को छोड़ने के लिए। बड़ी हिम्मत चाहिए! विषय को छोड़ता नहीं है भक्त, क्या करता है ? समर्पित करता है। वो छोड़ता नहीं, वो ले जाकर के दे देता है — ‘लो, मेरे भगवान, तुम्हें ही दे दिया।' क्योंकि देने के लिए बड़ी हिम्मत भी चाहिए और बड़ा प्रेम चाहिए।

वो कहता है, ‘देखो, ये चीज़ मुझे प्यारी थी लेकिन सबसे प्यारे तुम हो, तो लो। मेरा कोई नुकसान थोड़ी हो गया। अपने प्यारे को अपनी प्यारी दे दी।' तुम मेरे सबसे… और ये चीज़ मुझे…। तो जो प्यारी दी है वो दी भी किसको है? अपने प्यारे को ही तो दी है। तो भक्त कहता है, ‘लो, तुम्हें देता हूँ, सब तुम्हारा।'

यहाँ तक कि उसको क्रोध भी आता है, तो वो कहता है कि क्रोध भी कर लूँगा। उसको ये भी अधिकार मिल जाता है। वो कहता है, ‘मैं क्रोध भी कर लूँगा तुम पर।'

वो आपने सुनी होगी जो भिक्षुणी थी, वो कुपित हो गयी बुद्ध पर। तो बुद्ध की मूर्ति ले जाकर के बाहर ठंड में रख दी। बोली, ‘लो, ज़रा एक रात बाहर बिताओ। मस्त ठंड है। और ओस पड़ रही है, सुबह बात करते हैं।' तो ये रिश्ता बन जाता है कि अगर गुस्सा भी करना है, ताने भी देते हैं, उलाहना भी देते हैं, तो तुम्हीं को देंगे — तुम ही हो!’

ठीक है?

(चित्र की ओर संकेत करते हुए) अब ये ज्ञानी है। इसका खेल दूसरा है।

इन्होंने (भक्त ने) क्या करा था, जब इन पर आक्रमण हुए थे? इन्होंने गति करी थी। पहला काम था इन्होंने गति करी थी, इन पर गति के बाद ज्ञान आया और उस ज्ञान से समर्पण आया। (भक्त वाले खाने में सर्वप्रथम गति फिर ज्ञान और समर्पण क्रमशः लिखते हुए) ठीक है? इन्होंने पहली चीज़ क्या करी थी? गति।

ज्ञानी गति नहीं करता। ज्ञानी सर्वप्रथम जिज्ञासा करता है। और जिज्ञासा का अर्थ होता है — संघर्ष। ‘यही (युधयस्व) है!' वो भिड़ जाता है। वो कहता है, ‘कौन है? बताओ!'

आप कल्पना करिए एक छोटू की। और उससे चार-चार साल बड़े — वो ख़ुद मान लीजिए, तीसरी क्लास का है और सातवीं क्लास के आठ-दस लड़के आ करके उसकी रैगिंग करना चाहते हैं; लेकिन वो भिड़ गया है। और भिड़ ही नहीं गया है, वो उछल-उछल के उनके मुखौटे उतार रहा है। कह रहा है, ‘तुम हो कौन, अपना मुँह तो दिखाओ!'

‘तुम हो कौन, अपना मुँह तो दिखाओ! अपना मुँह तो दिखाओ! अपना मुँह तो दिखाओ!’

बड़ा मुश्किल काम है। बहुत मुश्किल काम है! तीसरी साल का छोटू और वो क्या करना चाह रहा है? उनके मुखौटे उतारना चाह रहा है। लगभग असंभव काम है। लेकिन अगर वो अडिग रह गया, वो भिड़ा ही रह गया। वो भिड़ा रह सकता है सिर्फ़ एक वजह से, उस वजह का ये नाम है। (ज्ञान के खाने में ‘प्रेम' शब्द लिखते हैं)

अगर उसमें प्रेम इतना हो कि वो कहे, ‘पीछे तो नहीं हटूँगा, भिड़ा रह जाऊँगा!’ तो उसकी जीत हो जाती है।

जीत कैसे होती है? जीत ऐसे होती है कि ये जितने हैं, ये सबसे अकेले भिड़ रहा है। (चित्र में हम पर प्रभाव डालने वाले संसार नक़ाबपोश सीनियर्स का उल्लेख करते हैं) अभी ये अकेला है। रजनीकांत बना हुआ है बिलकुल! सौ से एक साथ भिड़ रहा है।

ज्ञानी बेचारे की यही हालत है। उसे सौ से एक साथ भिड़ना पड़ता है। क्योंकि प्रकृति कैसी है? अनेकान्त है। प्रकृति में इतनी सारी चीज़ें हैं, किस-किस से निपटोगे! ज्ञानी का यही है, वो सबसे निपटता है! लेकिन उस बेचारे को एक राहत ये मिलती है कि हम देख चुके हैं कि ये सब-के-सब क्या हैं?

