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बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे || (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मेरी उम्र अड़तीस वर्ष है और मेरे दो बच्चे हैं और उनके लिए मैं अच्छी माँ बनने की भरपूर कोशिश करती हूँ। परसों मेरे बच्चों ने टीवी पर देखा कि एक मुख्यमंत्री साहब एक बच्चे को सम्मानित कर रहे थे जिसने गाना गाया हुआ है "बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे!" तो उसके बाद से मेरा छोटा बेटा, जो छः साल का है, वो वही गाना गाये जा रहा है घर में। तो इससे मन बहुत उखड़ा हुआ सा है।

आचार्य प्रशांत: देखिए दो बातें हमें समझनी होंगी। बाल-मनोविज्ञान क्या क्या कहता है? बचपन के जो आरंभिक वर्ष होते हैं, सात साल, दस साल, उसमें बच्चे के ऊपर जिस तरह के प्रभाव पड़ गए वो उसकी ज़िन्दगी बना देते हैं या बिगाड़ देते हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि जवानी में लोग आकर बिगड़ जाते हैं। नहीं, बिगड़ने का सबसे पहला काम बचपन में हो जाता है, वो भी सात-आठ साल, दस साल की उम्र से पहले ही।

तो छोटे बच्चों तक अगर भद्दे किस्म के, फूहड़ किस्म के, वयस्क किस्म के एडल्ट गाने पहुँच रहे हैं तो वो बच्चे ज़िंदगी भर के लिए मानसिक तौर पर विकृत हो जाते हैं। आपको जो खिन्नता हो रही है, जो परेशानी हो रही है वो जायज़ है। वो ग़लत नहीं है।

अध्यात्म क्या कहता है इस बारे में? भगवद्गीता का दूसरा अध्याय है, उसमें श्रीकृष्ण कुछ बड़ी रोचक बातें कहते हैं अर्जुन से, कि, "अर्जुन यश, कीर्ति, प्रसिद्धि ये हल्की चीज़ें नहीं हैं।" अर्जुन से कहते हैं — "ऐसा कुछ काम मत कर देना जिससे तुम्हें अपयश मिले, जिससे समाज के लोगों में तुम्हारा नाम खराब हो।"

क्यों कहते हैं ऐसा?

समझाते हैं अर्जुन को, कहते हैं, "क्योंकि जिस समाज में जिन लोगों को प्रसिद्धि मिल गई, वो समाज वैसा ही हो जाता है और जो लोग महत्वपूर्ण होते हैं, जो लोग प्रसिद्धिवान हो गए या ताक़तवर हो गए, समाज के बाकी लोग उन्हीं के जैसा काम करना शुरू कर देते हैं। उन्हीं का अनुकरण करते हैं।"

तो किसी समाज को अगर तुमको खराब करना है तो उसमें सबसे अच्छा तरीका ये है कि उसमें गलत किस्म के लोगों को प्रसिद्ध कर दो। किसी समाज को, किसी समुदाय को, किसी देश को, किसी धर्म को तबाह करने का ये सबसे अच्छा तरीका है कि उसमें ऐसे लोगों को तुम प्रसिद्ध कर दो, पॉपुलर कर दो जिनमें कोई क़ाबिलियत नहीं है कोई श्रेष्ठता नहीं है। तो हम थोड़ा सा देखेंगे कि इसमें भारत में आजकल किस तरह के लोग हैं जो प्रसिद्ध हो रहे हैं, ख़ासतौर पर मिडिया उनको प्रसिद्ध किए दे रहा है।

आपने ये बात करी न कि टीवी पर आपके बच्चों ने देखा कि वो एक बच्चा है, वो गाना गा रहा है और उसको वो मुख्यमंत्री सम्मानित कर रहे हैं। और उसे मुख्यमंत्री ने ही नहीं उसको तमाम और लोगों ने भी बहुत प्रोत्साहित किया है।

मैं आपसे अगर अभी पूछूँ, कि, "आपने खेल में क्या जाना है कि मार्टिना हिंगिस ने बारह साल की उम्र में क्या जीत लिया था?" तो आपको नहीं पता होगा, जबकि बारह साल की उम्र में वो एक चैम्पियन बन चुकी थीं। मैं आपसे पूछूँ कि, "टाइगर वुड्स ने दस साल की उम्र में ही क्या हासिल कर लिया था?" तो ये भी आपको शायद नहीं पता होगा। मैं आपसे मिशेल वाइ के बारे में पूछूँ या फु मिंग्जिया के बारे में पूछूँ तो शायद आपने इनके नाम भी ना सुने हो। आपने शायद सुने भी हों तो भी ज़्यादातर लोगों ने नहीं सुने होंगे।

