असली लड़ाई अपने ही विरुद्ध लड़ी जाती है || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् | सुखिन: क्षत्रिया: पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् || २, ३२ ||
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय लोग ही पाते हैं। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ३२
आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण जितने साधनों का उपयोग कर सकते हैं, कर रहे हैं। और साधन तो साधक की क्षमता के अनुसार ही प्रयुक्त होता है। साधक की जो स्थिति होती है, साधक की जो पात्रता होती है, उसी को देख करके साधन बताया जाता है। तो दूसरे अध्याय में जितने श्लोक अर्जुन को क्षत्रिय धर्म की याद दिलाते हुए कहे गए हैं, उनको साधन और उपाय की तरह ही जानना।
श्रीकृष्ण कह रहे हैं, “क्षत्रिय हो तुम, बड़ी नाक कटेगी तुम्हारी, बड़ी बदनामी होगी, और सम्माननीय लोगों के लिए बदनामी से अच्छा होता है मर जाना।” बिलकुल इन्हीं शब्दों में श्रीकृष्ण ने बात रखी है। ये बात अर्जुन के लिए रखी है, क्यों? क्योंकि दूसरे अध्याय में जो ज्ञान अर्जुन को दिया गया है, वो उच्चतम कोटि का है; ऊँची-से-ऊँची बात, सीधी-से-सीधी बात और सरल-से-सरल। और अर्जुन जब उस बात को नहीं समझ रहा है तो श्रीकृष्ण को दिख रहा है कि बहुत ऊँचे ज्ञान का अभी ये पात्र नहीं है, अधिकारी नहीं है; बात बन नहीं रही है।
तो फ़िर वो बात को बदलकर अर्जुन के तल पर ले आते हैं, कि इससे कोई ऐसी बात बोलूँ जो इस पर असर करे, जो इसको आकर्षक लगे। तो उसको कहते हैं, “देख, बदनामी होगी।” थोड़ी देर पहले बोल रहे थे, “तू आत्मा है, न जीवन है, न मरण है।” और अब बात को बदल कर इस तल पर ले आए कि “देख, तू क्षत्रिय है, लड़ेगा नहीं तो बड़ी बदनामी होगी।”



