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बेबसी का रोना मत रोओ, अपने स्वार्थ तलाशो || महाभारत पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: गुरु द्रोण की स्थिति और विवशता को मैं अपने जीवन से जोड़कर देख रहा हूँ। वे जानते हैं कि सच क्या है, फिर भी व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति एवं अन्य लोभों के कारण कौरवों के साथ हैं। युद्ध के समय जब दुर्योधन बार-बार उन्हें जली-कटी सुनाकर उकसाता है तो वह अपने प्रयास में सफल भी हो जाता है। यह तब है जब द्रोणाचार्य को यह अवगत है कि वे ग़लत के साथ खड़े हैं।

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है। पिछले बारह सालों से नौकरी कर रहा हूँ, चार साल विवाह के भी हो गए। दिक़्क़त वहीं-की-वहीं है, बल्कि और बढ़ गई है। मन शांत नहीं रहता। क्यों कर रहा हूँ वह जो कर रहा हूँ?

नौकरी करता हूँ, धन कमाता हूँ, अपने-आपको बेचता हूँ और दूसरी तरफ़ सारे तथाकथित रिश्ते निभाता रहता हूँ। यही सब करते-करते एक दिन चला जाऊँगा। अध्यात्म की ओर हमेशा से रुचि रही है, और अब और बढ़ रही है। अध्यात्म की दिशा में जाने हेतु प्रयासरत हूँ। मगर ये रिश्तेदार मेरी जान खाए पड़े हैं, मेरी जन्मपत्री लेकर पंडितों को दिखा रहे हैं, कह रहे हैं कि यह लड़का हाथ से निकल रहा है।

क्या करूँ, बड़ी विकट परिस्थिति है। कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: नात-रिश्तेदारों को जो करना है, वो कर रहे हैं। तुम क्यों परेशान हो? ये तो सवाल रिश्तेदारों को करना चाहिए कि क्या करें, ख़तरा उनको अनुभव हो रहा है। तुम्हारी क्या परेशानी है, यह बताओ न।

तुम कह रहे हो कि तुम अध्यात्म की ओर बढ़ रहे हो, तो बढ़ते रहो। तुमने परेशानी का आविष्कार कैसे किया?

नात-रिश्तेदारों को डर यह है कि लड़का हाथ से निकल जाएगा, तो वो पंडितों के पास भाग रहे हैं जन्मपत्री लेकर। उनको परेशानी है कि कोई चीज़ उनके हाथ से निकल जाएगी। कोई चीज़ मेरे हाथ से निकल जाएगी, यह बात परेशानी की है। और साथ-ही-साथ फ़रमा रहे हैं कि ये ख़ुद भी परेशान हैं। तो निश्चित रूप से इनको भी लग रहा है कि कोई चीज़ हाथ से निकल जाएगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि रिश्तेदारों को लग रहा है कि तुम उनके हाथ से निकल जाओगे और तुम्हें लग रहा है कि रिश्तेदार तुम्हारे हाथ से निकल जाएँगे?

दोनों ही तरफ़ परेशानी है। एक तरफ़ परेशानी है तो जन्मपत्री, कुंडली बाँची जा रही है और दूसरी तरफ़ परेशानी है तो आचार्य जी से सवाल पूछे जा रहे हैं।

(श्रोतागण हँसते हैं)

पर परेशानी दोनों की एक है। दोनों को भय एक ही लग रहा है, क्या? कि हाथ से कुछ छूट ना जाए।

तो यह तो तुमने मुझे बड़ी सरलता से और बड़ी बेबाकी से बताया कि रिश्तेदारों को क्या डर है। याद रखना, बिना डर के परेशानी नहीं हो सकती। रिश्तेदार परेशान हैं, तुमने उनका डर उद्घाटित कर दिया। उनको यह डर है कि लड़का कहीं हाथ से ना निकल जाए। तुम भी परेशान हो, अपना डर तो बताओ। वह छुपाए बैठे हो।

तुम्हारी क्या आसक्ति है? तुम किससे चिपके हुए हो? तुम किसको छोड़ने से डर रहे हो? ये सब डर ना हो तो कोई परेशान क्यों होगा?

अध्यात्म की ओर रुचि है, बढ़ते रहो, भाई। अध्यात्म की ओर बढ़ना माने क्या करना? कोई पहाड़ तोड़ना है? किसी की जान लेनी है? कोई विशेष कार्य तो नहीं है अध्यात्म। जैसा जो जीवन जी रहा हो, उस जीवन की ओर जागृत दृष्टि रखना ही अध्यात्म है। इसमें परेशानी की क्या बात है?

