भारत ज़्यादातर क्षेत्रों में इतना पीछे क्यों? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। मैं एक प्रशिक्षित आर्किटेक्ट (वास्तुकार) हूँ। मैंने क़रीब चार-पाँच साल तक प्रैक्टिस (अभ्यास) की है। जब से मैंने आपको सुनना शुरू किया, तो कुछ समय के बाद सस्टेनेबल आर्किटेक्चर (टिकाऊ वास्तुकला) में मैंने काम करना शुरू किया। जब मैंने ये काम किया तो लगने लगा कि कुछ चीज़ें हैं जिनमें कमी आ रही है।
उदाहरण के लिए, ख़ुद में एक्सिलेंस (उत्कृष्टता) की तरफ़ पुलक नज़र नहीं आ रही थी। मैंने थोड़ा अवलोकन किया और पाया कि मूलतः ये कमी सिर्फ़ मुझमें नहीं है। मैंने देखा आजू-बाजू, समाज में बचपन से ही ये सिखाया नहीं गया था और साथ में स्कूल-कॉलेज में भी इतना इस चीज़ पर ध्यान नहीं दिया गया था कि इसकी ओर जाना चाहिए।
फिर आगे देखा तो अपने साथी, दोस्त, सर्कल (मंडली) में भी ये (उत्कृष्टता) काफ़ी कम ही देख पाया। तुलना करने पर दिखता है कि इसका इंडिया में ही काफ़ी अभाव है। जो विकसित राष्ट्र हैं या कई और समाज हैं वहाँ पर काफ़ी हद तक देखा जाता है कि कोई भी क्षेत्र हो —साइंस हो, आर्ट्स हो — उसमें एक्सिलेन्स की ओर काफ़ी रुझान होता है।
तो ये समझ में नहीं आता है कि इतना क्यों वेरिएशन (अन्तर) है और एक्सिलेन्स की तरफ़ एक जो पुलक होनी चाहिए उसका हमारे समाज में अभाव क्यों है?
आचार्य प्रशांत: वर्ल्डली (सांसारिक) एक्सिलेन्स कह रहे हो न?






