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बच्चा कौन? बूढ़ा कौन? ब्रह्मचर्य क्या?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: आचार्य जी, नचिकेता बिलकुल निडर होकर ब्रह्म के पास चले जाते हैं और कबीर जी के 'आई गँवनवा की सारी' के भजन का पात्र रो-रोकर जाता है। तो क्या ऐसा होता है कि बाल्यपन में आसान होता है, और समय बीतने पर स्वयं जाना मुश्किल है, या फ़िर घसीटना पड़ता है?

आचार्य प्रशांत: देवेश (प्रश्नकर्ता) कह रहे हैं कि, “नचिकेता एकदम निडर होकर यम के पास चला जाता है और कबीर के 'गँवनवा की सारी' भजन का पात्र रो-रोकर जाता है। तो क्या ऐसा है कि बालपन में आसान होता है और समय बीतने पर स्वयं जाना मुश्किल है, या फ़िर घसीटना पड़ता है?”

हाँ ठीक कहा आपने, बालपन में आसान होता है सच्चाई की तरफ़ जाना, और जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, परतें चढ़ती जाती हैं, ज़रा कठिन होता जाता है। लेकिन बालपन का आध्यात्मिक अर्थों में आशय दैहिक उम्र से नहीं है, ये संयोग ही है कि नचिकेता शरीर से भी बालक हैं और मन से भी। आसान उनके लिए नहीं जो शरीर से बालक हैं, आसान उनके लिए है जो मन से बालक हैं।

मन से बालक होने का अर्थ क्या है? बच्चा बच्चा तब कहलाता है जब माँ से बहुत दूर ना गया हो। जब तक उसकी माँ से बहुत दूरी बनी नहीं, तब तक वो बालक है। और जैसे-जैसे माँ से, गर्भ से, अपने उद्गम स्रोत से, अपने होने से पहले की सच्चाई से उसकी दूरी बढ़ती जाती है वो फ़िर वयस्क कहलाता है। वो जवान होगा, प्रौढ़ होगा, बूढ़ा होगा।

माँ कौन है समझ लेंगे तो समझ जाएँगे बच्चा किसको कह रहे हैं। माँ बच्चे की वो सच्चाई है जो उसके होने से पहले की है। बच्चा अचानक ही तो कहीं से नहीं आ जाता, वो माँ में सदा से मौजूद था। पर जब वो माँ में मौजूद था तब उसे अपना ज्ञान नहीं था, अपनी चेतना नहीं थी, उसका अपना कोई वजूद, कोई पृथक अस्तित्व नहीं था। जब तक वो माँ में था, वो था तो सही पर माँ में समाहित। हस्ती उसकी थी तब भी, पर व्यक्तिगत हस्ती नहीं थी। माँ से अलग, टूटी हुई उसकी कोई पहचान नहीं थी, जुदा नहीं हुआ था।

माँ से अलग होने की निशानी क्या है, कि अब उसे इस बात से कम, और कम, और कम मतलब रह जाएगा कि, “जिस पहचान को मैं अभी धारण किए हुए हूँ उससे पहले की, उससे ज़्यादा बड़ी मेरी पहचान क्या है।” वयस्क की यही तो बात है, उसकी यही तो निशानी है, वो अपनी पहचान में अब स्थापित हो गया है, अब उसके पास ज्ञान आ गया है। संसार में बीस–चालीस-पचास-साल जी चुका तो तमाम अनुभव आ गए हैं, रिश्ते-नाते आ गए हैं। वो अपनी पहचान पर काबिज़ हो गया है। उसको नाम का पता है अपने, धर्म का पता है, जात-पात का पता है, अपने उद्देश्यों का पता है और वो इनमें अब पूरे तरीक़े से सराबोर है। पूरा विश्वास है उसे अपनी इन पहचानों पर, अपने तमाम नामों पर। इन नामों से अलग भी वो कुछ है, इसको वो भूल गया। ये अब कहलाएगा वयस्क, प्रौढ़।

वयस्क होने का मतलब है अपनी पहचान में, अपनी व्यक्तिगत पहचान में डूब ही जाना, खो ही जाना। बच्चा वो जो अपनी व्यक्तिगत पहचान में खोया नहीं, उसे अभी याद आ रही है, उसका अभी रिश्ता बाकी है, उसे अभी उससे ताल्लुक़ है जो वो शरीर धारण करने से पूर्व था।

