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अर्जुन को ही क्यों मिली गीता? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल आपने वो समझाया था कि तीन प्रकार के मुनष्य हैं कि एक को तो धर्म से कोई मतलब ही नहीं है, वो बस ऐसे ही जी रहा है। और दूसरा है जो उनसे बेहतर है, पर वो राजसिक है तो वो उनपर भारी पड़ता है। और तीसरे हैं जिन्हें धर्म से भी मतलब है और बिलकुल तीव्रता के साथ अपना संकल्प भी करते हैं, कर्म में भी उतरते हैं। तो अपने-आपको परखना हो तो कैसे स्पष्टता से मैं देख सकता हूँ क्योंकि आपसे जुड़ने से पहले…

आचार्य प्रशांत: मेरे ही मुँह से कहलवाओगे? (हँसते हुए) ख़ुद ही देख लीजिए न, आत्मज्ञान का क्या अर्थ होता है? अपने जीवन का अवलोकन करो, ख़ुद ही पता चल जाएगा कि किस तल पर हो। मैं क्या बोलूँ?

प्र: अभी तो जैसे आपसे जुड़कर तो हम आगे बढ़ पा रहे हैं। लेकिन आप नहीं होते तो हमें लगता ठीक है, शान्ति मिल गई काम चलाओ।

आचार्य: नहीं, ये सब ऐसे नहीं है कि हमें क्या लगता। देखो, किसी भी व्यक्ति पर न तो पूरा आश्रय रखना चाहिए, न उसपर बड़ी ज़िम्मेदारी डाल देनी चाहिए। मैंने ही नहीं करा तो आपको क्यों बोलूँ कि आप करो? अंततः अध्यात्म का भी उद्देश्य यही है कि इस लायक हो जाओ कि दूसरों को सहारा दे सको।

तो भारत में जो पारंपरिक मॉडल (प्रारूप) रहा है गुरु शिष्य परंपरा का, वो कुछ अर्थों में बहुत उत्कृष्ट है और कुछ अर्थों में घातक हो जाता है, खासतौर पर जब उसका दुरुपयोग करा जाए। जैसे यही बात कि आपने समझा दिया तो हम समझ गए, नहीं तो नहीं समझ पाते; ऐसे नहीं बोलना चाहिए। मैं कोई नहीं हूँ।

प्र: नहीं, मैं एक्चुअली ये कहना चाह रहा था कि आपने कहा था कर्म में तीव्रता से उतरने की बात। तो संस्था के माध्यम से तो हम जुड़ पाए हैं और थोड़ा कर्म में उतरने की प्रेरणा मिलती है। वैसे तो रहता कि ठीक है, अब शांति मिल गई, अब अपना जीवन देख लो, बाकी लोग देख लेंगे सब। मतलब स्वार्थ-सा आ जाता है उसमें।

आचार्य: देखो ये बात ठीक भी हो तो भी नहीं कहनी चाहिए। सबसे बड़ी चीज़ होती है बल। एक मामले में बल सत्य से भी बड़ा होता है, क्योंकि बल नहीं है तो सत्य तक भी कैसे पहुँचोगे? कुछ ऐसा मत बोलो जो तुम्हारा बल क्षीण करता हो। ये भी कहना कि 'आप नहीं होते तो हम कैसे पहुँचते या संस्था नहीं होती तो...', ये बात भी बल को क्षीण कर देगी, मत बोलो। अनुग्रह अगर है तो मन में उसको चुपचाप मौन रखो।

पर ऐसे बोल करके जानते हो क्या कर रहे हो? भीतरी माया साज़िश कर रही है, वो आगे बढ़ने की ज़िम्मेदारी से तुमको रिहाई दे रही है। वो कह रही है, ‘अभी भी आगे अगर बढ़े हैं तो उनकी बदौलत बढ़े हैं।‘ दूसरे की बदौलत कोई बहुत आगे नहीं बढ़ सकता।

और सिखाने वाले का उद्देश्य भी यही होता है कि उसे भी सीखने वाले से जल्दी-से-जल्दी रिहाई मिल जाए। एक अर्थ में सिखाने वाले के लिए भी सीखने वाला एक बंधन जैसा ही होता है। ‘गुरु’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहता लेकिन फिर भी बार-बार बोलूँ ‘सीखने वाला सिखाने वाला’, तो उससे अच्छा छोटा शब्द बोल देते हैं, एक्रोनिम (संक्षिप्त रूप) की तरह।

तो गुरु के लिए शिष्य भी एक बंधन के ही जैसा होता है। तुम बोझ भी बोल सकते हो। वो भी यही चाहता है कि ये जल्दी-से-जल्दी तरे। ‘भाई तू सीख जा, समझ जा, मुक्त हो जा, उड़ जा। ये काम थोड़े ही मेरा है कि तुझे पिंजरे में डाल करके अपने कंधे पर ढोता रहूँ?’

और शारीरिक बल तो भौतिक चीज़ होती है, वो नहीं है तो नहीं हैं। मैं अभी बोल दूँ दो-सौ किलो का पत्थर उठा लो, तो नहीं उठा पाओगे; नहीं है तो नहीं है।

मानसिक बल मान्यता की चीज़ होती है। उसको मान्यता ही रोक कर रखती है इसीलिए उसको बहुत तीव्रता से विकसित किया जा सकता है। और अगर ये मान्यता रखोगे कि मैं बली नहीं हूँ या दूसरों का बल अभी काम आ रहा है, तो फिर अपना बल कभी विकसित नहीं होगा। ठीक है?

प्र: आचार्य जी, आपने सिखाया था कि आसक्त व्यक्ति जिस तीव्रता से कर्म में उतरता है उसी तीव्रता से अनासक्त व्यक्ति को कर्म में उतरना चाहिए; तो वो स्पेसिफ़िक (विशेष) कर्म क्या है? जैसे कि सिर्फ़ प्रचार ही है या और भी कुछ हो सकता है?

