अथ व्यवटस्थतान्दृष्टवा धातकराष्ट्रान्कटपध्वजः | प्रवृत्तेशस्त्रसम्पातेधनुरुद्यम्य पाण्डवः | हृषीकेशंतदा वाक्यटमदमाह महीपते || १, २० ||
सेनयोरुभयोमकध्येरथंस्थाप्य मेऽच्श्यतु | यावदेताटन्निरक्षेऽहंयोद्धुकामानवटस्थतान् || १, २१||
हे राजन! इसके बाद कपिध्वज ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषिकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा – हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, श्लोक २०-२१
कै मकया सह योद्धव्यमटस्मन्रणसमुद्यमे|| १, २२ ||
और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध व्यापार में मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, श्लोक २२
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आज जब इसका स्वाध्याय कर रहे थे तो श्लोक संख्या २० में अर्जुन को ‘कपिध्वज’ विशेषण से पुकारा गया है। और पहले ही अध्याय के श्लोक २२ में अर्जुन कहते हैं कि दोनों सेनाओं के बीच में रथ खड़ा कीजिए जिससे मैं दोनों सेनाओं का निरीक्षण कर सकूँ। उस श्लोक में कहते हैं कि "...इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए।" तो युद्ध का व्यापार और कपिध्वज का क्या आशय है?






