
आचार्य प्रशांत: “आचार्य जी का प्लान है नौजवानों का माइंड वॉश करना।”
फिर मैं उनसे क्या कराऊँगा? होम वॉश कराऊँगा, मसाज कराऊँगा, मालिश कराऊँगा, क्या कराऊँगा? “आचार्य जी का प्लान है” घटिया किस्म की कॉमिक्स बुढ़ापे में भी पढ़ने का ये नतीजा होता है। ऐसे ख़्याल आते हैं, “आचार्य जी का प्लान है नौजवानों का माइंड वॉश करना।” क्या करेंगे उसके बाद वो? उनसे कहेंगे, आओ मेरी मालिश करो? क्या करूँगा मैं उनसे? जहाँ देखो, वहाँ पर कॉमिक्स शुरू कर देते हो। वो भी घटिया किस्म वाली। धर्म के नाम पर कहानियाँ ज़्यादा चलाने से यह होता है। हर समय दिमाग़ में दो टके की कहानियाँ कूदती रहती हैं। “नौजवानों का माइंड वॉश कर रहा है।”
फिर क्या करेंगे? क्यों करेंगे? आगे क्या मिलेगा?
“हर काम को ग़लत बोलते हैं और नौजवानों से बोलते हैं कि सही काम चुनो, मतलब मेरे लिए काम करो।” आखिरकार राज फ़ाश हो ही गया। तो कह ये रहे हैं, कि “ये आचार्य जी नौजवानों का ब्रेन वॉश करते हैं और उनसे बोलते हैं, कोई कॉर्पोरेट जॉब मत करना, माने यहाँ आकर संस्था में काम करो। तो ये इनकी साज़िश है।”
अरे मूर्खों, जो संस्था में आता है न, दस में से नौ जना मेरे लिए बोझ बन के ही आता है। तो उनको यहाँ बुला करके मुझे कुछ मिल नहीं रहा है। वो भी जो यहाँ आए हैं, उनमें से भी 90% को मुझे माइंड वॉश क्या, बॉडी वॉश भी मुझे ही करना पड़ता है, ऐसी हालतों में आते हैं। अनुज, ग़लत बोल रहा हूँ तो बताओ।
तुम अपना एजम्पशन देखो। तुम्हें लग रहा है बहुत क़ाबिल नौजवान घूम रहे हैं हिंदुस्तान में और इनको ब्रेन वॉश कर- कर के आचार्य जी बुला रहे हैं और फिर इनसे अपने लिए काम कराएँगे। अरे, ये निहायती घटिया नस्ल है। नस्ल भी घटिया, फ़सल भी घटिया। इनको यहाँ बुलाता हूँ तो इन पर बड़ी मेहनत करनी पड़ती है किसी लायक बने, और आधे तो उतनी मेहनत झेल भी नहीं पाते। वे बाहर निकल जाते हैं और फिर बाहर जाकर वीडियो बनाते हैं, “हमसे काम कराया, हम मर गए हैं। अरे, हमसे हुआ नहीं।”
नहीं, तुम्हारी ये जो औलादें हैं, जिनको तुम बोल रहे हो नौजवान, तुमने ये औलादें कैसी पैदा करी हैं? जवाब तुम मुझे दो। तुमने ये ऐसी औलादें पैदा करी हैं कि मुझे इन्हें पालना पड़ता है यहाँ बुलाकर के। ये मेरे लिए काम नहीं कर रहे, मैं इनके लिए काम करता हूँ। और जो मेरे लिए काम करने लायक बनते हैं, पहले जब कम से कम तीन–चार साल पाल देता हूँ, तब वो जाकर के किसी लायक बनते हैं कि अब वो कुछ कर पाएँ।
कईयों का तो तीन–चार साल बाद भी नहीं पता होता। नेहा बिल्कुल मान रही है। और कई ऐसे होते हैं, और सुनो सुरमा, जो चार साल पाँच साल मुझसे अपने ऊपर काम करवा के भाग जाते हैं। और इस मिशन को आगे न बढ़ने देने में ऐसे नौजवानों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। ये सब मेरे फेल्ड इन्वेस्टमेंट्स रहे हैं। बहुत-बहुत मेहनतें करी मैंने इन पर और ये पहले भी भागे हैं, आज भी भाग रहे हैं, आगे भी भागेंगे।
तुम किस ग़लतफ़हमी में हो कि ये सब ऐसे क़ाबिल सुरमाओं की जवान लोगों की एक फ़ौज है और ये आचार्य उनको जाकर के ऐसे वशीकरण करके बुला लेता है और फिर ये भीतर आते हैं और ज़बरदस्त रूप से प्रोडक्टिव हो जाते हैं। यह तुम्हारा मेंटल मॉडल है, मूर्खों। जो असलियत है, वो बिल्कुल दूसरी है।