माँ कौन है? बच्चे का ही दूसरा नाम माँ है न? जब तक जन्म नहीं हुआ तब तक माँ और बच्चा एक हैं, जब जन्म हो गया तो बच्चा कहने लग जाता है कि अब मेरी एक आज़ाद, स्वतंत्र हस्ती है।

तो सत्य की प्राप्ति उनके लिए ज़रा सहज-सुलभ है जो अपनी दुनिया में बहुत पक्के नहीं हुए हैं, जो अभी जमकर नहीं बैठ गए, जिनको अपने से पहले वाले की याद ज़रा बाकी है, वो उसके पास बार-बार दौड़ के जाते हैं। वो बच्चे कहलाते हैं।

रामकृष्ण बिलकुल बच्चे हैं, संसार उन्हें खींच ही नहीं पाता। चार पल को खींचता है फ़िर वो पलट के आते हैं, माँ, माँ, माँ करके लिपट जाते हैं, जैसे छोटा बच्चा। रामकृष्ण के शरीर की आयु तो बहुत हुई पर उनको बिलकुल बच्चा जानो, क्योंकि उनका माँ से संबंध है। संसार की रोशनियाँ, खूबियाँ, आकर्षण, चालाकियाँ उन्हें नहीं लुभाती। माँ में कुछ है नहीं, माँ माने कि संसार अभी शुरू ही नहीं हुआ। माँ की गोद जैसे एक शांत, नीरव, अंधेरी गुफ़ा, गर्भ समान।

गर्भ में संसार कहाँ, गर्भ में तो मात्र नींद है, चैन, आराम। ना रोशनी है, ना ध्वनि है, ना संवेग है, ना चेतना है, करने को भी कुछ नहीं, ना अतीत ना भविष्य, ना अच्छा ना बुरा। बस होना, और होना भी ऐसा नहीं कि दूसरे किसी के साथ होना, होना भी ऐसा नहीं कि संसार भर से विषय आ-आ के खींचते हों, सताते हों, लुभाते हों। एकदम मिटा हुआ होना, एकदम सुरक्षित होना। ये मिटना जिसे खींचे वो बच्चा, पूर्ण सुरक्षा जिसे खींचे वो बच्चा। जो कहे कि, “बाज़ार के लड्डुओं से, और लट्टुओं से, और मिठाइयों से, और खिलौनों से मुझे ज़्यादा पसंद है एक सुरक्षित गर्म गोद,” वो बच्चा।

बच्चे ज़रा कम होते हैं। किसी पाँच-साल वाले को भी देख के मान मत लेना कि बच्चा ही होगा। जो पाँच-साल वाला माँ के साथ बाज़ार जाता हो और माँ की उंगली छोड़-छोड़ के झूले की तरफ़, और दुकान की तरफ़, और पकवान की तरफ़ भागता हो वो बच्चा नहीं है, वो दिखने में छोटा है पर उसका बाल्यपन जा चुका है।

एक साल वाला भी बच्चा हो ये आवश्यक नहीं है। बुद्ध हैं बच्चे, शरीर के आकार-प्रकार पे मत चले जाना। लाओ-त्सु बच्चे हैं, जीसस बच्चे हैं।

गर्भ का अर्थ होता है सुषुप्ति जैसी स्थिति, और गर्भ से पूर्व है आनंद, और गर्भ के पश्चात है सुख-दुःख। बच्चा वो जिसे सुख-दुःख, जागृत अवस्था, से ज़्यादा सुषुप्ति प्यारी हो। जिसे सुषुप्ति प्यारी है उसके लिए समाधि सुलभ हो जाती है।

बच्चे पैदा नहीं होते, शरीर तो धोखा है, शैशव हासिल करना पड़ता है। यात्रा बड़ी उल्टी है, जिस्म की उम्र बढ़ती ही जाती है, फर्क नहीं पड़ता तुम कौन हो। तुम आदमी हो, जानवर हो, पापी हो, पुण्यात्मा हो, स्त्री हो, पुरुष हो, ज्ञानी हो, पागल हो, देह की उम्र तो घड़ी के साथ बढ़ती ही जाएगी। जीवन का उद्देश्य है कि जैसे-जैसे देह की उम्र बढ़ती रहे, तुम्हारी उम्र घटती रहे।

संसार का गणित कहता है कि जब तुम पैदा होते हो तो तुम्हारी आयु होती है शून्य और हर बीतते साल के साथ तुम्हारी आयु में एक वर्ष जुड़ता जाता है। और सच्चाई का हिसाब कहता है कि जब तुम पैदा होते हो तो तुम्हारी उम्र होती है हज़ार वर्ष, लाख वर्ष, करोड़ वर्ष।