श्रोतागण: एक हैं।

आचार्य: प्रकृति के जितने भी अनेक तत्व हैं, वो सब मूल में क्या होते हैं? एक ही होते हैं। अगर ये छोटू उछल करके एक का भी मास्क उतार दे, मुखौटा उतार दे, तो वो पाता है कि मुखौटे के पीछे कुछ है ही नहीं। सिर्फ़ मुखौटा मुखौटा है। मुखौटा धारण करने वाला कोई नहीं है। इसी को बुद्ध ने कहा था अनात्मा। कुछ है जो बस भासित होता है, उसके पीछे कुछ नहीं है। प्रतीति-भर है, तत्व कुछ नहीं है।

अजीब बात है! प्रतीत होता है; है नहीं! दिखाई पड़ता है, सुनाई पड़ता है, अनुभव में आता है — जिसका मुखौटा उतार दिया छोटू ने, वो…? (चुटकी बजाते हुए) और एक का भी अगर मुखौटा उतार दिया तो वो पाता है कि पूरा तिलिस्म ढह जाता है, सब एक साथ गायब हो जाते हैं।

तो जो ऑड्स हैं, माने जो जीतने की संभावना है वो इनके प्रतिकूल हैं। द ऑड्स आर अगेंस्ट दिस लिटिल फाइटर। (बाधाएँ इस छोटे लड़ाके के विरोध में है) बहुत हैं! लेकिन एक चीज़ से उसको बहुत मदद भी मिलती है कि अगर उसने एक भी तत्व का यथार्थ जान लिया, तो उसने सबका यथार्थ जान लिया। बालू के एक कण की भी सच्चाई अगर उसने जान ली तो उसने पूरे ब्रह्मांड की सच्चाई जान ली।

किसी ज्ञानी का ये वचन है — ढूँढ़िएगा, मिल जाएगा। कि अगर आपको धूल के एक कण को भी जानना है सचमुच, तो आपको पूरे ब्रह्मांड को जानना पड़ेगा। बहुत सुंदर वक्तव्य है। अगर आपको धूल के एक कण को भी सचमुच जानना है तो आपको पूरे ब्रह्मांड को जानना पड़ेगा। पूरे ब्रह्मांड को जाने बिना आप उसको नहीं जान सकते। और अगर उसको जान गए तो…?

श्रोतागण: पूरे ब्रह्मांड को जान गए।

आचार्य: वाईसे वर्सा (इसके विपरीत)। अगर उसको जान गए तो पूरे ब्रह्मांड को भी जान गए। तो ज्ञानी एक बार में पाँच-सौ से भिड़ रहा है। बड़ा रजनीकांत! एक बार में पाँच-सौ से भिड़ रहा है। यहाँ तक कि ख़ुद से भी भिड़ रहा है। ज्ञानी तो पूरी दुनिया से संघर्ष में होता है और स्वयं से भी। लेकिन अगर एक जगह भी वो जीत गया…।

ऐसा-सा है कि आप अपने घर के छोटू के साथ बैडमिंटन खेलें, इक्कीस पॉइंट्स का। अब वो छोटू तीसरी का और आप जवान आदमी तीस साल के। वो तीसरी का, आप तीस के, तो ऐसे तो यही लगेगा कि आप ही जीतोगे लेकिन खेल का नियम दूसरा है। ध्यान से समझिएगा। खेल का नियम ये है कि अगर उसने एक पॉइंट भी बना लिया तो वो जीत गया।

आपको जीतने के लिए बनाने होंगे?

श्रोतागण: इक्कीस पॉइंट्स

आचार्य: आपके लिए ज़रूरी है कि आप उसे लव (प्रेम) पर हराएँ। लव पर वो हारेगा नहीं, क्योंकि लव है उसके पास। तो बस! (श्रोतागण हँसते हैं) आपके लिए ज़रूरी है कि आप उसे बिलकुल शून्य पर हराएँ और उसको जीतने के लिए बस ये करना है कि वो बस एक पॉइंट बना ले, वो जीत जाता है। ऐसा खेला होगा बच्चों के साथ। नहीं खेला है? कि चलो एक बना दो तो तुम जीत गए। और जीत भी जाते हैं बच्चे बहुत बार। क्योंकि आपको बनाने हैं इक्कीस, उसको बनाना है एक।

तो ज्ञानी को एक पॉइंट बनाना होता है और वो जीत जाता है। उसे सौ दफ़े लड़ाइयाँ नहीं लड़नी हैं। एक वस्तु की, एक विषय की, एक संबंध की, एक व्यक्ति की, एक विचार की अगर वो हक़ीक़त जान गया, तो वो पूरे अस्तित्व को, पूरे जीवन को जान गया। तो इसलिए उसकी जीतने की संभावना फिर एकदम नगण्य माने एकदम शून्य नहीं होती, वो जीत सकता है। ज्ञानी जीते हैं!

लेकिन उसके चलने का तरीक़ा, उसकी गति का तरीक़ा एकदम रक्तरंजित है। उसका रास्ता खून से तर-ब-तर रहता है। यहाँ (भक्ति में) खून वगैरह की बहुत बात नहीं है। यहाँ बल्कि माधुर्य है। यहाँ तो जो अपना था, जो प्यारा था, वो प्यारे को ही समर्पित कर दिया गया है। इसलिए भक्ति ज्ञान की अपेक्षा ज़्यादा प्रचलित भी रही है। क्योंकि इतना ज़्यादा संघर्ष का तरीक़ा होता नहीं है भक्ति का।

जैसे हमने कहा था कि भक्त यहाँ ( मॉडल दिखाते हुए) पर बेईमानी कर सकता है, ठीक उसी तरीक़े से ज्ञानी भी बेईमानी कर सकता है। ज्ञानी क्या बेईमानी कर सकता है? ज्ञानी क्या बेईमानी कर सकता है? ज्ञानी ये बोल दे, ‘मैंने सबको हरा दिया।'

करा कुछ नहीं है, ख़ुद जा के झाड़ में छुप गया है तो सीनियर्स उसको देख नहीं पा रहे हैं। पर चूँकि अभी दिखाई नहीं दे रहे तो उसने अपनी ओर से ही एक तरफ़ा घोषणा क्या कर दी? ‘मैंने सबको हरा दिया।'

तो जैसे भक्त बेईमान हो सकता है, वैसे ज्ञानी भी महा बेईमान हो सकता है। है अंदर ही प्रकृति के, है अभी भी बद्ध संसार से ही, लेकिन घोषणा ये कर रहा है कि मैंने तो साहब सबको हरा दिया!