ऐसे बच्चों को - और ये बच्चे ही थे, दस साल के, बारह साल के ये बच्चे ही थे, जब इन्होंने बहुत कुछ हासिल कर लिया - ऐसे बच्चों को हम प्रसिद्धि देते ही नहीं। अभी तो मैंने फिर भी ऐसे नाम बोले जो कुछ लोग जानते होंगे। भाई टाइगर वुड्स बड़ा नाम है, मार्टिना हिंगिस का भी नाम कुछ लोगों को पता होता है।

मैं आपसे कहने लगूँ कि, "साहित्य के क्षेत्र में और कविता के क्षेत्र में आपको लोपे डे वेगा का नाम पता है क्या?" आपको नहीं पता होगा। मैं आपसे पूछूँ, "आपको मैटी स्टैपनिक का नाम पता है क्या?" आपको नहीं पता होगा। और मैटी बड़ा अद्भुत बच्चा था। तेरह वर्ष की उम्र में ही उसको बहुत दुर्लभ बीमारी हुई थी जिससे उसकी मौत हो गई पर उससे पहले वो अपनी आधा दर्जन किताबें छाप चुका था।

क्या इस बच्चे को हमारा मिडिया प्रसिद्धि दे रहा है?

तेरह की आयु से पहले वो छह अपनी किताबें छाप चुका था और वो जगह-जगह जाकर के लेक्चर दिया करता था, क्या उसे हमारा मिडिया प्रसिद्धि देगा? नहीं, हमारा मिडिया उसे नहीं प्रसिद्धि देगा। हमारा मिडिया किस तरह के बच्चों को प्रसिद्धि दे रहा है वो हमारे सामने है।

आप कहेंगे मैंने अभी विदेशी नाम ले लिए। चलिए मैं कुछ देशी नाम ले लेता हूँ। अध्यात्म के क्षेत्र से क्या हमारा जो मिडिया है वो अष्टावक्र को, जो कि छोटी उम्र में ही राजा के समाने खड़ा होकर के बहुत बड़ा काम करा था या सत्यकाम जाबाल को, या श्वेतकेतु को, या नचिकेता को, या ध्रुव को प्रसिद्धि दे रहा है?

इनकी कोई बातें हमें सुनने को मिलती हैं कि ये बच्चे कैसे हैं? और कृष्ण की बात याद रखिएगा — जिसको प्रसिद्धि मिलती है एक समाज में वो पूरा समाज वैसा ही हो जाता है। एक समाज में जो प्रसिद्ध कर दिया गया वो समाज पूरा-का-पूरा वैसा ही हो जाएगा।

आप अगर आइटम नंबर गाने वालों को प्रसिद्ध कर देंगे तो पूरा समाज एक भद्दा आइटम नंबर बनकर रह जाएगा। क्रांतिकारियों के क्षेत्र में, स्वतंत्रता आंदोलन में, मैं आपसे पूछूँ कि जो बहुत कम उम्र के सेनानी थे उनके नाम आपको कुछ पता हैं? मैं आपसे पूछूँ खुदीराम बोस बताइए, विनय बोस का कुछ बताइए, बादल गुप्ता का बताइए वृत्तांत, आपको कुछ नहीं पता होगा। मैं आपसे शांति बोस के बारे में पूछूँ, मैं आपसे कनकलता बलुआ के बारे में पूछूँ, मैं आपसे प्रीतिलता बादेदर के बारे में पूछूँ, क्या आप बता पाएँगे?

मिडिया ने ये नाम आप तक पहुँचाए ही नहीं, आपको पता कैसे होगा कुछ भी लेकिन देखिए कि मिडिया किस तरह के लोगों को प्रसिद्ध कर रही है। और वो बच्चा छोटा है, वो बच्चा कुछ नहीं जानता। मैं बच्चे पर कोई दोष नहीं लगा रहा। उस बच्चे का तो अभी विवेक जागृत ही नहीं हुआ। उसकी उम्र इतनी कम है, लेकिन बच्चे के भी जिन कामों को आप प्रोत्साहन देंगे बच्चा उन्हीं कामों की ओर बढ़ता जाएगा और एक बच्चा उन कामों की ओर बढ़ेगा उसके पीछे-पीछे सौ बच्चे वैसे ही काम करेंगे। और यही बच्चे समाज बन जाने हैं और देश बन जाने हैं।