निश्चित रूप से तुम्हें यह लग रहा है कि अगर जीवन को सहज, सतर्क, जागृत आँखों से देखा तो कुछ छूटेगा। क्या छोड़ने से घबरा रहे हो? क्या है इतना कीमती कि तुम्हें सत्य भी उसके सामने फीका और कमज़ोर लग रहा है?

अध्यात्म की राह पर चलने का तो मतलब होता है सत्य की ओर बढ़ना। जो सत्य की ओर बढ़ रहा है, वह तो कह रहा है कि, "मुझे कुछ बहुत भारी और कीमती मिलने जा रहा है", और दूसरी और वह परेशान भी हो रहा है, अर्थात् उसको लग रहा है कि कुछ बहुत भारी और कीमती छूट भी रहा है। ऐसा क्या है तुम्हारे पास जो सत्य की तुलना में भारी और कीमती हो गया भाई?

अन्यथा जिसे सत्य मिल रहा हो, वह तो कहेगा कि, "मुझे छोटी-मोटी चीज़ें छूटने का अब कोई अफ़सोस नहीं, कोई परेशानी नहीं। सत्य की राहों में दो-चार पैसे की चीज़ें छूटती हों तो छूटती रहें, क्या सोचना!" तुम्हारी यह व्यग्रता है क्यों? ज़रा ग़ौर करो।

प्र२: आचार्य जी, शत-शत नमन। गुरु द्रोणाचार्य को देखकर अपनी दयनीय स्थिति एक बार फिर दिखी। द्रोण को पता था कि वे ग़लत तरफ़ हैं और पराक्रम में किसी से कम नहीं, फिर भी वे फँसे हुए थे।

इसी तरीके से ना चाहते हुए भी मैं बार-बार सांसारिक खेल मैं फँस जाता हूँ। कल आपको सुना, गहरी शांति की अनुभूति हुई। फिर आज दिन भर दोबारा वही सुना, लेकिन आज घर वालों ने चिल्लाना शुरू कर दिया और मुझे बेबस करने लगे। बोलते हैं कि सारे सांसारिक कर्म करो, बोले कि शॉपिंग करो, जिमिंग करो और शेविंग करो।

मैं तो पानी पीने को और अमृत पीने को ही तत्पर हूँ, पर मुझे बार-बार विष पीना पड़ रहा है ज़बरदस्ती। ये किन कर्मों का सांसारिक दबाव मेरे ऊपर आ गया है? कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य: क्या मार्गदर्शन करूँ? कैसे आदमी हो कि कोई धक्का मारता है तो शेविंग करते हो? किसी असली दाढ़ी वाले के पास जाओ, उसकी दाढ़ी का एक बाल नोचकर दिखा दो। कैसे तुम्हें किसी ने विवश कर दिया दाढ़ी मुंडने को?

बात समझो। ये मैं हमेशा पूछा करता हूँ - किसी ने कहा तो कहा, तुमने सुना क्यों? जिसे जो कहना था, उसने वह कहा, कहने का उसका हक़ है। तुमने सुना क्यों?

तुम कह रहे हो कि तुम्हारे ऊपर दबाव बनाया गया। कैसा दबाव बनाया गया? दो-चार लोग चढ़कर बैठ गए तुम्हारे ऊपर? तुम्हें जंज़ीर से बाँध दिया, गले में पट्टा डाल दिया? किस प्रकार का दबाव बनाया गया? मुझे बताओ तुम।

और तमाम लोग हैं, करोड़ों लोग हैं जो इसी शिकायत में फँसे हुए हैं कि, "हमारे ऊपर दबाव डालकर हमसे काम करा दिए जाते हैं!" कैसे दबाव डाला जाता है, मैं जानना चाहता हूँ। गला दबाया जाता है? गले पर दबाव पड़ा? हाथ पर दबाव पड़ा? कहाँ पड़ा, कैसे पड़ा, बताओ।

तुम्हारे पाँव में बेड़ियाँ डाल दी गईं हों, इस कारण तुम कहीं को जा ना पा रहे हो तो मैं समझूँ, कुछ रास्ता भी सुझाऊँ, किसी को कुल्हाड़ी लेकर भेजूँ, पुलिस इत्यादि में इत्तला करूँ। तुम्हारे शरीर पर तो कोई दबाव पड़ा नहीं। यह कौन-सा दबाव है जो तुम्हारे मन पर दबाव पड़ रहा है? क्यों पड़ रहा है?