बेईमान! ये बेईमान ज्ञानी है।

(बोर्ड पर बने मॉडल को दर्शाते हैं) अरे! अभी अगर तुम बचे हुए हो तो ये कैसे नहीं बचे? ये तीनों क्या हैं? ये, ये और ये क्या हैं? ( मॉडल में स्थित परिधि माने प्रकृति, केंद्र बिंदु माने ज्ञानी और संसार को दिखाकर पूछते हैं)

श्रोतागण: एक ही हैं।

आचार्य: तो ये घोषणा तुम कैसे कर सकते हो कि मैंने सबको हरा दिया और मैं अभी शेष हूँ? अगर तुम शेष हो, ‘मैं’ यदि शेष है, तो ‘मैं' का जगत भी शेष होगा। अहम् यदि शेष है तो भ्रम भी शेष होगा। क्या ऐसा हो सकता है कि अहम् शेष हो और भ्रम शेष न हो? हो सकता है? नहीं। पर ज्ञानी को बड़ा आनंद आता है ये घोषणा करने में कि मैं तो दिग्विजयी चक्रवर्ती हो गया — सबको हरा दिया। ‘मैंने!’ किसने? ‘मैं! महाज्ञानी हूँ, सबको हरा दिया।'

तो ज्ञानी का रास्ता चूँकि संघर्ष का है तो उसको अब मालूम है क्या करना पड़ता है? ऑऽऽ! अब उसको करनी पड़ती है सुसाइड बोम्बिंग (आत्मघाती बमबारी) वो कहता है कि मैं यदि शेष हूँ तो सब शेष रहेंगे। तो इन सबको मारने का एक ही तरीक़ा है। भक्त ने किसको मारा था?

श्रोतागण: विषय।

आचार्य: अब ज्ञानी किसको मारेगा? (बोर्ड पर भक्ति वाले खाने में लिखे ‘विषय' की ओर संकेत करते हैं) ये मारा था भक्त ने। (ज्ञानी वाले खाने में ‘मैं' की ओर संकेत करते हैं) और इसको मारेगा ज्ञानी। तो अब वो यहाँ पर करता है धमाका — बूम! सब ख़त्म। बस ये बचा – अद्वैत।

और उस धमाके का नाम होता है नेति नेति — कुछ नहीं है। मैं ही नहीं हूँ! मैं नहीं हूँ। मैं कुछ नहीं हूँ। जब मैं ही नहीं हूँ तो कौन बचा इससे चिपकने को! ये ज्ञान का तरीक़ा है। कुछ नहीं! एक झटके में सब खल्लास। साफ़ मामला। लेकिन उसके लिए बड़ा जिगर चाहिए।

ज्ञानी होने के लिए बहुत-बहुत हिम्मत चाहिए। ये नहीं कर पाता आम आदमी। यही वजह है कि आप भारत में देखोगे तो निन्यानवे प्रतिशत लोग अगर वो धार्मिक होंगे तो वो भक्त होंगे। अगर कोई बोलता है कि वो धार्मिक है तो निन्यानवे प्रतिशत संभावना यही है कि वो भक्त है। क्योंकि ज्ञान का मार्ग बहुत-बहुत-बहुत कठिन है।

यहाँ पर (भक्त के लिए) समर्पण है और यहाँ पर (ज्ञानी के लिए) समाप्ति। समर्पण आसान पड़ता है, समाप्ति के लिए दिल नहीं मानता। हालाँकि समर्पण से भी समाप्ति हो जाती है। पर सीधी-सीधी समाप्ति के लिए…।

अब इससे दो सूत्र समझिएगा अच्छे से। रमण महर्षि ज्ञान मार्ग को कहा करते थे ‘द डायरेक्ट पाथ’। आप देख पा रहे हैं कि ये छोटा है रास्ता, एकदम सीधा है। यहाँ क्या है — भिड़ जाओ और जब देखो कि इनको हरा नहीं पा रहे हो, जब भिड़ जाओ और देखो कि हरा नहीं पा रहे हो तो क्या करो? बूम!

और ये नहीं कि बूम करके पूरी दुनिया उड़ानी है, बूम करके यदि एक को भी उड़ा दिया तो पूरी दुनिया उड़ गयी। बहुत बड़ा बम भी नहीं चाहिए, आप कहो, ‘अरे! पूरी प्रकृति, पूरी कायनात, पूरे ब्रह्मांड को उड़ाने वाला बम कहाँ से लाएँ?' उतना बड़ा बम नहीं चाहिए। बस किसी एक को उड़ा दो अपने साथ। अगर एक भी उड़ गया तो सब उड़ गए।

समझ में आ रही है बात?

तो ये डायरेक्ट पाथ (सीधा रास्ता) होता है, शॉर्टेस्ट पाथ (सबसे छोटा रास्ता)। ज्ञान का जो मार्ग है वो सबसे सीधा, सबसे छोटा, सबसे त्वरित होता है। सबसे त्वरित! एकदम सीधा! पर सिर्फ़ उनके लिए जो उस पर चल पाएँ। जो उस पर चल पाएँ, उनके लिए सबसे सीधा मार्ग है।

और दूसरी बात — फिर रमण महर्षि के शब्दों पर ही वापस आते हैं।‌ उन्होंने कहा था कि भक्ति ज्ञान की माता है। प्रेम पहले आता है। मैं बार-बार कहता हूँ — प्रेम पहले आता है, ज्ञान बाद में आता है। यहाँ पर (भक्ति में) भी शुरुआत किससे है?