अब सवाल उठता है कि मिडिया में ये लोग क्यों नहीं आ रहे हैं जिनके मैंने अभी नाम लिए? क्योंकि बुराई हमेशा ज़्यादा आसान होती है फैलानी अच्छाई की अपेक्षा।

अब कौन उन बच्चों का नाम ले जिन्होंने दस साल की उम्र में बड़े-बड़े टूर्नामेंट जीत लिए, जो विम्बलडन जूनियर जीता है, उसकी कौन बात करे? क्योंकि उनकी बात करोगे तो ये भी याद रखना होगा कि आज का दिन जब ख़त्म हो रहा है तो चीन ओलम्पिक में पचास मैडल लेकर के बैठा हुआ है और भारत का एक मैडल है।

जब भारत में ऐसे बच्चों की बात ही नहीं होनी है जो खेलों के क्षेत्र में आठ-दस-बारह साल की उम्र में ही झंडा गाड़ आए तो फिर इसमें ताज़्जुब क्या है कि चीन के पचास पदक हैं और भारत का एक पदक है? क्योंकि भारत को तो इसी में बहुत खुशी है कि बसपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे! उसमें ओलम्पिक तो कहीं आता ही नहीं न, उसमें विज्ञान तो कहीं आता नहीं, उसमें गणित तो कहीं आता नहीं, उसमें कलाओं में निपुणता हासिल करना तो कहीं आता नहीं।

और ओलम्पिक की बात हो रही है तो याद कर लीजिए कि इन्हीं ओलम्पिक में ब्राज़ील की एक तेरह साल की लड़की रायसा लियाल को रजत पदक मिला है और भारत में तो प्रतिभा के नाम पर बस यही — सोनू मेरी डार्लिंग!

और ये कोई प्रतिभा नहीं है, फ़िल्मी गाने गुनगुनाना प्रतिभा नहीं कहलाता। ये मत कह दीजिएगा कि ये सब प्रतिभा की चीज़ें हैं; इसमें कोई प्रतिभा नहीं है। आपके टैलेंट शोज में जो कुछ हो रहा होता है वो टैलेंट नहीं है। अश्लीलता, बेहुदापन, भोंदापन, ये टैलेंट कब से होने लग गए भाई?

टीवी पर टैलेंट शोज के नाम पर जो लोग आते थे वहाँ पर जज वगैरह बनकर के वो आधे तो पोर्नोग्राफी के मामलों में फँसे हुए हैं और ऐसे जजेस को माँ-बाप बच्चों से कहते थे कि इनको गुरु मानो और जाकर इनके पाँव छुओ। टीवी में अक्सर आप देखते होंगे बच्चों को माँ-बाप बताते हैं कि ये सब जो जज साहब बैठे हैं सामने, इनके पाँव छुओ। और जज साहब का चरित्र कैसा है, जज साहब के मन में सफाई कितनी है, ऊँचाई कितनी है इससे माँ-बाप को कुछ मतलब नहीं। ये ऐसा ही है जैसे माँ-बाप बच्चे को उंगली पकड़ कर के खुद क़त्लखाने ले जा रहे हों। तो बहुत अजीब और विकृत समाज और देश हो गया है हमारा, जिसमें बहुत गलत लोगों को हम मान्यता और प्रसिद्धि दे देते हैं।

कैसे दे देते हैं?

वो बात समझनी पड़ेगी। देखिए जो लोग आज आपके सामने इंटरनेट के माध्यम से प्रसिद्ध होकर के आ रहे हैं ये प्रसिद्ध हैं नहीं। इन्हें प्रसिद्ध करवाया जा रहा है, वर्ना आप उस एप्प पर क्यों जाएँगे? आप क्यों जाएँगे किसी एप्प पर अगर उसके लाखों सब्सक्राइबर नही हैं या किसी एप्प पर जहाँ कोई वायरल सामग्री नहीं है, वहाँ आप जाएँगे क्यों?