आचार्य: देखो क्या कर रहे हो – ‘कौनसा कर्म है?’ ये पूछ रहे हो। किसको बचा रहे हो? अब तो इतना अभ्यास करा दिया, झट से बोला करिए। जब भी कोई पूछे कौनसा कर्म करें, तो वो किसकी बात करने से बच रहा है? कर्ता की; बस हो गया।

जब भी ये सवाल कोई पूछे, ‘क्या करूँ? व्हाट टू डू? ’ वो अपने ही खिलाफ़ साज़िश कर रहा है। वो ये नहीं जानना चाह रहा है कि ‘क्या हो जाऊँ?’ जब तुम सही हो जाते हो तो सही कर्म अपनेआप हो जाता है। और सही हुए बिना तुम सही कर्म पूछ रहे हो, तो जो भीतर ग़लत है उसको बचाना चाहते हो बस।

क्योंकि ग़लत होकर भी आप बाहर-बाहर से सही कर्म कर सकते हो। कर सकते हो या नहीं कर सकते हो? आप भीतर से लालची हो, फिर भी बाहर से दान कर सकते हो या नहीं? तो आप हमेशा ये पूछते हो, ‘अच्छा, किसको दान कर दें, कितना दान कर दें?’ आप ये नहीं पूछते हो कि ‘भीतर से लोभ कैसे हटाएँ?’ ये जो लोभी कर्ता बैठा है भीतर, उसकी बात करनी चाहिए न। आप दान के तरीके पूछो, ‘किस जगह करना चाहिए, कितना करना चाहिए, किस दिन करना चाहिए?’ इसमें क्या रखा है?

प्र२: कोटि-कोटि नमन, आचार्य जी। आचार्य जी, सबसे पहले मैं धन्यवाद देना चाहूँगा आपको कि एक समय ऐसा आ गया था कि मैंने अपना सबकुछ समाप्त करने की सोच ली थी, लेकिन वो अंतिम क्षण पर आपकी वीडियो देख ली, तो फिर संघर्ष करने की प्रेरणा मिल गई मुझे। और फिर मैं काफ़ी सोच रहा था कि मैं आपसे रूबरू होऊँ, लेकिन नहीं हो पा रहा था क्योंकि घर में कुछ आदर्श-जैसे ढकोसलों में धकेल दिया गया था।

मैं बरेली का रहने वाला हूँ। मैं गाँव से बरेली पढ़ने के लिए गया था। उस समय दिव्यनाथ मंदिर पर कोई कथावाचक पंडित जी आते थे, तो मैं सत्संग ज़रूर जाता था। उस समय मुझे ये तो पक्का था कि ग़लत तो कुछ नहीं करना है। तो उस समय मुझे एक नौकरी मिली थी जिसमें मेरे मन के अनुरूप काम नहीं हो रहा था। तो मैंने कहा, ‘सर ये ग़लत है, मैं ऐसा नहीं कर सकता।‘ तो बोले, ‘तुम कर भी नहीं पाओगे।‘ उससे पहले मेरी शादी नहीं हुई थी, तो मैं ठसक में जीता था, तो मैंने कहा, ‘ठीक है फिर, मैं ही इस्तीफ़ा दे देता हूँ।‘

घर पर बोल दिया था कि शादी तो मैं किसी भी कीमत पर नहीं करूँगा। फिर पिताजी बोले, ‘तुम क्या भगवान राम से भी बड़े हो, उन्होंने भी तो शादी करी थी?’ और जब नौकरी छूटी थी तो उन्हें लगा अब ये कुछ करेगा भी नहीं, तो इस तरह से उन्होंने मुझे हर तरफ़ से डर दिखाया।

काश! मैंने आपकी ये 'डर' वाली वीडियो देख ली होती उस वक़्त, तो मैं शादी करता भी नहीं। फिर मैं बच्चों को पढ़ाने लगा, उसमें आनन्द भी आ रहा था। तो बोले, ‘ऐसे तुम कब तक करोगे, और हम नरक में चले जाएँगे।‘ ऐसे बहुत कुछ बोलते थे तो फिर मैंने उनकी बात मान ली और शादी कर ली। फिर वही नौकरी के लिए मैं दोबारा गया। तो वो मुझसे पूछ रहे थे, ‘अब तुम क्यों आए?’ फिर मुझे वो ज़रूरत-सी लगने लगी। पर फिर मैं पछताया कि मैंने अपने जीवन के साथ गड़बड़ कर ली। लेकिन इसलिए दुखी नहीं था कि नौकरी नहीं मिलेगी तो कुछ होगा नहीं। मैं आर्थिक रूप से कमज़ोर था पर दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहता था।

बाद में फिर घर वालों ने मुझे व्यवसाय में लगा दिया और मैंने भी कहा ठीक है, मैं अपना काम करूँगा। लेकिन जब आपसे मिलने की बात करता हूँ या उनको जब आपकी वीडियो दिखाता हूँ, तो एकदम हावी से हो जाते हैं, कि ‘ये क्या है? ये कोई अलग-सी बात है?’

एक गुरुजी हैं, उनको घर पर बुलाया गया था तो खाने पर तीस हज़ार रुपये ख़त्म कर दिए। और जब मैं कहता हूँ, ‘आचार्य जी से मिलने जाना है, तो इतना क्लेश कर देते हैं।‘ जबकि मैं सही राह पहचान रहा हूँ, और सही चुनाव करना चाह रहा हूँ तो मेरे बीच में आ जाते हैं।

पत्नी जी हैं, तो मैं जब भी आपकी वीडियो देखूँ, तो कहती हैं, ‘ये आपको रोटी दे देंगे क्या?’ और ऐसे ही किसी के साथ बैठे थे तो उसे सही राह दिखाने की कोशिश की तो उनके घर वालों ने कहा, ‘उसके साथ मत बैठना वो तो उल्टी-सीधी राह दे देगा तुम्हें।‘

आचार्य जी, आपने समझाया था कि बच्चे नहीं करो या एक करो तो मैंने सोचा अच्छा चलो ठीक है, अब शादी तो हो गया लेकिन बच्चा तो एक ही करूँगा। मैंने दो साल तक नहीं किया बच्चा तो हमारा माहौल ऐसा है कि मुझसे पूछा जाता था कि ‘बताओ, हो रहा है या तुमसे हो ही नहीं रहा है?’ तो ऐसा लगता है कि मैं ये कहाँ फँस गया हूँ, मैं अपनी समझ से काम तक नहीं कर सकता। मैंने आपसे सीखा था कि किसी बच्चे को पढ़ाऊँगा या किसी दूसरे बच्चे को गोद ले लूँगा पर ये समाज करने ही नहीं देता। तो कई बार लगता है कि हमारा रिमोट इनके हाथ में है या हमारा अपना भी कुछ है। मैं अपने-आपको फँसा हुआ महसूस करता हूँ, अब समझ नहीं आता, इन सब चीज़ों से कैसे बाहर निकलूँ?