हमें जिस स्तर का काम चाहिए, जिस रिगर का काम चाहिए, जितना घिसा के काम चाहिए, वो काम करने वाले नौजवान हैं ही नहीं भारत में।
नेहा, पिछले महीने तुमने कितने हायर किए थे? कितने फायर किए थे? अरे मोटा-मोटा बता दो। पिछले दो-तीन सालों में जितनी हायरिंग हुई है, 90-95% उतनी फायरिंग भी हुई है। फायरिंग बोल दो, रिलीविंग बोल दो, जो भी बोलो, रेज़िग्नेशन बोल दो, जो बोलो। और ये तब है जब वो आए, उन पर पूरी मेहनत कर ली गई। उसके बाद वो किसी लायक नहीं निकले।
नहीं घूम रहे क़ाबिल नौजवान, कुछ अपवाद होंगे दो-चार, उन्हें बुरा न लगे। नहीं, इसी बात पर बना देंगे, कि “देखा, हम इतने क़ाबिल थे, हम यहाँ से निकल गए। उसके बाद इसने ऐसा बोला। निकले इसलिए क्योंकि ये बहुत काम करा के हमारा शोषण करता था।” तो मत करवाओ शोषण।
और सुनो, ये जो काम करने आते हैं, उनका आधा काम तो मैं व्यक्तिगत रूप से करता हूँ। पूछते हो न, “आचार्य जी दिनभर करते क्या हैं?” कुछ ही चंद काम हैं संस्था के, जो अब जाकर के मेरी ग़ैर मौजूदगी में भी होने लग गए हैं। नहीं तो इतना सा भी काम होना, एक थंबनेल तक, ये क़ाबिलियत है हिंदुस्तान के नौजवानों की।
अब क्या तुमको बताऊँ, मेरी ही संस्था है, क्या तुम्हें उघेड़ूं, कितना खोल के बताऊँ, कि जो बोल रहे हो क़ाबिल क़ाबिल क़ाबिल। और ये बात नहीं है कि हमने यहाँ पर सिर्फ़ जो कम पढ़े–लिखे या इस तरीक़े के लोग हैं, उनको ही भर रखा है। यहाँ आईआईटी वाले भी आए, आईआईएम वाले भी आए और आईवी लीग वाले भी आए, अमेरिका वाले भी आए और सब पाद मार के भग गए। ये काम ऐसा है भाई। कुछ ख़ुद भगते हैं। कुछ के माँ-बाप रोते, कलपते, बाप को हार्ट अटैक आ जाएगा, माँ घसीटते हुए उसको ले जा रही है। किसी की बीवी उसको उठा के ले गई।
यहाँ पर तो चलने के लिए ऐसा भी नहीं है कि बहुत ऊँची डिग्री ले के आए हो कि आईआईएम से हो तो यहाँ चल जाओगे। आईआईएम वाले भी न जाने। बीसों को देख चुका हूँ, पिछले बीस साल में आईआईटी कानपुर, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी रुड़की, इन तीन कैंपसों में जाकर कैंपस हायरिंग करी है हमने और सब नालायक निकले। तुम्हारे घरों में क़ाबिल नौजवान पैदा नहीं होते। हाँ, वो पैसे कमा सकते हैं, पर उससे क़ाबिलियत नहीं तय हो जाती।
मैं जब नौजवानों को यहाँ लाता हूँ न, थोड़ा सा अपने ही मुँह से बोल देता हूँ क्योंकि तुम्हें समझ में तो आता नहीं, तो बोलना पड़ेगा, मैं जब जिनको यहाँ ले कर आता हूँ, मैं उनको नया जन्म देता हूँ। तुम्हारी पैरेंटिंग में जो कमी थी, मैं उनका बाप बनकर, मैं उनकी माँ बनकर उनकी पैरेंटिंग करता हूँ। जो काम तुम्हें कर देना चाहिए था, वो काम मैं करता हूँ जब नौजवान यहाँ आते हैं तो। जो साहस, जो ताक़त देना परिवार का और शिक्षा का कर्तव्य होता है, वो साहस और ताक़त मैं उन्हें देता हूँ, क्योंकि तुमने बहुत डरपोक और दुर्बल नौजवान पैदा किए हैं।
मैं उन्हें यहाँ बुलाकर काम नहीं करवाता, क्योंकि वो काम करने लायक ही नहीं होते, मैं पहले उन्हें इंसान बनाता हूँ।
और पहले मैं उन पर बहुत श्रम करता हूँ। और अक्सर जब मैं उन पर श्रम कर रहा होता हूँ कई सालों तक, तब तक बीच में वो भग जाते हैं। ये है मेरी स्थिति, मेरी दशा।