श्रोतागण: प्रेम से।

आचार्य: और यहाँ (ज्ञान में) पर भी शुरुआत किससे है?

श्रोतागण: प्रेम से।

आचार्य: प्रेम यदि न हो तो ये जो भक्त है ये गति नहीं करेगा; और प्रेम यदि न हो तो ये जो ज्ञानी है ये संघर्ष नहीं करेगा। प्रेम ही है जो भक्त को बाहर भगाता है और ज्ञानी को जुझा देता है, लड़वा देता है। वो प्रेम ही है, प्रेम की ही ताकत है। और प्रेम का ही बल है जो ज्ञानी को फिर समाप्ति का हौसला देता है।

कहता है, ‘मिट भी गए तो कोई बात नहीं। मिट के ये (अद्वैत) मिलेगा न! हम मिटेंगे। हमारे मिटने का अर्थ होगा — ये (अद्वैत) बस बचा। मिटे नहीं हैं, मिले हैं।' ज्ञानी क्या बोल के मिटता है? ‘मिटने नहीं जा रहा हूँ, मिलने जा रहा हूँ।' ये ज्ञानी का बहुत बड़ा प्रेम है।

ये मज़ेदार बात है पर आप ये तक कह सकते हो — सोच कर देखिएगा — कि ज्ञानी का प्रेम भक्त के प्रेम से थोड़ा ज़्यादा ही होता होगा, कम नहीं। विचार करिएगा। इसका प्रेम इतना बड़ा है इतना बड़ा है कि ये अपने प्रेम की ख़ातिर ख़ुद को ही मिटा देता है; ‘मैं’ को ही मिटा देता है। प्रेम भक्त के पास भी है पर वो अपने सारे विषयों का…?

श्रोतागण: समर्पण करता है।

आचार्य: स्वयं को तो वो…?

श्रोतागण: बचाकर रखता है।

आचार्य: ज्ञानी होना महा-महा प्रेम की बात है। अब ये एक अलग मुद्दा है कि ऐतिहासिक रूप से भक्तिमार्ग को प्रेममार्ग माना गया। ऐतिहासिक रूप से प्रेममार्ग किसको माना गया है? भक्तिमार्ग को ही तो प्रेममार्ग कह देते हैं, समानार्थी बनते हैं। लेकिन मेरे देखे ज्ञानमार्ग प्रेममार्ग है। विचार करिए, ज़्यादा प्रेम कहाँ चाहिए? ख़ुद को मिटाने में।

ये स्पष्ट हो रहा है? इसपर कोई जिज्ञासा हो तो बताइए।

यात्रा यहाँ (ज्ञानमार्ग में) भी द्वैत से अद्वैत की है। द्वैत माने यहाँ कौन-से दो थे? मैं और प्रकृति। वहाँ (भक्तिमार्ग में) भी द्वैत से अद्वैत की यात्रा हुई है और यहाँ (ज्ञानमार्ग में) भी द्वैत से अद्वैत की यात्रा हुई है।

प्रश्नकर्ता: भगवान श्री प्रणाम! जो अभी जिज्ञासा कर रहा था भक्त, मुखौटे हटा रहा था, तो देखा कि पीछे कुछ नहीं है। तो मुखौटे किस पर थे?

आचार्य: किसी पर भी नहीं थे। वो आपकी आँख का भ्रम थे। तो मुखौटे हटाने का भी इसलिए तरीक़ा क्या होता है? अपनी आँख साफ़ करो। कहने को तो ये संघर्ष प्रकृति के तत्वों के विरुद्ध है, पर वास्तव में ये सिर्फ़…?

प्र: अपने।

आचार्य: अपने विरुद्ध है। इसलिए आत्मज्ञान। अरे! दूसरे से क्या भिड़ रहे हो, दूसरा तो आपकी आँख का धोखा है। मेरी आँख में तिनका पड़ गया और मुझे लग रहा है कि यहाँ पर कोई हाथी खड़ा है, मैं हाथी से भिडूँ या अपनी आँख साफ़ करूँ?

प्र: तो जो याद आता है, ओशो साहब कहा करते थे कि आँख में तिनका पड़ गया तो पर्वत ग‌ये।

आचार्य: पर्वत गये, सूरज चला गया पूरा। सब कुछ ख़त्म कर सकता है। इतना-सा धूल का कण सूरज पर भारी पड़ सकता है। एक कविता लिखी थी मैंने — ‘रेत का कण विशाल इतना है, उसके आगे समंदर छुप जाते।'

गोवा गया हुआ था। वहाँ गया ही इसीलिए था कि किसी तरीक़े से कुछ दिन के लिए… पर यही काम सारा वहाँ भी आ गया और वहाँ शिविर भी था। तो जब शिविर होता है तो उसके साथ बहुत सारे काम हो जाते हैं।

तो मुझे बीच (समुद्र तट) पर बैठना पसंद है। मैंने देखा कि पाँच दिन बीत चुके हैं और मुझे घंटेभर की मोहलत नहीं मिली है कि मैं बीच पर शांति से बैठ पाऊँ। तो फिर जब वहाँ गया तो वहाँ पर एक कविता लिखी थी। और उसकी आख़िरी दो पंक्तियाँ यही थीं कि ‘रेत का कण विशाल इतना है, रेत आगे समंदर छुप जाता।'

रेत का कण समझते हो? छोटे-छोटे मुद्दे ज़िंदगी के, लेकिन असंख्य! वो इतने सारे हो गए थे, उन्होंने मुझे घेर लिया और मैं समुद्र के पास जा ही नहीं पाया। तो ‘रेत का कण विशाल इतना है, रेत आगे समंदर छुप जाता।'

प्र: तो आवरण ही अपने पर था। विक्षेप फिर क्या? विक्षेप तो कुछ नहीं हुआ।

आचार्य: जब आपकी आँख में धूल पड़ी होती है तो दो बातें होती हैं — एक तो ये कि जो है वो दिखाई नहीं देता, उसको आवरण बोल दिया; और दूसरा ये भी तो होता है न कि हाथी नहीं है और हाथी…?