आचार्य: इसका क्या जवाब दूँ अब, मुझे भी मालूम नहीं।

प्र२: आचार्य जी, अब आप ही से उम्मीद है बस।

आचार्य: मुझे बस एक तरह की थकान का अनुभव होता है, जब मैं पूरा ये दुर्घटना स्थल का विवरण सुनता हूँ – इतना कुछ फैल गया हो, जिसको अब बटोरना-समेटना बड़ा श्रमसाध्य है। तुम ऐसे अपने-आपको बरी किए ले रहे हो कि ‘मैं चाहता नहीं था मेरी शादी हो गई, फिर बच्चा हो गया। मैं चाहता नहीं था मुझे दुकान पर बैठा दिया, ये-वो।‘ ऐसे थोड़े ही होता है, इतना थोड़े ही कोई मासूम होता है कि उसके साथ ये सब चीज़ें हो जाएँ।

प्र२: आचार्य जी, आपसे मिलने के बाद ये चीज़ें क्लियर (स्पष्ट) हुई हैं।

आचार्य: तो मत मिलो। क्या कर सकते हैं अब। फिर तो समस्या ये नहीं है कि जैसे ज़िंदगी जी रहे हो, फिर तो समस्या ये है कि मुझसे मिल लिए।

अब क्लियर हो गया तो, क्या बताऊँ उसमें तुम्हें?

नहीं तो ये तो बहुत छोटी बातें हैं कि ‘तुम रामजी से बड़े हो गए कि रामजी ने शादी की थी, तुम नहीं करोगे?’

नहीं, हम उनसे छोटे हैं, इसलिए नहीं करेंगे। वो रामजी थे इसलिए कर सकते थे, हममें उनके जैसी परिपक्वता नहीं है। वो शादी करके भी रामजी बने रह पाए, हम शादी करेंगे तो राम से दूर हो जाएँगे, हम इसलिए नहीं करेंगे। लो हो गया तर्क का उत्तर। ‘तुम राम से बड़े हो कि तुम नहीं करोगे?’ ‘नहीं, हम राम से छोटे हैं इसलिए नहीं करेंगे; जिस दिन राम हो जाएँगे, हम भी कर लेंगे।‘ आप यही कह रहे हो न कि राम के आदर्श का पालन करो, तो हम भी जिस दिन राम जितने बड़े हो जाएँगे, हम भी कर लेंगे। अभी हम तैयारी कर रहे हैं, हम राम जैसे हो जाएँ, फिर करेंगे। आप भी हमारे साथ प्रतीक्षा करिए।

तो फिर उनको मनवा लो, मैं इसमें क्या बोलूँ तुमको? जब तुम्हारे लिए यही सबसे बड़ा मूल्य है कि माँ-बाप को मनवाना है तो उसका फिर कोई उत्तर नहीं हो सकता। जिसके लिए सत्य और मुक्ति से ज़्यादा बड़ा कोई भी और हो गया, उसको मैं क्या जवाब दूँगा फिर? तुम भले ही बड़ी बेचारगी और बड़े उसके साथ अपना किस्सा सुना लोगे, लेकिन मेरे पास उसका कोई समाधान नहीं है न बेटा, मैं क्या करूँगा?

बच्चा हो गया है या क्या है?

प्र२: आचार्य जी, प्लानिंग (योजना) तो सिर्फ़ एक की ही करी थी, पर पता चला कि जुड़वा हैं।

आचार्य: तो ये सब मुझे क्यों बता रहे हो? मेरा इससे क्या लेना-देना, मतलब मेरा भी मूड (मनोदशा) ख़राब हो रहा है ये सब सुनकर। मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? मैं इसमें क्या कर सकता हूँ? अच्छी बात है, बधाई हो।

प्र२: आचार्य जी, मैं इस बात को नहीं मानता। लोग कहते हैं, ‘देखो थी किस्मत में ऐसी चीज़, बताओ तुम एक की कह रहे थे, दो हो रहे हैं। किस्मत बड़ी चीज़ है।‘

आचार्य: ये तो तुम्हारा ज्ञान का अभाव है न कि तुम कुछ जानते नहीं, कुछ लोग तुमसे कुछ बोल देते हैं, तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं होता, तुम बहक जाते हो। ये तो ज्ञान का अभाव है।

प्र२: अब जब मैं आपको सुनने लगा हूँ, और आपकी बातें उनके सामने रखता हूँ तो वो निरुत्तर हो जाते हैं। लेकिन मुझे सिर्फ़ इस बात का पछतावा रहता है कि मैं आपको पहले सुन नहीं पाया। और लोगों को सुनता था, आपकी भी वीडियोज़ आती थीं, पर मैं उनपर क्लिक नहीं कर पाया। शादी के बाद मैंने आपको सुनना शुरू किया तो सब साफ़ होता गया। पहले मैं पिताजी की एक-एक बात इस हिसाब से मानता था जैसे कथा वगैरह में बता दी जाती थी। अब नोक-झोंक भी हो जाती है।

आचार्य: देखिए, बाकियों के लिए सीख है, जो चीज़ें पता है कि पलटी नहीं जा सकतीं, उनको होने मत दीजिए न। बाद में मैं क्या बोल सकता हूँ? चलो शादी भी करनी थी, तो तुम थोड़ा तो कुछ उसमें विवेक रखोगे न देख-समझ कर, कि किससे कर रहे हो?