जो पैदा हुआ है वो बच्चा थोड़े ही है, वो तो समय की शुरुआत से आज तक मानवता को हुए तमाम अनुभवों का पिंड है।

कौन कह रहा है कि ये सद्य जात है? कौन कह रहा है कि ताज़ा है बिलकुल? जो नहीं समझता वही कहता होगा। बच्चा अति बूढ़ा पैदा होता है, वो दिखने में छोटा है, भीतर से बिलकुल बुड्ढा। जीवन का उद्देश्य है कि बूढ़े पैदा हुए हो, शैशव की तरफ़ यात्रा करो। देह की उम्र एक तरफ़ बढ़ती रहे, और तुम्हारी उम्र घटती रहे। बाहर-बाहर से बूढ़े होते रहो, और भीतर-भीतर से बच्चे होते जाओ।

जब शरीर की आयु हो दो वर्ष तो बाहर से दिखाई देगा कि निरे बच्चे हो, लेकिन भीतर से होते बड़े बूढ़े हो। और जब शरीर की आयु हो पचास वर्ष तब बाहर से ये दिखना चाहिए कि बाल पकने लगे, प्रौढ़ हो गए बिलकुल, पर भीतर ये होना चाहिए कि बचपन फला, शिशु समान होते जा रहे हो।

और जीवन यदि सफल और सार्थक रहा है तो मरने से पहले, बहुत पहले ही वैसे जीने लगोगे जैसे गर्भस्थ शिशु जीता है, बिलकुल निर्भर, पूर्णतया आश्रित, मौज में समर्पित, कोई उसको परवाह नहीं, चेतना से कोई लेना-देना नहीं।

जीवन यदि सार्थक रहा है तो मृत्यु से बहुत पहले, जितना जल्दी हो सके उतना अच्छा, तुम इस हालत को प्राप्त कर लोगे, वास्तव में बच्चे बन जाओगे। जब पैदा हुए थे तब का बचपना तो धोखा था, अब तुम असली शैशव को प्राप्त करोगे, परमहंस हो जाओगे। पूरी तसल्ली में जिओगे, “ मेरे भीतर जो कुछ है सब माँ से है, खुद तो मैं कुछ करता नहीं।“

आपूर्ति कहाँ से होती है?

माँ से होती है।

और मेरे बाहर-बाहर भी सर्वत्र क्या है?

माँ ही माँ है। भीतर भी माँ है, बाहर भी माँ है।

ऐसा होता है गर्भस्थ। ये परमश्रद्धा है, ये पूरा चैन है।

परमात्मा के गर्भ में समा जाओ, यही आध्यात्मिकता का उद्देश्य है। शरीर से उल्टी यात्रा है अध्यात्म, शरीर बढ़ता है चिता की ओर, मन को बढ़ना चाहिए परमात्मा की ओर। शरीर जैसे-जैसे चिता की ओर जाए, मन उससे ज़्यादा त्वरा से, ज़्यादा गति से परमात्मा के निकट आता जाए, ज्यों होड़ लगी हो। होड़ लगी है कि, “इससे पहले कि शरीर चिता तक पहुँचे, मन को परमात्मा तक पहुँच जाना है, नहीं तो जन्म व्यर्थ गया। इससे पहले कि शरीर वृद्ध हो जाए, मुझको बच्चा हो जाना है नहीं तो जन्म व्यर्थ गया।“

जो मिलें बूढ़े होते हुए उनसे पूछो, "बूढ़े तो हो लिए, बच्चे कब होओगे? बुढ़ापा तो आता जा रहा है, बचपना कितनी दूर है?"

बुद्ध की आँखें कह सकते हो कि परमात्मा की-सी हैं और साथ-ही-साथ ये भी कह सकते हो कि किसी पशु-सी हैं, किसी नादान शिशु-सी हैं। चेहरे पर तुम्हारे झुर्रियाँ पड़ने लगें उससे पहले अपनी आँखों को निर्मल कर लो। फ़िर बड़ा चमत्कार होता है, कि चेहरा तो झाइयों से, और झुर्रियों से, और उम्र से भरा हुआ है, और आँखें, उनसे कोई बच्चा बाहर देख रहा है। बुद्ध माने वो जो शरीर से परिपक्व और मन से गर्भस्थ हो गया।