प्र: दिख गया।

आचार्य: दिख गया। वो विक्षेप है।

प्र: तो वो भी? आचार्य: है उसी से। है उसी से। आँख को कण से मोहब्बत हो गयी है। आँख को धूल से मोहब्बत हो गयी है। ये कहे कि ये तो बहुत प्यारी चीज़ है, बहुत प्यारी चीज़ है। अब सोचो, वो एक ऐसी चीज़ को प्यारा कह रही है जो उससे उसका स्वभाव छीन लेगी। ये हमसब की दास्तान है। हम उसको प्यारा बोल देते हैं जो हमसे हमारा स्वभाव छीन लेता है।

आँख को अगर धूल से प्रेम हो गया है तो इसमें समस्या क्या है? क्या समस्या है? धूल आँख से आँख का स्वभाव छीन लेगी। आँख का क्या स्वभाव है?

श्रोतागण: देखना।

आचार्य: लेकिन आँख को अगर धूल से ही प्यार हो गया तो धूल आँख से आँख का स्वभाव ही छीन लेगी न! यही हमारे साथ होता है। हमें जिन भी विषयों से मोह होता है, वो वही होते हैं जो हमसे हमारा स्वभाव छीन लेते हैं। और आँख का अगर स्वभाव है देखना, तो जीव का क्या स्वभाव है? मुक्ति। हम उन्हीं से जाकर के चिपकते हैं जो हमसे हमारी मुक्ति छीन लेते हैं।

समझ में आ रही है बात?

प्र: नमस्ते, आचार्य जी! मैंने एक कहानी सुनी थी। आप बताते हैं कि भक्ति बिना ज्ञान अधूरा, ज्ञान के बिना भक्ति अधूरी। मुझे इसमें दो कहानियाँ याद आ रही हैं। मैं ठीक से समझ पा रही हूँ कि नहीं — आप बता दीजिए।

भक्ति में मुझे तुलसीदास जी की कहानी याद आ रही है। तुलसीदास जी एक बार जगन्नाथपुरी जाते हैं और सबसे, ब्रह्म राक्षस से भी वो राम को ही माँगते हैं, हनुमान से भी राम को माँगते हैं। उनकी विनय-पत्रिका में भी उन्होंने सबको नमन किया है। तो हर जगह वो राम को देख रहे हैं।

कहानी ऐसी है कि जगन्नाथपुरी जाते हैं, तो उधर राम को देख नहीं पाते। ‘वो कृष्ण की दूसरी मूर्ति है। इधर तो मेरा राम नहीं है।' तो वापस जाते हैं। तो वापस जाते हैं, तो कृष्ण उनको दूसरे रूप में आकर, प्रसाद देकर उनको भेजते हैं कि ‘वापस जाओ, देखो, और ठीक से देखो, उधर ही तुझे अपना राम मिलेगा।'

तो मुझे लग रहा है कि — सिंबॉलिकली (सांकेतिक रूप से) — तुलसीदास जी ने पूरा ‘रामचरितमानस' लिखा, फिर भी वो सब जगह पूरे सत्य को नहीं जान पा रहे थे। तो इसलिए भगवान ने ही आकर उनको बताया कि तुम्हारी पूरी भक्ति है, लेकिन तुम ये नहीं देख पा रहे हो कि कृष्ण भी एक हैं, शिव भी एक हैं और राम भी एक हैं। वो सिखाने के लिए ये किया?

आचार्य: ये आप जो प्रश्न पूछ रही हैं, अब इसके लिए मुझे कुछ और भी समझाना पड़ेगा। इन्होंने जो पूछा वो समझने के लिए निर्गुणी भक्ति और सगुणी भक्ति में अंतर समझना पड़ेगा।

सगुणी भक्ति में भेद होते हैं। सगुणी भक्ति में राम, शिव, कृष्ण ये सब अलग-अलग हैं। सगुणी भक्ति राम और कृष्ण को तो फिर भी अगल-बगल का मान लेगी कि दोनों वैष्णव हैं, लेकिन शिव को एकदम अलग मानेगी।

ठीक है?

सगुणी भक्ति क्या करती है कि यहाँ से यहाँ तक (अहम् से आत्मा तक) जाने का हौसला पाने के लिए वो ऐसी कल्पना करती है कि इसके अंदर ही पिताजी (आत्मा) यहीं तो बैठे हुए हैं, ‘भागो रे! जल्दी से मिल जाएँगे।' अगर आपको आरंभ में ही पता हो कि पिताजी तो इस महा दीवार (सीमारेखा) के पार हैं, भवसागर के पार हैं पिताजी, तो आपको यहाँ से भागने का हौसला नहीं मिलेगा।

जो साधारण भक्त है उसको आप बता दो कि बेटा! सत्य तो निर्गुण-निराकार होता है बिलकुल, अलख होता है, अगोचर होता है, अगम होता है, तो वो यहीं बैठा रहेगा। कहेगा, ‘मारो मुझे। मारो मुझे, मारो! यहीं पर अभी मार दो। निर्गुण-निराकार, ये क्या चीज़ होती है?’

काहे कि कोई भी चीज़ निर्गुण, निराकार होती ही नहीं है। चीज़ है तो गुण होगा और साकार होगी। तो उसका वही हो जाएगा, ‘मारो, मुझे मारो!'