आप किसी ऐसे से कर लो कि आप कोई किताब पढ़ रहे हैं, कोई वीडियो देख रहे हैं, और वो आपसे कहे ‘अरे! इससे तुम्हें रोटी मिलेगी क्या?’ रोटी तो कृष्ण भी नहीं देंगे, तो फिर गीता भी मत पढ़ो। कोई गीता पढ़ रहा हो तो बिलकुल उससे ये तर्क मार सकते हो कि ‘कृष्ण रोटी देंगे क्या?’ ये क्या तर्क है? इसका कोई जवाब हो सकता है? कोई इसका जवाब नहीं है। ये तो पशुओं की बोली जैसा है; हम यहाँ बातचीत कर रहे हैं, कोई पशु यहाँ आकर कुछ बोलने लग जाए, तो हम उसको उत्तर देंगे क्या? इसका तो क्या उत्तर है? कोई उत्तर नहीं है।

घरवालों ने यही तो कहा था शादी कर लो, या कहा था कि यूँ ही कर लो बस, किसी से भी?

प्र२: वो तो गाँव में गाँव के रीति-रिवाज़ से उन्होंने करा दी।

आचार्य: रीति-रिवाज़ से शादी की प्रक्रिया होती है, विधान होता है; लड़की भी रीति से आ जाती है? वो तो चुनी जाती है न, या ये भी रीत है कि चुननी नहीं है?

प्र२: उस समय तो देखने को भी जाने नहीं दे रहे थे। वही था प्राचीन, वही आदर्श थे।

आचार्य: तुम किस युग से आए हो? मुझे लग रहे हो त्रेता युग से अवतरित हो।

(श्रोतागण हँसते हुए)

हम बच्चे थे तब करते थे ऐसे। ये आदर्श क्या है? ये आदर्श नहीं है, ये आदा-पादा है। जिसपर रुक गया – जैसे राणा जी के बेटी ने पादा, टाय टुई फुस, बस इससे शादी हो जाएगी।

तुम लाचारगी अपनी व्यक्त कर रहे हो, अब मैं उसमें क्या करूँ? अभी उनको बोला मैं कि कुछ ऐसा नहीं बोलना चाहिए जिससे अपना ही बल कम होता है। तुम लगातार अपनी बेचारगी की कहानी सुना रहे हो। ‘मैं दुर्बल हूँ, मैं क्या करुँ? मैं दुर्बल हूँ, मैं क्या करूँ?’ तुम दुर्बल हो, तो मैं क्या करूँ?

प्र२: दुर्बल की बात नहीं है आचार्य जी। मैं कह रहा था कि ये जो धर्मकथा वाले हैं...

आचार्य: तो मैं उनका क्या करूँ? वो अपना काम कर रहे हैं, मैं क्या कर सकता हूँ?

प्र२: क्योंकि सत्य तो अब मैं जान चुका हूँ न, तो इसी हिसाब से उनको भी तो ये चीज़…

आचार्य: तो जो सत्य जान जाता है, उसको किसी और के फिर सत्यापन की नहीं ज़रूरत होती है। सत्य स्वयं सत्यापन माँगेगा क्या? अगर सत्य जान गए हो, तो फिर सत्य से पूछ लो क्या करना है, सत्य बता देगा तुमको।

प्र३: जो अध्ययन सामग्री हमें कल भेजी गई थी उसमें ज़्यादातर ये कहा गया था कि कर्तव्य आपका आपको कोई नहीं बता सकता, गुरु भी नहीं। पर गीता में कृष्ण अर्जुन को हमेशा बता रहे हैं कि युद्ध करना उसका कर्तव्य है। तो हम किसको ढूँढें?

आचार्य: अर्जुन के युद्ध करने या न करने से सिर्फ़ अर्जुन का हानि-लाभ हो रहा होता तो कृष्ण भी अर्जुन को बहुत ज़ोर नहीं लगाते, इतना धक्का नहीं देते। ये बिलकुल एक सिद्धांत है कि शिष्य की मुक्ति के लिए आवश्यक है कि उसे उसका कर्तव्य स्वयं निर्धारित करने दिया जाए। गुरु का काम है रौशनी डालना, जहाँ अंधेरा है उसको प्रकाशित कर देना। अब जब प्रकाश हो गया है, दिखने लग गया है कहाँ क्या रखा है, किधर क्या रास्ता है, तो किधर जाना है, कैसे जाना है, ये सब देखना शिष्य का काम होता है।

गुरु का काम होता है – प्रकाश; 'मैंने प्रकाशित कर दिया है, अब तुम देखो'। लेकिन अभी अर्जुन की जो हालत है उसमें अगर वो कुछ उल्टा-पुल्टा कर लेता है तो उसका असर पड़ना है बहुत ज़्यादा लोगों पर। इसलिए कृष्ण को इतना हठ, और इतना आग्रह और इतना प्रयत्न करना पड़ रहा है। नहीं तो आमतौर पर उसकी कोई आवश्यकता होती नहीं है विशेष। अगर स्थिति ऐसी हो रही है न आपकी कि किसी और को आकर आपको बताना ही पड़ जाए बिलकुल ज़मीनी तौर पर कि क्या करो, क्या न करो, तो ये आपातकाल का लक्षण है।

कोई भी आपका शुभचिंतक कभी भी आपके ऊपर इतना अधिकार नहीं रखना चाहेगा कि वो आपको आपका कर्तव्य पथ ही बताए। वो एक तरह का सूक्ष्म प्रबंधन हो जाता है। सामने वाला अगर आपका शुभचिंतक है तो उतना नहीं करना चाहेगा। हाँ, अब उसको दिखने ही लगे कि अगर उसने बताया नहीं तो आप सीधे जाकर गड्ढे में ही गिरोगे, तो फिर वो हो सकता है कि एक बारगी आपको रोक दे, बता दे।