तो कंटेंट को ज़बरदस्ती प्रसिद्ध करवाया जाता है, वो एप्प के हाथ में है। भाई सबको रिकमेंडेशन में दिखा दो, वो बढ़ जाएगा। आपको थोड़े-ही पता है कि किसी के व्यूज , लाइक्स , सब्सक्राइबर्स कैसे बढ़ रहे हैं। आपको पता है क्या? वो जो कंटेंड-क्रिएटर है और जो एप्प होती है उनकी बीच की साँठ-गाँठ है क्योंकि आप एप्प पर एप्प के लिए नहीं जाते, आप एप्प पर उस कंटेंट क्रिएटर के लिए जाते हो। उस कंटेंट क्रिएटर के लिए आप तभी जाओगे जब उस कंटेंट क्रिएटर को प्रसिद्ध करवाया जाएगा। तो उस कंटेंड क्रिएटर को ज़बरदस्ती प्रसिद्ध करवाया जाता है और किसको प्रसिद्ध करवाया जाता है? हमेशा जो सबसे भद्दा कंटेंट दे रहा हो। क्यों? क्योंकि भद्दी चीज़ को ही प्रसिद्ध कराना ज़्यादा आसान होता है।

और हम साथ में अगर कृष्ण की बात को याद रखें तो जो प्रसिद्ध हो गया वो समाज को अपने जैसा ही बना देगा; जिस समाज में जो प्रसिद्ध हो गया वो समाज को अपने ही जैसा बना देता है। तो ये जो बहुत सारी सोशल मीडिया ऍप्स हैं, इसमें मुख्यधारा की मीडिया भी है, ये अपने रोज़ी-रोटी के मुनाफ़े के लिए ऐसे घटिया लोगों को प्रसिद्ध करे दे रहा है जो पूरे देश को, पूरे समाज को ले डूबेंगे।

और जब मैं इसकी बात कर रहा हूँ तो मैं फिर कह रहा हूँ — मुझे उस बच्चे से कोई तकलीफ नहीं है। वो बच्चा अभी बहुत छोटा है, वो शूटिंग भी उसने खुद नहीं करी थी। पढ़ने में आया है कि उसके टीचर ने उसको बोला था कि तुम ये गाओ। तो टीचर तो आजकल इस तरह के हैं कि ये गवा रहे हैं। तो टीचर ने उससे कहा था गाओ और रिकार्डिंग भी किसी और ने करी होगी, इंटरनेट पर भी किसी और ने डाला होगा तो इसमें इस बच्चे का कोई दोष नहीं है‌। ये सारी बातें उस बच्चे के लिए नहीं बोली जा रही हैं। ये सारी बातें उनके लिए बोली जा रही हैं जो इसमें चतुराई और कुटिलता से अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं।

आपको समझ में आ रही है बात ये?

मैं बात पूरे देश की कर रहा हूँ। देश से याद आता है इज़राइल; इज़राइल की किशोर लड़कियाँ वहाँ फ़ौज में जाती हैं। ये नियम है कि उन्हें जाना होगा और हजारों लड़कियाँ वीरगति को प्राप्त हो चुकी हैं, शहीद हो चुकी हैं, दुश्मनों से लड़ते-लड़ते रणभूमि पर और क्या उम्र थी उनकी? अट्ठारह साल, सत्रह साल, बीस साल, इस उम्र की लड़कियाँ। और मेरे देश की लड़कियाँ क्या कर रही हैं? वो टिक-टॉक पर और इंस्टाग्राम पर कुल्हे मटका रही हैं।

कुछ दिन पहले मुझे किसी ने एक तस्वीर भेजी जिसमें इज़राइल की बच्चियाँ खड़ी हुई हैं और वो बहुत कम उम्र की ही दिख रही हैं, टीनएजर्स हैं और उनके कंधों पर बंदूकें हैं और उनकी कद-काठी एकदम मजबूत है और उसके बगल में उन्होंने हमारी देशी कन्याओं की फोटो लगाई है, अर्धनग्न। मैं नहीं कह रहा कि हमारी सारी लड़कियाँ ऐसी हो गई हैं पर बहुत सारी ऐसी हो गई हैं और ये हमारी देशी अर्धनग्न लड़कियाँ क्या कर रही हैं? वीडियो बना रही हैं, टिक-टॉक बना रही हैं, इनका ये चल रहा है, क्यों चल रहा है? क्योंकि उनको पता हो गया है कि वो ऐसा करेंगी तो वो प्रसिद्ध हो जाएँगी।

बीस-तीस साल पहले तक ये चीज़ इतनी ज़्यादा नहीं थी, अब ये कैसे हो गई? अब ये इसलिए हो गई क्योंकि ये जितनी भी सोशल-मीडिया ऍप्स वगैरह आई हैं ये इसी तरह के कंटेंट को और ज़्यादा प्रोत्साहित करती हैं, आगे बढ़ाती हैं।