तो साधारण भक्त को सगुणभक्ति से ही शुरुआत करनी पड़ती है। उसको ये कल्पना करनी ही पड़ती है कि ये जो हैं (पिताजी अर्थात् परमात्मा), ये यहाँ दीवार (सीमारेखा) के अंदर बैठे प्रतीक्षा कर रहे हैं कि तुम आओ मेरी तरफ़। तो फिर वो इस हौसले से, इस भरोसे पर गति कर पाता है।

वो इतना ज़्यादा बेचारा अपनी इंद्रियों से दबा होता है कि वो ये नहीं, वो सिद्धांत के रूप में भी ये नहीं मान सकता कि निर्गुण-निराकार जैसा कुछ होता है। वो कहेगा कि अगर कुछ होता है तो सगुण होगा। क्योंकि उसकी बात ठीक है, इस दुनिया में जो भी कुछ होता है वो तो सगुण ही होता है न।

उसमें अभी मैं-भाव बहुत प्रबल है। जो साधारण भक्त होता है न उसमें मैं-भाव बहुत प्रबल होता है। जब मैं-भाव बहुत प्रबल होता है तो देहभाव प्रबल होता है। जब देहभाव प्रबल होता है तो आप कैसे मानोगे कि कुछ ऐसा हो सकता है जो विदेह है। विदेह माने?

श्रोतागण: बॉडीलेस (अशरीरी)।

आचार्य: हाँ, बॉडीलेस है। कैसे मानोगे? नहीं हो पाता। तो उसकी मजबूरी हो जाती है फिर। जो आरंभिक भक्ति की अवस्था है, उसकी विवशता है कि उसे सगुणी होना पड़ता है। सगुणी नहीं होगी तो भक्त यात्रा का अंत तो छोड़िए आरंभ भी नहीं करेगा।

और सगुण भी कैसा बनाता है फिर भक्त अपने भगवान को — सबसे ख़ूबसूरत तरीक़े से। क्योंकि सुंदर होगा तभी तो उसकी ओर जाने का मन करेगा। जो भक्त होता है, वो अपने भगवान को सबसे बलशाली दिखाता है; दुनियाभर में हुआ है, सब धर्मों में हुआ है, सब धाराओं में हुआ है।

जो अपना भगवान, अपना ईश्वर, अपना गॉड , अपना अल्लाह है उसके साथ सबसे ख़ूबसूरत तरीके की उपाधियाँ जोड़ी जाती हैं कि नहीं? दुनिया के जो सबसे अच्छे गुण हैं, उसमें हैं। दया शीलता में वो नंबर एक, और अगर कुपित हो जाए तो क्रोध में भी नंबर एक। माने हर चीज़ में वो! दयालु भी वही है, कृपालु भी वही है और सज़ा भी वही देता है। स्वर्ग भी वही देता है, माने सबसे बड़ा सुख भी वही देता है और नर्क भी वही देता है, माने सबसे बड़ा दुख भी वही देता है।

‘हे ईश्वर! क्या बढ़िया तूने जन्म दिया है घर में मेरा चौथा लड़का पैदा हुआ है!’ तो जन्म भी वही देता है और कोई मर गया तो, ‘हाय ईश्वर! ये तूने क्या किया!’ और मौत भी वही देता है। माने हर चीज़ में है तो वही।

ये सब सगुणता के काम हैं। जो सबसे ऊँचे-ऊँचे गुण होते हैं, वो ले जा के आप अपने भगवान में स्थापित कर देते हो। और वो ज़रूरी है। हम कह रहे हैं अगर आप नहीं करोगे तो आप ये गति ही — ये यात्रा — यहाँ (केंद्र) से यहाँ (सीमारेखा) तक की नहीं कर पाओगे; आपको भरोसा ही नहीं आएगा।

ये अलग बात है कि ये जो सगुण भक्त है ये जब यहाँ (सीमारेखा पर) पहुँचता है तो इसको पता चलता है कि अंदर हैं ही नहीं। ‘यहाँ नहीं हैं।' सारे गुणों को समर्पित करना पड़ेगा तब होगा। और गुण समर्पित हो गए तो ये (मैं) समर्पित हो गया, ये समर्पित हो गया तो ये सब (भक्त, संसार, सीमारेखा) मिट गया, तो बस ये (अद्वैत) बचा।

समझ में आ रही है बात?

तो सगुणी भक्ति में ये विवाद चलेगा, राम और कृष्ण के बीच का विवाद चलेगा। आप रामभक्तों से बात कर लीजिए, उन्हें बहुत अच्छा नहीं लगेगा कि आप किसी और देवी-देवता को पूजते हों। ये भी ज़रूरी नहीं है कि आप इसाई हों कि मुसलमान हों, आप कह दें कि आप हिंदू हैं लेकिन आप किसी और देवता की उपासना करते हैं। कोई रामभक्त होगा, उसे…!

और कृष्णभक्तों को तो एकदम नहीं पसंद आता आप किसी और की बात कर दें तो। ‘किसी और की बात क्यों करने लगे!’

ये सब सगुणी भक्ति में चलता है — ‘मेरा वाला।' क्योंकि जहाँ गुण हैं वहाँ ममत्व है। ‘मेरा वाला, बस मेरा वाला ठीक है, बाकी सब गड़बड़ मामला है।’ वहाँ एकत्व नहीं होता। वहाँ क्या होता है? ममत्व होता है। एकत्व में क्या देख लिया जाता है? और ममत्व में — वो जो एक विशिष्ट है वो बस मेरा है। सब एक नहीं हैं। तो ये सगुणी भक्ति में होता है।

ये स्पष्ट है?