अर्जुन को भी अर्जुन के जीवन के अन्य चौराहों पर थोड़े ही कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था। पर अभी स्थिति कुछ ज़्यादा विकट है, विकराल है, और उसका प्रभाव बहुतों पर पड़ना है। इसलिए इतना स्पष्ट करके बताना पड़ रहा है कि लड़ ही जाओ।

वेदान्त कहता है, ‘जानो!’ जानने पर ज़ोर है। और आगे की बात ये कही जाती है कि एक बार जान गए तो ये भी जान जाओगे कि करना क्या है। वो कहता है अभी स्थिति क्या है, तथ्य क्या है, यथार्थ क्या है, संसार और मन क्या है – ये जानो। एक बार ये समझ गए तो ये बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा कि आगे करना क्या है। तो वेदान्त में ये आमतौर पर होता नहीं है कि किसी भौतिक समस्या का, विशिष्ट प्रकार की समस्या का कोई विशेष, पर्टिकुलर समाधान बताया जाए, न।

बताने वाले का आनंद भी इसी में है कि आपको कम-से-कम बताना पड़े। या आपको इस तरह से बता दिया जाए कि आगे आपकी पूछने की ज़रूरत कम हो जाए। समझ रहे हो? जो आपको बता रहा है, वह चाहता है कि आपको कुछ इस तरह से बता दे कि आगे बहुत पूछना ही न पड़े आपको।

उदाहरण के लिए अब वो वहाँ क़ैद में था, जिसको आप वेदान्त में गुरु कहेंगे उसका काम ये बताना नहीं है कि किस तरह से जब हवलदार अंदर आएगा तो उसको पीछे से ऐसे पकड़ लेना, फिर उसको गिरा कर उससे बंदूक छीन लेना, और फिर उस बंदूक से कैसे अपनी बेड़ियाँ तोड़ लेना, और फिर कैसे उस तार से लटक कर भाग जाना। गुरु का काम ये नहीं होगा, गुरु का काम होगा उसको ये बताना कि 'तुम बंधन में हो और ये तुम्हारी नियति नहीं है।' उसके भीतर मुक्ति के लिए एक गहरी चेतना और गहरी अभीप्सा पैदा कर देना – ये गुरु का काम है। अब वो कैसे करना है, ये तू जान पट्ठे! तू जवान आदमी है।

सोचो, कोई गुरु आया हो वहाँ पर, कोई ऋषि हो, और वहीं उसको बुलाया गया, जेलों में भी बुलाते हैं प्रवचन देने को। अब वो बेचारा इन चीज़ों का थोड़े ही माहिर है कि बता पाएगा कि जेल तोड़ कर भागने के तरीक़े क्या होते हैं। उसमें उसकी कोई विशेषज्ञता है ही नहीं। हाँ, वो तुम्हारे भीतर एक भूचाल पैदा कर सकता है, ये उसका काम है। आगे का तुमको देखना है।

अजीब नहीं लगता इस गाने में कि एक बूढ़ा ऋषि है, वो अमिताभ बच्चन को अपने कंधे पर बैठा कर जेल से बाहर भाग रहा है? (श्रोतागण हँसते हैं)

कहे, ‘गुरु हैं, तो मुक्ति दिलाना गुरु का काम है न!’ तो ऋषि वशिष्ठ अंदर गए हैं, और अमिताभ भाई को गोदी में उठाया है, और फिर कह रहे हैं, ‘अपने शिष्य को मुक्ति दिलाने के लिए ले जा रहा हूँ।‘ अच्छा नहीं लगेगा न?

प्र४: नमस्कार आचार्य जी। जैसे अभी बात कर रहे थे कि चेतना का उठना; शिखर पर पहुँचते हैं तो कुछ अभाव होता है इसमें। मैं अपने तजुर्बे के साथ, मेरे साथ जो हुआ उसको रिलेट (संबंधित) करके आपको बताना चाहता था। दो साल पहले मैंने एक ऑनलाइन शिविर अटेंड किया था, वो कोविड के दौरान था। उसमें मैंने कुछ लिखित रूप में सवाल पूछे थे, और जैसे ही उसका जवाब आया तो मुझे लगा कि पूरा नहीं जवाब मिला, कुछ स्पष्ट नहीं हुई बात। तो भीतर बड़ा अनरेस्ट (अशांति) जैसा महसूस होने लग गया, बेचैनी-सी थी। और उसके हफ़्ते बाद मुझे न कुछ ऐसा महसूस हुआ कि मेरा घर पर किसी के साथ बात करने का मन नहीं हो रहा था। उनकी बातें मुझे अजीब-सी लग रहीं थी। सोशल मीडिया की बात करूँ तो वो भी नहीं देख सकता था जैसे रील्स या गानें और जो भी चीज़ें हैं, वो भी अजीब-सी लग रहीं थी।

तो मैं जानना चाहता था कि क्या सच में कुछ हुआ था मेरे साथ या ये मेरा भ्रम मात्र है? और उसके बाद जैसे मैं थोड़ा डर गया था, वो जो स्थिति आयी थी। उसके बाद अगले शिविर में भी मैं थोड़ा डर रहा था सवाल पूछने में। कुछ ऐसा लगता है कि मेरी कुछ प्रोफेशनल एंबीशंस (व्यावसायिक महत्वाकांक्षाएँ) भी थीं, अभी भी हैं। उस समय मैं बेरोज़गार था, बाद में मेरी अच्छी जगह नौकरी भी लग गई, मज़ा आने लगा काम में। पर कहीं-न-कहीं मैं वो अनुभव के साथ रिलेट करके देखता हूँ जैसे अध्यात्म में आने से वो चीज़ें छूट रही हैं। जो चेतना उठी थी उसके कारण...

आचार्य: बता कम रहे हो, छुपा ज़्यादा रहे हो। जो बात बिलकुल सीधी है, ज़मीनी है, वो बताओ न। अभी क्या समस्या है?

प्र४: आचार्य जी, समस्या ये है कि वो जो अनुभव था, वो क्या था? वो मात्र भ्रम था मेरे लिए?

आचार्य: मन होता है न, सारे अनुभव तो मन के होते हैं, तो इसमें क्या?

