प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जैसा कि आपने कल के सत्र में कहा था कि हमारे जो दुःख होते हैं वो हमारे चुनाव पर निर्भर करते हैं। हम जिस प्रकार का चुनाव करते हैं उसी प्रकार हमें दुःख प्राप्त होते हैं। लेकिन कुछ ऐसे इंसिडेंट्स (घटनाएँ) होते हैं, जहाँ पर चुनाव का कोई अधिकार हमें मिलता नहीं है। जैसे अफग़ानिस्तान का है कि वहाँ पर स्त्रियों को एक वस्तु की तरह देखा जाता है। वहाँ पर उन्हें पढ़ाई का कोई अधिकार नहीं है, बाहर वो नहीं जा सकतीं हैं बिना किसी पुरुष के, और उन्हें बाहर दफ़्तर में काम करने की भी इतनी छूट नहीं है। ना उन्हें कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, ना ही कानूनी अधिकार। उन्होंने इस दिशा में अपने चुनाव के अधिकार का प्रयोग कहाँ किया है? उन्हें मानसिक वेदना जो मिल रही है, उन्होंने कब इसमें चुनाव किया था? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: ये उदाहरण ले रही हैं अफग़ानिस्तान का, या इस तरह के और भी कुछ समाज हैं जहाँ महिलाओं को शिक्षा का, नौकरी का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। तो इस उदाहरण को लेकर ये पूछ रही हैं कि आप कहा करते हैं, मतलब मैं कहा करता हूँ कि हमें जो भी कष्ट होते हैं, बंधन होते हैं, उनमें हमारा चुनाव होता है, कहीं-न-कहीं हमारी सहमति होती है। तो पूछ रहीं हैं कि इसमें उन महिलाओं ने ऐसा क्या चुनाव करा है, उनकी क्या सहमति है?
दिख नहीं रहा क्या? ये सब नियम अगर पुरुष सत्ता ने बनाए हैं तो पुरुष सत्ता रात को कहाँ लौटकर आती है? कहाँ लौटकर आती है? उन पुरुषों को पैदा किसने किया है? क्यों पैदा किया? पैदा करना चुनाव है या नहीं है? ऐसे पुरुषों के साथ एक ही बिस्तर पर सोना चुनाव है या नहीं है? क्यों ऐसे पुरुषों को खाना बनाकर देते हो?
मैं बताता हूँ क्या चुनाव है। चुनाव ये है कि खाना बनाकर अगर दे देंगे तो थोड़ी बहुत तो सुख-सुविधा मिली रहेगी या कम-से-कम पीटे नहीं जाएँगे। खाना बनाकर नहीं देंगे, इनके साथ बिस्तर पर सोएँगे नहीं तो पीटे भी जाएँगे। तो ये चुनाव है कि नहीं है कि 'नहीं पिटना चाहती'?