निर्गुणी में क्या होता है? अब जैसे सगुणी भक्ति सूरदास आ जाएँगे, तुलसीदास भी उसी में आएँगे। कृष्ण को ले लें तो सूर हैं और राम को ले लें तो तुलसीदास हैं। निर्गुणी भक्ति में कौन आएँगे?

श्रोतागण: संत कबीर।

आचार्य: हाँ, वहाँ आएँगे संत कबीर। उनको आप नहीं पाएँगे कि वो ईश्वर के अलौकिक गुण-रूप का वर्णन कर रहे हैं। कहीं भी नहीं, एकदम नहीं। वो कौन हैं? जिनको ये गति (अहम् से आत्मा की ओर) करने के लिए ये मानने की ज़रूरत नहीं पड़ती है कि पप्पा अंदर ही है। उनको यहीं से (केंद्र से) पता है। इतना ज्ञान वो यहीं से रखते हैं कि पप्पा तो बाहर ही हैं। वो निर्गुणी भक्ति होती है।

निर्गुणी भक्ति सगुणी की अपेक्षा निश्चित रूप से श्रेष्ठ होती है लेकिन दुष्कर भी होती है। क्योंकि कैसे प्रेम करोगे जिसका न मुँह है, न ठिकाना है, न अतीत है, न आगत है! उससे प्रेम कैसे करें? हमें तो प्रेम करने के लिए क्या चाहिए? ये चाहिए! (श्रोताओं की ओर संकेत करते हुए) हमें तो प्रेम करने के लिए कोई चाहिए। हम मात्र प्रेम नहीं करते, हम किसी से प्रेम करते हैं। हम प्रेमी नहीं होते, हम किसी के प्रेमी होते हैं। हम प्रेममात्र नहीं जानते, हम विशिष्ट प्रेम जानते हैं। एक कोई स्पेसिफिक (विशिष्ट) है, उससे प्रेम हो गया है, बाक़ी से तो…।

समझ में आ रही है बात?

तो ये निर्गुणी-सगुणी भक्ति का ये अंतर हो गया। स्पष्ट हुई आपको बात क्या है?

तो ये जो भक्ति साहित्य है उसमें आपको ये सब देखने को मिलेगा कि कोई अपने भगवान के लिए किसी दूसरे के भगवान से विवाद करने जुड़ गया और ये सब बातें हो गयीं। हालाँकि उन सब कथाओं का अंत यही बताकर के होता है कि देखो, वो सब एक ही हैं, तुम व्यर्थ विवाद कर रहे हो।

तो वो जो भेद है वो कहाँ से आता है? जब आप इनको अंदर ले आ कर सगुण बनाते हैं, तो गुण तो आप उन पर अपने हिसाब से डालते हैं न! तो एक उन पर अपने हिसाब से गुण डालेगा, दूसरा उन पर अपने हिसाब से गुण डालेगा, तो दोनों के भगवान अलग-अलग हो जाएँगे। तो सगुणी भक्ति में इसीलिए बहुत सारे होते हैं। क्योंकि सब अपने-अपने हिसाब से अपने-अपने आराध्य की, इष्ट की निर्मित्ती कर लेते हैं।

‘मुझे जैसा उचित लगता है वैसा मैंने…।'

अफ्रीका का जो गॉड होगा, वो कैसा होगा? जापान का जो गॉड होगा, वो कैसा होगा? क्योंकि सबने अपने-अपने हिसाब से अपने आराध्य पर गुण डाल दिये। और गड़बड़ तब हो जाती है जब आप वहीं पर अटक जाओ; आप कहो, ‘यही तो असली गॉड है।' नहीं।

अगर सगुणी से शुरुआत हुई भी है तो भी आना तो निर्गुण तक ही पड़ेगा न! वो जितने आपने गुण अपने आराध्य, अपने पूज्य, अपने प्रेमी पर डाले हैं, आपको देखना पड़ेगा कि वो उसके नहीं, आपके हैं। आपने उस हिसाब से रचना कर दी है अपने आराध्य की, मूर्ति की, छवि की, कथा की — वो आपने रचना करी है।

प्र: आचार्य जी, मैं आपसे जुड़ी हूँ इसलिए मुझे ये समझ में आ रहा है — ज्ञान और भक्ति और ये दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। इसमें मुझे ये कहानी याद आ रही है जो मीराबाई की है। मीराबाई किसी आश्रम जाती हैं। महर्षि का नाम याद नहीं आ रहा है लेकिन उसको इसलिए आश्रम के अंदर प्रवेश नहीं मिलता है क्योंकि वो महिला है। इधर सिर्फ़ पुरुषों को प्रवेश है। तो फिर उसका थोड़ा वाद-विवाद चलता है जो भी शिष्य लोग बाहर रहते हैं।

जो भी महर्षि बैठे हैं, वो अंदर ध्यान करते रहते हैं।‌ उनका मुझे नाम नहीं याद आ रहा है। तो वो बोलती हैं, ‘मुझे लगा था कि पूरे जगत में एक ही पुरुष है, आप कौनसे पुरुष की बात कर रहे हैं?’ तो वो बात बहुत लगती है उनको।

आचार्य: समझ में आ गयी बात?

जो सच्चा भक्त होता है उसके लिए एक ही पुरुष होता है। जो सच्चा भक्त है, जैसे मीरा हैं, उनके लिए सिर्फ़ एक पुरुष रहेगा। (चित्र में बने आत्मा की ओर संकेत करके) लेकिन जब आप इसको (चित्र में आत्मा को दर्शाती बिन्दु की ओर संकेत करके) इधर (सीमारेखा या प्रकृति के अंदर, संसार में) ले आते हो तो फिर आप बहुत सारा ये-वो, दुनियाभर का झंझट बना लेते हो। बहुत बढ़िया!