प्र४: ठीक है, तो आचार्य जी, ऐसा होता है कि जैसे मैं कुछ पढ़ भी रहा हूँ आध्यात्मिक कोई चीज़ या यूट्यूब पर भी आपका लेक्चर (भाषण) सुन रहा हूँ, तो कई बार ऐसा लगता है कि मेरी कुछ कैरियर वाइज़ एंबिशंस हैं और आप समझाते हैं कि त्याग ज़रूरी है, निर्मोह होना पड़ता है। तो कई बार मुझे ऐसा लगता है कि क्या मैं ये चीज़ कर पाऊँगा? क्योंकि मुझे अपनी नौकरी में काफ़ी मज़ा आता है, फिर मुझे ये लगता है कि अध्यात्म में कहीं ग़लती से तो नहीं आ गया?

आचार्य: क्या काम करते हो?

प्र४: एजुकेशन (पढ़ाई) में एक एनजीओ है, मैं उसमें काम करता हूँ।

आचार्य: तो शक क्यों होता है कि ग़लती से तो नहीं आ गए?

प्र४: क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि कुछ प्रोफेशनल एंबीशंस हैं। तो अध्यात्म बड़ा विपरीत मालूम पड़ता है।

आचार्य: प्रोफेशनल एंबीशंस क्या हैं?

प्र४: यही कि उसमें आगे बढ़ना है।

आचार्य: तो उसमें बुराई क्या है? काम अच्छा कर रहे हो अगर, सही काम चुना है तो उसमें आगे बढ़ने में क्या बुराई है?

प्र४: पर इसमें लगता है कि मेरे अहम् की पूर्ति हो रही है इससे।

आचार्य: हो तो रही ही है, पर अगर काम ठीक कर रहे हो तो बढ़ते चलो। जब ऐसे हो जाओ कि अब निस्वार्थ भाव से कर सकते हो, तब बिना पदवी और पैसे के भी कर लेना। प्रोफेशनल एंबीशन दो ही चीज़ों की तो होती है – पदवी बेहतर हो जाएगी, और पैसा बेहतर मिलेगा।

अब तुम बेहतर पैसे और बेहतर डेज़िगनेशन (पदवी) के साथ कोई घटिया काम करो, उससे तो बेहतर ही हालत में हो कि अभी ठीक काम कर रहे हो और उसके बदले में पैसा चाह रहे हो या तरक्की चाह रहे हो। कर लो, यही कर लो।

देखो, भीतर से जैसे हो न, तुम्हारा काम उससे बहुत ऊपर का तो हो नहीं सकता। तो काम को लेकर तुम्हारा रवैया बेहतर होता जाएगा जैसे-जैसे तुम भीतर से बेहतर होते जाओगे। उससे पहले ये उम्मीद रखना कि भीतर से तो मैं वैसे ही रहूँगा पहले जैसा और काम के क्षेत्र में मैं बहुत सुगढ़, आध्यात्मिक व्यक्ति बन जाऊँगा – ऐसा नहीं हो पाता। तो अभी के लिए पर्याप्त है कि काम तुमने ठीक चुना है – मैं उम्मीद कर रहा हूँ ठीक काम चुना है। ठीक काम चुनकर के अगर उसमें तुम एंबीशन रखते हो, तो ठीक है।

प्र५: आचार्य जी, नमस्कार। कुरुक्षेत्र में जो गीता की प्राप्ति की बात है, वो न तो सत्यवादी युधिष्ठिर को हो पाया, न ही बलशाली भीम को हो पाया और न ही कुटिल दुर्योधन को हो पाया; गीता सिर्फ़ और सिर्फ़ अर्जुन को ही प्राप्त हो पायी। तो इससे ये बात स्पष्ट है कि यदि गीता चाहिए तो हमें पहले अर्जुन बनना पड़ेगा।

तो आचार्य जी, अपने जीवन को देखकर ये कैसे सुनिश्चित करें कि अभी हम अर्जुन हैं कि नहीं? और अगर ये पता चले कि अभी हम अर्जुन नहीं हैं तो फिर आगे कर्म कैसा हो ताकि हम अर्जुन बन पाएँ?

आचार्य: अर्जुन सभी होते हैं। अर्जुन कौन है? जिसके एक तरफ़ धर्म है और एक तरफ़ मोह है। अर्जुन के एक तरफ़ धर्म है और दूसरी तरफ़ मोह है, अतीत है, भय है; वो तो सबके लिए होता है। सब अर्जुन हैं, तो गीता सबके लिए होती है। हाँ, कुछ हैं जो इस संघर्ष में उतरना चाहते हैं और कुछ हैं जिन्होंने उतरने से पहले ही घुटने टेक दिए हैं। अर्जुन को अभी निर्णय करना है; जिसको निर्णय करना अभी शेष है, वो अर्जुन है। जिसने पहले ही तय कर लिया है कि मुझे नहीं लड़ना, वो अर्जुन नहीं है।

गीता तुम्हारे काम तब आएगी न जब निर्णय की स्थिति हो? एक आपको निर्णय करना है कि लड़ाई करनी है या नहीं करनी है, तब तो आप गीता से मार्गदर्शन ले सकते हो कि क्या करना चाहिए? हममें से ज़्यादातर लोग अर्जुन तो हैं, पर ऐसे अर्जुन हैं जिन्होंने कृष्ण से पूछे बिना ही मैदान छोड़ दिया है। पूछा भी नहीं कृष्ण से, कुरुक्षेत्र उपस्थित था। उन्होंने कहा, ‘नहीं भईया, मोह ज़्यादा बड़ा है, अतीत, रिश्ते-नाते, ये सब ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं, हम किसी से नहीं पूछेंगे, हम कुरुक्षेत्र से भाग रहे हैं।‘ भागो नहीं तो तुम भी अर्जुन हो।

प्र५: तो आचार्य जी, कभी-कभी ये होता है कि अपनी वृत्तियों से हार गए, लेकिन फिर से कुछ समय बाद खड़े हो पाने की हिम्मत रहती है। तो इससे कैसे सुनिश्चित करें कि कुछ कमियाँ हैं या फिर कुछ और चीज़ें हैं?