बूढ़े का जन्म होता है, बच्चे की विदाई होती है। ये दुनिया ज़रा भी समझदार होती तो जन्म को मृत्यु और मृत्यु को जन्म जानती। बहुत सारा बोझ लेकर के हम आते हैं। उन कहानियों में तो पड़ ही मत जाना कि बच्चा कोरा पैदा होता है। बहुत हैं जो ये कहानियाँ बाँच रहे हैं, कहते हैं, “बच्चा बड़ा भोला होता है, और समय के साथ वो चतुर, चालाक, मलिन होता जाता है,” बेकार की बात है। वो पैदा होते ही रोता है, रोना किसने सिखाया उसको, समाज ने? पैदा होता है, मुट्ठियाँ उसकी भिंचीं रहती हैं, किसने सिखाया उसको?

जिन्होंने शोध किए हैं उन्होंने जाना है कि बहुत छोटे-छोटे बालक भी, एक दिन के, चार दिन के, दस दिन के, वो भी लिंग के अनुसार भिन्न-भिन्न व्यवहार करते हैं। पाँच-दिन की लड़की का व्यवहार पाँच-दिन के लड़के से ज़रा अलग होगा। हम कह देते हैं कि, “समाज हमें हमारी लिंग आधारित पहचानें दे देता है, समाज सिखा देता है कि लड़की को ऐसे चलना है, ऐसे खाना है, और लड़के को ऐसे चलना है, ऐसे जीना है।“ पाँच-दिन के बच्चे को भी समाज ने सिखा दिया? व्यर्थ की बात।

सद्यजात - शिशु भी स्वार्थ जानता है, गीला हो जाएगा तो चिल्लाएगा। बगल का बच्चा गीला होगा, वो थोड़ी चिल्लाएगा। अपने गीला होने पर चिल्लाता है न? पड़ोसी के गीला होने पर नहीं चिल्लाएगा। स्वार्थ जानता है, स्वार्थ उसे किसने सिखाया? पाठशाला ने, धर्म ने, परिवार ने, संसार ने? नहीं।

ये सब बोझ लेके हम पैदा होते हैं, ये हमें कोई सिखा नहीं रहा है। पूरी की पूरी संस्कारों की गठरी निकलती है, वो बहुत कुछ जानती है, वो महा ज्ञानी है। जितना ज्ञान तुम उसे उसके जीवन काल में देते हो, वो ज्ञान तो उस ज्ञान का एक प्रतिशत भी नहीं है जिसके साथ वो गठरी पैदा हुई थी।

बच्चा बड़ा पंडित, बड़ा ज्ञानी पैदा होता है। तुमने सिखाया है उसको हाथ-पाँव चलाना? तुमने सिखाया है उसे इन्द्रियों से रस ग्रहण करना? कैसे पता उसको कि उसे माँ से आहार होठों से ही लेना है? कैसे पता उसको कि जब उसकी ओर कोई वस्तु आए तो हाथ ही बढ़ाना है? कौन सिखा रहा है उसको नाक से साँस लेना? कौन सिखा रहा है उसको ध्यान आकर्षित करने के लिए रोना और चिल्लाना?

देह की बात ही नहीं है, मन की वृत्तियाँ भी वो साथ लेकर आया है, हम गठरी ही पैदा हुए हैं। संसार को भी बहुत दोष दो मत। जब संसार को ही दोष नहीं दे सकते तो अपने संसार-काल में घटने वाली किंचित घटनाओं को तो दोष देना बिलकुल ही वृथा है। तुम शून्य से लेकर के अस्सी वर्ष के अपने पूर्ण जीवन-काल को भी दोष नहीं दे सकते कि, “इसने मुझे संस्कारित कर दिया।“

मैं कह रहा हूँ, “अपनी पूरी आयु में तुम जितने संस्कार ग्रहण करते हो, वो उन संस्कारों का एक प्रतिशत भी नहीं है जिनके साथ तुम पैदा होते हो।“ तो फिर किन्हीं विशिष्ट घटनाओं की बात करना तो बिलकुल ही व्यर्थ है। लोग कहते हैं, “मैं अठारह-वर्ष का था, तभी एक दुर्घटना हुई। उस दुर्घटना ने मेरा मन ही बिलकुल बदल दिया, वो दुर्घटना उत्तरदायी है मेरी दुर्गति के लिए।” तुम कितनी बेकार बात कर रहे हो।

