असली प्रेमी हो, तो प्रेमिका का अहंकार काटो || आचार्य प्रशांत (2017)

श्रोता: आचार्य जी, अभी आपने कहा कि अगर प्रेम चाहिए तो परमात्मा हो जाओ। पर इतिहास देखा जाए, तो जितने भी संत हुए हैं, उनके चाहने वाले कम और विरोधी ज़्यादा रहे हैं। ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: उनकी हिस्ट्री छोड़ो, तुम्हें नहीं पता की जो विरोधी हो रहे हैं, वो क्या कर रहे हैं| वो सब रात में चुपके से आते थे और पाँव छू कर के चले जाते थे। संत का सबसे बड़ा फैन, सबसे बड़ा भक्त और सबसे बड़ा अनुयायी, जानते हो कौन होता है? जो उसके खिलाफ खड़ा होता है। संत के साथी चूक सकते हैं संत को पहचानने में, जो संत की खिलाफत कर रहे हैं, वो अच्छे से जानते हैं कि संत कौन है। इसलिए तो उसके खिलाफ खड़े हैं। जानते हैं कि यह खतरनाक है।
संत की इतनी खिलाफत होती ही इसीलिए है, क्योंकि वो पहचान में आएगा ही आएगा। वो छुप नहीं सकता। तो फिर खिलाफत हो गई ही उसकी| तो, सब रात में धीरे से आते हैं, पाँव छूते हैं, निकल लेते हैं। हिम्मत नहीं होती उन बेचारों की उसके गले लग जाने की, उसके साथ रुक जाने की।
कहानियाँ हैं। संत गुज़र गया, आगे बड़ गया। लोग पीछे से आये, जिस धूल पर उसने पाँव रखे थे, वो थोड़ी सी उठायी और माथे पर लगा ली। पर उसके साथ नहीं जा पाए। इतनी हिम्मत नहीं कर पाए की उसके साथ चले जाएँ|
श्रोता: तो रोकता कौन है उन्हें, संत के पास जाने में ?
वक्ता: तुम्हारे पास आएंगे, पर “हम” बचे रह कर के तुम्हारे पास आएंगे । “हम” आएंगे तुम्हारे पास । तुम्हारे जैसे नहीं हो जायेंगे । “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ , मैं तुम्हें पाना चाहता हूँ| किन्तु, यद्यपि मैं तुम्हें पाना चाहता हूँ, मैं वही रहना चाहता हूँ, जो मैं हूँ|”