आचार्य: फिर से खड़े हो जाओ, सुनिश्चित क्या करना है? एक बार हार गए थे अतीत में, उसको तो बदल नहीं सकते; अभी निर्णय की घड़ी है, फिर से ठीक निर्णय लो।

प्र५: तो अगर लड़ पा रहे हैं तो इसका मतलब गीता की पात्रता रखते हैं?

आचार्य: हाँ, अगर पहले से ही तय नहीं कर बैठे हो कि भाग जाना है, तो अर्जुन तो हो ही, फिर गीता तुम्हारे काम आएगी। गीता माने क्या? कृष्ण की सुनने को गीता कहते हैं। जिसे कृष्ण की नहीं सुननी, जो और सब आवाज़ों को ज़्यादा सुनता है – इसने ये बोल दिया, उसने बुला लिया, उसकी आवाज़ आ गई – जिसके लिए और दस चीज़ें ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं गीता उसके लिए नहीं है, बात ख़त्म।

अर्जुन सुन रहे हैं किसी की बात? सब भाई-बिरादर वहीं मौजूद हैं, किसी की बात सुन रहे हैं क्या? उस क्षण में चाहे युधिष्ठिर आ जाएँ, चाहे भीम आ जाएँ, चाहे द्रौपदी आ जाएँ, कुन्ती आ जाएँ; अर्जुन क्या बोलेंगे? ‘अभी व्यस्त हैं, अभी कुछ महत्वपूर्ण चल रहा है, आप लोग कृपया प्रतीक्षा करें, दूर रहें।‘

गीता उसके लिए है जिसे कृष्ण की आवाज़ सुननी है। और जिसको अभी दूसरी आवाज़ों से बड़ा रिश्ता रखना है, जिसके लिए दूसरी आवाज़ें बड़ी महत्वपूर्ण हैं कि फ़लाने ने ये बोल दिया, ढिमकाने ने ये बोल दिया। ‘अरे! उसने बोल दिया तो अब हम क्या करें? गीता उसके लिए है ही नहीं।

प्र६: प्रणाम, आचार्य जी। दूसरी कक्षा में पढ़ता हूँ। मेरा ये प्रश्न था कि जो तीसरा अध्याय है कर्मयोग, वो क्या है? और दूसरा ये था कि करुणा क्या है?

आचार्य: कर्मयोग का मतलब है कि टॉफी रखी है और सेब रखा है, और मम्मी ने कहा कि – मम्मी क्या बोलती है, टॉफी खाओ या सेब खाओ?

प्र६: सेब।

आचार्य: तो सेब खाना है भले ही उसमें उतना स्वाद न आए। जो सही है वो करना है भले ही उसमें स्वाद न आए। समझ गए? क्या समझे?

प्र६: कि जो सही है वही करना है।

आचार्य: टॉफी रखी है, सेब रखा है, और मम्मी ने क्या बोला है?

प्र६: सेब खाना है।

आचार्य: तो हमें क्या करना है?

प्र६: सेब ही खाना है।

आचार्य: और जब सेब खाओ तो कैसा लगता है?

प्र६: स्वाद नहीं आता।

आचार्य: अच्छा। और टॉफी खाओ तो कैसा लगता है?

प्र६: अच्छा लगता है।

आचार्य: और ज़्यादा अच्छा लगता है। फिर भी अगर मम्मी ने बोला है कि हमें सेब खाना है तो हमें?

प्र६: सेब खाना है।

आचार्य: और सोचना नहीं है कि कैसा लग रहा है, या क्या है; बोला है तो बस बोला है। सेब तो सेब!

समझे?

अच्छा! टीचर ने बताया है कि अच्छे बच्चे सच बोलते हैं कि झूठ बोलते हैं?

प्र६: सच।

आचार्य: सच बोलते हैं। ठीक है। अब मान लो आपने क्लास में कुछ तोड़ दिया है। क्या तोड़ दिया है, उदाहरण के लिए? क्लास में कोई ऐसी चीज़ होती है जो टूट सकती है हमसे? एक ही चॉक रखा था, और वो आपने तोड़ दी। तो टीचर ने गुस्सा होकर कहा, ‘किसने तोड़ दी?’ और आपको दिख रहा है कि टीचर क्या हो चुकी है?

प्र६: गुस्सा।

आचार्य: तो भी अपने को क्या करना है?

प्र६: बता देना है।

आचार्य: बता देना है कि मैंने तोड़ दी। अब उससे क्या नतीजा आएगा, ये नहीं सोचना है। सच बोलना है तो?

प्र६: बोलना है।

आचार्य: नतीजा क्या आएगा, ये?

प्र६: नहीं सोचना है।

आचार्य: नहीं सोचना है। ठीक है? हमें कैसा लग रहा है सेब खाते वक़्त, ये भी नहीं सोचना है। सच बोलते वक़्त नतीजा क्या आएगा, ये भी नहीं सोचना है। ये कर्मयोग है – जो ठीक है, बस उसको कर दो। अभी करोगे तो पता चलेगा कि कर्मयोग क्या है।

(अब) करुणा क्या है?

आपके घर के आस-पास कुत्ते होंगे न?

प्र६: हैं।

आचार्य: तो उनसे कोई फ़ायदा तो मिल नहीं सकता हमें! ऐसे ही हैं, स्ट्रीट डॉग्स (गली के कुत्ते)। उसके बाद भी उसमें से अगर किसी को चोट लगी है तो मम्मी को बता देना है। बता देना है कि वहाँ पर वो कुत्ता है, उसको चोट लगी हुई है। या अगर कोई दिखे कि वो भूखा है, तो भी बता देना है कि वो भूखा है, उसको बिस्किट या ब्रेड खिला देते हैं या रोटी दे देते हैं। और अगर अपने साथ का कोई हो, अपना कोई दोस्त, वो उसको पत्थर मार रहा हो, तो उसको क्या बोलना है?