एक नहीं, वो सारी घटनाएँ जो तुम्हारे साथ हुई हैं तुम्हारे जीवन भर, वो सब मिलकर भी कोई अर्थ नहीं रखतीं। तुम्हें यदि दुःख हो रहा है किन्हीं खास परिस्थितियों में, किन्हीं घटनाओं से, तो वो इसलिए है क्योंकि तुम दुःख भोगने को पैदा ही हुए हो। किसी व्यक्ति-विशेष ने तुम्हें दुःख नहीं दे दिया, किसी स्थिति-विशेष ने तुम्हें दुःख नहीं दे दिया। संसार, समाज, कालचक्र, घटनाक्रम इनकी बात करो ही मत, इन्होंने तुम्हें कुछ नहीं दे दिया। तुम ऐसे ही हो, हम सब ऐसे ही हैं।

अधिकांश लोग जिस गठरी के साथ पैदा होते हैं, उसके साथ मर भी जाते हैं, बल्कि उसमें कुछ वृद्धि ही कर लेते हैं। कोई बिरला होता है जो बोझ के साथ पैदा होता है लेकिन हल्का मरता है। संतों ने इसीलिए आवागमन की बड़ी बात करी है, जीवन-मरण के कुचक्र से मुक्त होने पर बड़ा महत्व रखा है। और जीवन-मरण से मुक्त होना माने संसार से मुक्त होना, माने ब्रह्म में स्थापित हो जाना। और इसी कारण से ब्रह्मचर्य का संबंध संतानोत्पत्ति से भी जुड़ा, “तुम एक नया चक्र नहीं शुरू करोगे। जीवन इसलिए मिला है ताकि चक्रों में फँसे जीवन से मुक्त हो सको, एक नए दुष्चक्र में क्यों फँस रहे हो?”

शुद्धतम रूप से देखें तो ब्रह्मचर्य का कोई संबंध मैथुन से या सन्तानोपार्जन से नहीं है। ब्रह्मचर्य का संबंध तो मन की उस स्थिति से है जिसमें वो ब्रह्मलीन है। लेकिन जो ब्रह्मलीन मन है वो ये चाहेगा ही नहीं कि अब ब्रह्म से च्युत होकर के मैं दुनिया-जहान के चक्करों में, चक्रों में फँसूँ। तो ये भी हो ही जाता है कि जो ब्रह्मस्थ है, जो ब्रह्मचारी है, वो संतानोत्पत्ति से भी किनारा कर लेता है, वो प्राथमिक बात नहीं है, वो एक परिणाम है, वो फल है। मैथुन और संसार-संवर्द्धन का त्याग करना ब्रह्मचर्य का केंद्र नहीं है, ब्रह्मचर्य का परिणाम है, वो ब्रह्मचारी के साथ कालांतर में घटित हो ही जाता है। ब्रह्मचारी उसकी साधना नहीं करता, मैथुन से विरक्ति का अभ्यास नहीं करता, वो विरक्ति सहज फलित हो ही जाती है, क्योंकि वो जान गया है कि, “करूँगा क्या एक कहानी और शुरू करके? इतनी कहानियाँ स्वयं में बसाए तो मैं पैदा हुआ, और उन कहानियों से ही नहीं मुक्त हो पा रहा, अब दो-चार और कहानियाँ शुरू करूँ, पगलाया हुआ हूँ क्या?”

ब्रह्मचारी वो, जो ऐसा 'बच्चा' हो गया है कि अब 'बूढ़े' नहीं पैदा करना चाहता। ये बच्चा कह रहा है कि, “बूढ़ों में हमारी अब कोई रुचि नहीं रही। हमने अब गर्भधारण किया नहीं कि बूढ़े ही पैदा होंगे उसमें से। हम क्यों और बूढ़े संसार में लाएँ, क्यों दुःख बढ़ाएँ?”

तो वो कहता है, “ना भई ना,अपना ही कष्ट काफ़ी है। अपनी ही मुक्ति बड़ा झंझट है, वही नहीं सध रही, एक नन्हा जीव और क्यों खड़ा कर दें?”

दुनिया से पूछो तो कहते हैं, “वो जीव संसार में आया, बधाई बजे,” और तत्वज्ञानी से पूछो तो वो कहेगा, “नर्क में एक नई प्रविष्टि हुई है, मातम करो।“

जिस जगह तुम दुःख झेलने को आते हो उसे क्या बोलोगे, संसार या नर्क? और हज़ार में से नौ-सौ-निन्यानबे लोग संसार में दुःख ही झेलने आते हैं, तो संसार कैसा, नर्क है। नर्क में एक नया बाशिंदा आ गया, एक नया जन्म हो गया, तो ये सौभाग्य की बात है या अफ़सोस की?

