आचार्य प्रशांत: ध्यान की तीन बेहतरीन विधियाँ हैं। हज़ारों हो सकती हैं, इसमें ये तीन सर्वश्रेष्ठ हैं। पहला — जप; जप का अर्थ है दोहराना, रिपिटिशन, ताकि भूलें नहीं, लगातार याद रहे, कोंस्टेंट रिमेंबरेन्स (सतत स्मरण)। लगातार नाम लिया जाता रहे, लगातार नाम लिया जाता रहे।
दूसरा, इस बात को बड़े विनीत भाव से स्वीकार करना कि मैं कुछ भी कर लूँ, मन में चलते तो ख़याल ही रहते हैं। जब हम जेन कहानियाँ कर रहे थे तो तुम्हें याद होगा कि एक कहानी थी कि एक साधक एक जेन गुरु के पास जाता है और कहता है कि मेरे मन में अब कुछ नहीं है। अब क्या करूँ? तो गुरु कहता है कि इसको फेंक दो, इस ‘कुछ नहीं’ को भी फेंक दो।
तो हमारा मन कुछ ऐसा विचित्र है कि उसके लिए ‘कुछ नहीं’ भी एक ख़याल है, शून्य वो हो नहीं पाता। इस बात को बड़े विनम्र भाव से जो स्वीकार न करे, जो इस धोखे में रहे कि नहीं, मन तो खाली हो गया है, वो अपनेआप को ही धोखा दे रहा है।
विचार मन में चलते ही रहते हैं, चलते ही रहते हैं, उसका स्वभाव है। कभी सूक्ष्म, कभी स्थूल, पर उसमें कुछ-न-कुछ भरा अवश्य रहता है। तो जब भरा रहता ही है, तो ये जो दूसरी विधि है, ये कहती है कि जब भरा हुआ है — और मन में जो भी भरा रहेगा उसका एक रूप और आकार होगा ही, तो कहती है ठीक है, हमें जिसको याद करना है, जो अरूप है, जो निराकार है, हम उसको भी रूप और आकार दे के याद कर लेंगे। माना कि जो परम सत्य है उसका कोई रूप नहीं हो सकता, उसका कोई आकार नहीं हो सकता, पर मैं करूँ क्या, मैं बेबस हूँ। मेरे मन में तो हमेशा रूप और आकार ही चलते रहते हैं।
और जो लोग ये दावा करते हैं कि निराकार, अरूप, फॉर्मलेस, नेमलेस की वो उपासना करते हैं, वो अपनेआप को धोखा ही देते हैं। क्योंकि जैसे ही तुम शब्द का प्रयोग करोगे, किसी भी शब्द का, तुम ये भी कहो ‘निराकार’, तो तुमने उसको एक आकार दे दिया। निराकार कहने में भी एक आकार है। जैसे ही तुम कहो कि वो हर जगह मौजूद है, वैसे ही तुमने उसको एक सीमा दे दी। क्योंकि हर जगह भी तुम्हारे लिए एक सीमित जगह ही है। तुम्हारे लिए हर जगह का मायना भी उतना ही है जितना तुम्हारे दिमाग़ में समा सकता है, मतलब सीमित है।