तो जब हमारे बच्चे देखते हैं कि यही कर-कर के हम प्रसिद्ध हो जाएँगे तो ये वही चीज़ें और ज़्यादा करते हैं। उदाहरण के लिए अब बच्चों ने देख लिया न कि मैं इस तरह का गाना गाऊँ, एडल्ट सॉन्ग्स , सोनु मेरी डार्लिंग, ये करके, तो उससे आपको बड़ी प्रसिद्धि मिलती है और खुद मुख्यमंत्री आकर के आपके गले में माला डालते हैं तो हज़ारों-लाखों दूसरे बच्चे अब खुद एडल्ट सॉन्ग्स पर अपना वीडियो बनाएँगे और ये उम्मीद करेंगे कि उनको भी प्रसिद्धि मिल जाएगी। अरे, बच्चों को छोड़िए उनके माँ-बाप खुद उनसे यही काम करवाएँगे कि, "देखो भाई हमारा चुन्नू है, हमारा चुन्नू भी तो किसी गाने पर नाच सकता है न।"

अभी मैंने ट्विटर पर देखा, एक साहब ने खुद अपनी बेटी का वीडियो बनाकर डाल रखा था। वो पाँच साल की है और कह रहे हैं — देखिए मेरी बेटी के पास कितना टैलेंट है। एक तो टैलेंट शब्द को बर्बाद करके रख दिया है। कह रहे हैं, "कितना टैलेंट है, आप लोग इसको आगे फारवर्ड , रिट्वीट करिए।" और बच्ची उसमें क्या गा रही है? कि मैं चिकनी चमेली हूँ, मैं बटर चिकन हूँ, आ जा, आकर मुझे खा जा। कुछ इस तरीके की चीज़ें वो पाँच साल की बच्ची से करवा रहा है, उसका बाप करवा रहा है। क्यों? क्योंकि इन्हीं चीज़ों को प्रसिद्धि मिल जानी है। प्रसिद्धि क्यों मिल जानी है? क्योंकि कुछ लोग बैठे हैं प्रसिद्धि दिलवाने के लिए।

मैं आपको — फिर दोहरा रहा हूँ, ये आपके सामने जो लोग इंफ्लूनसर या सेलेब्रिटीज़ बनकर आए हैं ये प्रसिद्ध हुए नहीं हैं, इन्हें प्रसिद्ध किया गया है जैसे कुछ लोगों को ड्रग एडिक्ट बनाया गया हो।

कोई ड्रग एडिक्ट स्वयं नहीं बनता, कोई-न-कोई उसको ड्रग्स की लत लगवाता है, उसी तरीके से इस पूरे देश, इस पूरे समाज को घटिया कंटेंट की लत लगवाई जा रही है और ये बहुत बड़ी साज़िश है।

श्रीकृष्ण को फिर से याद करिए, जिस देश में जो लोग प्रसिद्ध हो गए वो देश पूरा उसी तरह का हो जाएगा। अब ना तो वो आतंकवादियों का सफ़ाया कर पाएगा इज़राइल की लड़कियों की तरह, ना वो ओलम्पिक में जाकर के पदक जीत पाएगा चीनियों की तरह, ना वो जाकर के नोबल प्राइज़ जीत पाएगा रूसियों और अमेरिकियों की तरह, वो सिर्फ क्या करेगा? वो यही करेगा — सोनू मेरी डार्लिंग! पूरा एक देश यही कर रहा होगा। (व्यंग करते हुए) स्वागत है आपका नए हिन्दुस्तान में!

और मैं अनुरोध करता हूँ उन मुख्यमंत्री साहब से, उन नौकरशाहों से, उन नागरिकों से और उन सेलेब्रिटीज़ से जो इस किस्म की हरकतों को बढ़ावा दे रहे हैं — याद करिए कि आपका देश और समाज के प्रति कर्त्तव्य क्या है, आपको फूल माला पहनानी ही है अगर किसी बच्चे के गले में तो आपको पता होना चाहिए कि कौन बच्चा अधिकारी है, हक़दार है कि उसके गले में फूल मालाएँ डाली जाएँ। आप जिनको आगे बढ़ा रहे हैं, वो पूरे समाज के लिए रोल मॉडल बन रहे हैं, पूरा समाज उन्हीं के जैसा हो जाएगा। तो आप चाहे राजनेता हों, चाहे आप मिडिया से संबंधित कोई हों, सोच-समझकर के किसी को प्रसिद्धि दिलाइए।

ग़लत लोगों को प्रसिद्ध करना, ग़लत हरकतों को प्रसिद्ध करना माने पूरे देश का बंटाधार करना।

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