हज़ार में से कोई एक होता है जो संसार में इसलिए आता है कि संसार में उसकी मुक्ति होगी। हज़ारों, लाखों में ही तो कोई एक पैदा होके मुक्त होता है, बाकी तो सब पैदा होते हैं, झेलते हैं, और फ़िर पुनः-पुनः इसी चक्र को दोहराते हैं। नर्क भर नहीं है, पुनुरुक्त होता हुआ नर्क है।

संसार नर्क बस बुद्धों के लिए नहीं है। एक कृष्ण के लिए नहीं है नर्क संसार, एक कबीर के लिए नहीं है संसार नर्क। वो नर्क में पैदा हुए ज़रूर थे पर कुछ ऐसी आभा थी उनमें, कुछ ऐसी आग थी कि बदल गए, और बदल गए तो बदल दिया, नर्क को स्वर्ग कर दिया। भीतर की मलीनता साफ़ हुई तो नर्क का कचरा भी साफ़ हो गया, नर्क स्वर्ग हो गया। ये हज़ारों, लाखों में किसी एक के साथ होता है, बाकी तो संसार में नहीं आते, नर्क में आते हैं।

जो ब्रह्म में स्थापित हुआ वो करुणा से भर जाता है, वो कहता है, "मैं क्यों नर्क की आबादी बढ़ाऊँ? जाग गया हूँ, जान गया हूँ कि दुःख ही दुःख है। मैंने झेला तो झेला, किसी और को क्यों झेलवाऊँ? और फ़िर अभी तो मेरा ही काम बाकी है, मैं ही कहाँ आज़ाद हो चला, मेरी उड़ान ही अभी दूर है। ऐसे में उचित नहीं ये कि औरों को भी साथ बाँध लूँ। मेरी भी दिक्कत बढ़ेगी और जिन्हें साथ लूँगा, उनके साथ भी अन्याय होगा।"

जिन्हें वास्तव में बाल्यपन वापस चाहिए हो, जिन्हें वास्तव में बच्चा बन जाना हो, वो बच्चों से बचें। और जिन बुड्ढों को अभी और बुड्ढा होना हो, वो बच्चे ही बच्चे लेके आएँ।

देखा नहीं है तुमने, सबसे ज़्यादा किनकी रुचि रहती है संतानें बढ़ाने में, जो सबसे मूढ़ होते हैं। बुद्ध थोड़े ही लड़ी लगाते हैं। दर्जनों में गिनती तो जो पहुँचे हुए महापुरुष हैं, वही करते हैं। कौन बताए कि आठ हैं, कि दस हुए, कि बारह, कि अठारह हो गया, तो बोलेंगे, “एक, कि डेढ़,” तुम समझ जाना दर्जनों में बात चल रही है।

ये जितनी मूर्तियाँ यहाँ विराजित हैं, बताओ इनके कितने-कितने थे? ये सब बच्चे हैं, ये महाबच्चे हैं, ये वास्तविक बच्चे हैं, ये सच्चे बच्चे हैं। या तो इनकी संतानें हुईं नहीं या हुईं भी तो एक-आध, अधिकांश के तो कुछ नहीं। जिनकी हुईं भी उन्हें बुद्धत्व प्राप्त करने से पूर्व हो गईं। सिद्धार्थ को पुत्र हुआ था, बुद्ध को थोड़ी हुआ।

तो इसीलिए, हे श्रोताओं, यदि प्रजनन क्रिया में संलग्न होना है तो जल्दी से हो जाओ। नहीं तो मेरे पास बैठने से ख़तरा है, कभी भी बुद्धत्व फ़ेंक के मार सकता हूँ, फ़िर पैदा नहीं कर पाओगे। बुद्धत्व सबसे बड़ी नसबंदी है, रियलाइज़ेशन इज़ द बिगेस्ट कॉन्ट्रासेप्टिव , जो करना है जल्दी कर डालो।

बात समझ में आ गई है।

(श्रोतागण हँसते हुए)

दुर्घटना कभी भी घट सकती है, ये कक्ष ख़तरनाक है, यहाँ कई थे जो भरे-पूरे आए और कुछ गँवा के गए। काल करे सो आज कर।

देवेश का प्रश्न था, जाने सुना होगा कि नहीं सुना अब। सुन लिया? ठीक है।

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