तुम्हें लग रहा है बहुत क़ाबिल नौजवान घूम रहे हैं हिंदुस्तान में और इनको ब्रेन वॉश कर- कर के आचार्य जी बुला रहे हैं और फिर इनसे अपने लिए काम कराएँगे। अरे, ये निहायती घटिया नस्ल है। नस्ल भी घटिया, फ़सल भी घटिया। इनको यहाँ बुलाता हूँ तो इन पर बड़ी मेहनत करनी पड़ती है किसी लायक बने, और आधे तो उतनी मेहनत झेल भी नहीं पाते। वे बाहर निकल जाते हैं और फिर बाहर जाकर वीडियो बनाते हैं, “हमसे काम कराया, हम मर गए हैं। अरे, हमसे हुआ नहीं।”
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आचार्य प्रशांत: “आचार्य जी का प्लान है नौजवानों का माइंड वॉश करना।”
फिर मैं उनसे क्या कराऊँगा? होम वॉश कराऊँगा, मसाज कराऊँगा, मालिश कराऊँगा, क्या कराऊँगा? “आचार्य जी का प्लान है” घटिया किस्म की कॉमिक्स बुढ़ापे में भी पढ़ने का ये नतीजा होता है। ऐसे ख़्याल आते हैं, “आचार्य जी का प्लान है नौजवानों का माइंड वॉश करना।” क्या करेंगे उसके बाद वो? उनसे कहेंगे, आओ मेरी मालिश करो? क्या करूँगा मैं उनसे? जहाँ देखो, वहाँ पर कॉमिक्स शुरू कर देते हो। वो भी घटिया किस्म वाली। धर्म के नाम पर कहानियाँ ज़्यादा चलाने से यह होता है। हर समय दिमाग़ में दो टके की कहानियाँ कूदती रहती हैं। “नौजवानों का माइंड वॉश कर रहा है।”
फिर क्या करेंगे? क्यों करेंगे? आगे क्या मिलेगा?
“हर काम को ग़लत बोलते हैं और नौजवानों से बोलते हैं कि सही काम चुनो, मतलब मेरे लिए काम करो।” आखिरकार राज फ़ाश हो ही गया। तो कह ये रहे हैं, कि “ये आचार्य जी नौजवानों का ब्रेन वॉश