प्र६: नहीं मारो।

आचार्य: मत मारो। बहुत अच्छे, बस इसे ही करुणा कहते हैं। देखो सारे तुमको उदाहरण मम्मी से रिलेटेड (सम्बंधित) दिए हैं, और उन्होंने सुन भी लिए हैं। अब टॉफी का क्या होगा? नहीं सोचना है, यही कर्मयोग है।

प्र७: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, जैसे कृष्ण जी ने बोला था ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ – जब-जब पाप होगा… ये सब, तो जो स्लॉटर हाउसेस (कसाईख़ाना) हैं, वो तो अबाउट हंड्रेड इयर्स (क़रीब सौ साल से भी अधिक) से भी ऊपर चल रहे हैं। जब कृष्ण जी का टाइम था उस समय भी स्लॉटर हाउसेस , मतलब ऐसे काम होते थे। ही डिड नॉट कंसीडर इट एस अ अधर्म ऑर… व्हाई ही डिड नॉट स्पीक समथिंग ऑन दैट? (उन्होंने इसे अधर्म नहीं समझा? या उन्होंने इसपर कुछ बोला क्यों नहीं?)

आचार्य: पूरी गीता उसी पर तो है। अभी बोल रहा था न, छोटे-छोटे विशिष्ट कर्म क्या होंगे ये बताना नहीं गुरु का काम होता। निष्काम कर्म, अहिंसा, करुणा – ये सब एकसाथ चलते हैं। जो गीता को समझ गया उसमें अहिंसा, करुणा अपनेआप आ जाते हैं।

प्र७: सो व्हाई ऑनली वन आचार्य प्रशांत, नॉट मैनी? (तो आचार्य प्रशांत सिर्फ़ एक ही क्यों, बहुत सारे क्यों नहीं?)

आचार्य: स्वागत है, आप भी बनिए। इसमें ये नहीं पूछना चाहिए कि ‘क्यों?’ इसमें ये कहना चाहिए कि यदि कोई चीज़ आवश्यक है तो उसको करेंगे। अगर आपको लगता है कि औरों की भी ज़रूरत है, तो फिर औरों को खड़ा होना चाहिए, बनना चाहिए।

ये वही प्रश्न है जो आज सुबह किसी ने पूछा था कि ‘माया है ही क्यों?’ बात चल रही थी न? क्यों एक ही है, उसमें ये भी प्रश्न पूछना ज़रूरी है कि ‘क्या एक ही है?’ ये भी तो हो सकता है कि और बहुत हों, और बेहतर हों, बस हम जानते न हों। फिर भी अगर ये लगता है कि कम हैं, तो फिर उनका सृजन होना चाहिए। आप अभिभावक हों तो अपने घरों में निर्माण करिए, आप शिक्षक हों तो अपने छात्रों में निर्माण करिए। आप जो भी हों, आप स्वयं में निर्माण करिए सबसे पहले। है न?

प्र८: नमन आचार्य जी। मैं लगभग आपको दो साल से सुन रहा हूँ। काफ़ी स्पष्टता मिली है, आपको सुनने में मुझे बहुत मज़ा आता है। मेरा प्रश्न ये है कि सुख और आनंद के बीच अंतर क्या है?

आचार्य: अहंकार अपने-आपसे बड़ा परेशान रहता है। हम अपने-आपसे बहुत परेशान रहते हैं। उस परेशानी को थोड़ी देर के लिए भूलने का नाम सुख है; और इस परेशानी को मिटाने का नाम आनंद है। हम दुख में रहते हैं, दुख को बेहोशी के किसी उपाय से थोड़ी देर के लिए कम कर देना सुख है। और दुख की जड़ पर जाकर दुख को मिटा ही देना – मूल दुख को – आनंद है।

प्र८: मतलब उसकी जो पूरी प्रक्रिया होगी, वो…?

आचार्य: दोनों की प्रक्रिया बिलकुल अलग-अलग होती है। लेकिन दोनों कई बार एक जैसे लगते हैं क्योंकि दोनों में एक समानता होती है। सुख में और आनंद में समानता ये होती है कि दोनों में दुख का अभाव प्रतीत होता है। पर सुख के क्षण में जब दुख का अनुभव नहीं होता, तो वो बात अस्थायी होती है। थोड़ी देर के लिए दुख प्रतीत नहीं हो रहा है, पर वो वहीं पर है। पीछे है या आसपास है, सुख की छाया में छुपा बैठा है। सिक्के के दूसरे पहलू की तरह है, सामने है पर पीछे है। तो सुख इसीलिए दुख को अपने साथ लिए रहता है हमेशा।

सुख और दुख को इसीलिए जानने वालों ने कहा है, ‘ये एक ही हैं, इनको अलग मानना गड़बड़ है।‘ लेकिन साथ-ही-साथ उन्होंने ये भी कहा है कि ‘आपके लिए कोई आवश्यक नहीं है कि आप जीवन दुख में बिताओ।‘ दुख बिलकुल हटाया जा सकता है, लेकिन उसका उपाय सुख नहीं है। दुख यदि एक बीमारी है, तो उसका इलाज सुख नहीं है। दुख यदि एक बीमारी है तो उसका इलाज आनंद है। सुख सस्ती चीज़ है, आसानी से मिल जाती है; आनंद मूल्य माँगता है, श्रम माँगता है।

प्र८: मतलब उसके लिए ग्रंथों का अध्ययन करना पड़ता है?

आचार्य: ग्रंथों का अध्याय करना पड़ता है और ज़िंदगी में निर्णय करने पड़ते हैं, श्रम करना पड़ता है, बहुत सारी चीज़ें छोड़नी पड़ती हैं। जो पाने लायक है उसे पाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। तो आनंद असली चीज़ है। पर जो कुछ भी असली होता है वो एक कीमत रखता है न। और ज़्यादातर लोग वो कीमत देना नहीं चाहते, वो सुख से ही संतुष्ट हो जाते हैं। सुख एकदम सस्ता है।

प्र८: क्या ये कहना उचित होगा कि जो सुख-दुख में ना बदले वो आनंद है?

आचार्य: बहुत बढ़िया, बहुत अच्छे।

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