प्र: आचार्य जी, मतलब मीराबाई उनको ये समझा रही थी, वो महर्षि कहाँ अटक रहे थे। ज्ञान तो था उनको। पूरा ज्ञान तो था लेकिन प्रेम नहीं था। ऐसा कुछ था?

आचार्य: नहीं, ज्ञान नहीं था। ज्ञान जब होता है तो ये जितने टुकटुक टुकटुक होते हैं, आपको दिख जाता है कि ये सब एक हैं, और नक़ाब उनके अलग-अलग हैं। प्रतीत अलग-अलग हो रहे हैं, नक़ाब से अलग हैं, भीतर से एक हैं। तो इन्हीं जो इतने सारे डुमडुम डुमडुम हैं, इनमें एक पुरुष है और एक स्त्री है। एक पुरुष है और एक?

प्र: स्त्री।

आचार्य: पुरुष और स्त्री को अलग-अलग कौन मानेगा? जो अभी साफ़-साफ़ नक़ाब उतार नहीं पा रहा है। जिसने नक़ाब उतार दिया वो कहेगा पुरुष और स्त्री एक ही हैं; दोनों चेतनामात्र हैं। जब नक़ाब नहीं उतरेगा तो उसको स्त्री, स्त्री जैसी दिखेगी, और पुरुष… क्योंकि ऊपर से तो दोनों अलग-अलग दिखते ही हैं। नक़ाब तो दोनों के अलग-अलग हैं ही न! एक के नक़ाब में दाढ़ी-मूँछ है, एक का चिकना नक़ाब है। तो वो कहता है — दोनों अलग-अलग हैं।

दोनों अलग दिख रहे हैं तो इसका मतलब ही यही है कि अभी आपने उनका मास्क उतारा नहीं है। और मास्क नहीं उतारने से क्या मतलब है?

प्र: आँख में धूल है।

आचार्य: आँख में धूल बहुत पड़ी हुई है, आत्मज्ञान नहीं है। जब आत्मज्ञान होता है तो स्त्री-पुरुष को आप देह की दृष्टि से देख नहीं पाओगे ।

प्र: नमस्ते, आचार्य जी! अभी जैसे कि आपने एक बात कही थी कि अगर धूल का कण आँख में चला जाता है तो आँख का स्वभाव ही चला जाता है। तो उसी से संबंधित महसूस होता है कि जो मोह की बात हो रही है — मोह हम सोचते हैं कि शायद हमारे अपने अंदर से निकल गया है लेकिन पुत्र के लिए हमेशा ही आ जाता है मोह। तो वो वाकई धूल के कण की तरह चुभता भी है, निकालने की भी कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिलती है।

और वो पुत्र वास्तव में आपके साथ जुड़ा है तो उसके साथ जो मोह है उसको परिभाषित करके मैंने उसको बोल दिया कि अब तू मेरा गुरु है। वो बैठा भी है, यहाँ पर है। तो उसको मैं रोज़ बोलती हूँ। (श्रोतागण हँसते हैं)

आचार्य: दोनों में से कौनसा चाहिए आपको? बताइए। उसी के अनुसार फिर समाधान।

प्र: ज्ञान।

आचार्य: ज्ञान वाला मुश्किल पड़ेगा। निन्यानवे प्रतिशत लोग ज्ञान के नाम से ही भागते हैं। मुश्किल पड़ेगा।

प्र: मुश्किल वाला करेंगे, चलो।

आचार्य: मुश्किल तो फिर यही है कि देह का पुत्र है, मेरा है ही नहीं। देह का पुत्र है मेरा है ही नहीं, संयोगों का पुत्र है। एक संयोग हुआ था कि मैं स्त्री पैदा हुई। स्त्री न होतीं आप तो आपको बेटा होता क्या?

प्र: नहीं।

आचार्य: एक संयोग ही तो था। सबसे पहले शुरुआत करिए कि आप एक महिला पैदा हुईं। आप महिला न पैदा होतीं तो गर्भ कहाँ से करतीं? तो पुत्र कहाँ से आता? तो सारी बात ही संयोग से शुरू हो रही है। तो वो बेटा भी किसका है फिर? संयोग का बेटा है। आपका है ही नहीं।

आप पैदा हुईं – यही संयोग की बात है। बेटा भी पैदा हुआ — ये भी संयोग की बात है। बेटी भी तो हो सकता था, ये भी हो सकता था कि न ही पैदा होता। कुछ भी हो सकता था। तो वो जो कुछ भी है संयोग मात्र का है और संयोग के लिए ही दूसरा नाम क्या है? प्रकृति। आपका नहीं है, प्रकृति का है। आपका नहीं है।

ये ज्ञान मार्ग है। बात बन गयी हो तो बता दीजिए। (श्रोतागण हँसते हैं)

ज्ञान तो इतना सीधा होता है। मतलब, एज़ सिंपल एज़ सुसाइड बॉम्बिंग! (आत्मघाती बमबारी के समान सीधा) एक सेकंड में खेल ख़त्म!

प्र: और ये सुनते ही दुख होना शुरू हो गया।

आचार्य: इसका (भक्त का) जो रास्ता होता है वो क्या कहता है? इसका कहता है, ‘बेटा मुझे प्यारा है। बेटे से ज़्यादा मुझे कोई और प्यारा है। जो सबसे प्यारा है उसको बेटा समर्पित किये देती हूँ।'

प्र: ये ठीक है। (श्रोतागण हँसते हैं)

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