मैं अभी बात कर रहा हूँ और तमाम तरह के प्राणी तमाम तरह की आवाज़ें कर रहे हैं। उधर दूर सड़क पर कोई गाड़ी जा रही है, उसके हॉर्न की आवाज़ आयी अभी, उधर अभी कुत्ता भौंक रहा था, पीछे झींगुर है। कभी-कभार किसी आदमी की भी आवाज़ आ जाती है इधर-उधर कहीं से बहती हुई हवा में। तो?

उन्होंने कहा तो कहा, मैं सुनूँ क्यों? बोलो!

और तुम सब लोग यहाँ बैठे हुए हो, झींगुरों पर किस-किसका ध्यान है? ये इतने झींगुर बोल रहे हैं। बोलो, हाथ खड़ा करो, किस-किसका ध्यान है झींगुरों पर? उन्होंने कहा तो कहा—ये देखो।

(कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आती है)

हम सुने क्यों?

ये लो, उनके पास भी अपनी समस्याएँ हैं। वो भी कहीं दबाव बना रहे होंगे। हम दबाव में आएँ क्यों?

यह बड़ी अजीब बात है कि, "मैं मजबूर हो जाता हूँ, मैं बेबस हूँ!" अरे! तुम कैसे बेबस हो? तुम्हारा हाथ पकड़कर ज़बरदस्ती दाढ़ी नोंचवा दी किसी ने? कैसे बेबस हो?

बेबस तो सिर्फ़ वह होता है जिसके पास स्वार्थ होते हैं। अपनी बेबसी की बात बाद में करना, पहले अपने स्वार्थ की बात करो। स्वार्थ क्या है तुम्हारा? कोई तुम्हें मजबूर नहीं कर सकता जब तुम्हारे मन में उसके प्रति कोई स्वार्थ ना हो। जिससे तुम कुछ पाना नहीं चाहते, वह तुम्हारा मालिक नहीं बन सकता। और अगर कोई तुम्हारे ऊपर मालिक बनकर बैठ गया है तो बात सीधी है – तुम उससे कुछ पाना चाहते हो, इसीलिए तुम उससे दबते हो। जिसको किसी से कुछ नहीं चाहिए, वह किसी से दबेगा क्यों?

तुम मुझे बताओ कि तुम क्यों इतना चाहते हो दूसरों से? मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम इतना क्यों चाहते हो दूसरों 'को'; मैं कह रहा हूँ कि तुम क्यों चाहते हो इतना दूसरों 'से'।

जो दूसरों से बहुत कुछ चाहेगा, वह तो बेचारा दब्बू ही रहेगा कि, "अगर कहीं मैंने ख़िलाफ़त कर दी, मुख़ालिफ़त कर दी, विरोध में बोल दिया तो आका नाराज़ ना हो जाएँ। और आक़ा नाराज़ हो गए तो इनसे जो मुझे मिलना था, वह मिलेगा नहीं!"

जिसको किसी से कुछ नहीं चाहिए, वह तो फिर शाहों का शाह हो जाता है। कौन याद आया? कबीर साहब याद आए?

"जिनको कुछ न चाहिए, वो शाहन के शाह।"

और अगर तुम शाहों के शाह नहीं हो, तुम्हारी हालत बंधक जैसी, ग़ुलाम जैसी है, तो एक बात पक्की समझ लेना कि तुम्हारी दूसरों को ले करके बड़ी स्पृहा है, बड़ी कामना है; एषणाओं से घिरे हुए हो। अब बताओ ग़लती किसकी है, उनकी, या तुम्हारी?

तुमने यह तो बता दिया कि वो तुम्हारा गला पकड़ते हैं, तुम यह नहीं बता रहे हो कि तुम उनकी जेब काटने की तैयारी में हो। जिसको लेकर लालच रहता है, आदमी उसके सामने तो घुटने टेक ही देगा न?

देखो कि तुम्हारे लालच कहाँ पर हैं। अपनी ज़िंदगी को देखो, अपने मन को टटोलो। जहाँ-जहाँ लालच को पाओ, उसको तिरोहित करो।

जैसे-जैसे लालच तुम्हारी ज़िंदगी से विदा होगा, वैसे-वैसे तुम्हारे बंधन खुलते जाएँगे, तुम्हारा भय टूटता जाएगा।

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