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अपनी सच्चाई जानने के तरीके
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
24 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्र से पहले आपसे जो बात हुई थी उसमें आपने कहा था कि जो उपनिषदों के श्लोक हैं, उपनिषदों में जो बात कही जाती है, आप उसको तथ्य की तरह देख पाते हैं; मगर हमारे लिए तो ये एक सिद्धांत की तरह है। और वैसे ही, हमारी बात जब चेतना के ऊपर हुई थी, कि हमारा वास्तविक स्वरूप जो है वो चेतना है, तो उसमें आप ने ये कहा था कि “निरंतर अभ्यास से ही ये बात अपने अंदर बैठ जाती है कि आपका स्वरूप जो है, वास्तव में चेतना ही है।" तो ये एक तरीके से एफर्मेशन (अभिपुष्टि) से कैसे अलग है ये? वैसा ही कुछ तो नहीं है?

आचार्य प्रशांत: नहीं एफर्मेशन नहीं है, प्रयोग है।

एफर्मेशन तो होता है कि तुमने कोई निष्कर्ष बस मान लिया है और तुम उसे बार-बार दोहरा रहे हो, वो तो कंडीशनिंग (अनुकूलन) हो गई। ये प्रयोग है; कि बार-बार, बार-बार कोई प्रयोग करा, भले ही वो प्रयोग तुम्हारी वृत्तियों के कितना भी विरुद्ध हो, भले ही वो काउंटर इंट्यूटिव (वृत्तियों के विरुद्ध) क्यों न हो, पर इतनी बार वो प्रयोग करा कि अंततः वो प्रयोग बिलकुल मन में जम गया। तरीके-तरीके से अपने आपसे पूछा, कि, “शरीर हूँ मैं कि चेतना हूँ मैं?” दिन में सौ-बार पूछा। और ऐसे नहीं पूछा कि पहले ही उत्तर पता है; कि पूछूँगा और फिर कहूँगा, “मैं तो चेतना हूँ," ऐसे नहीं। बिलकुल पूर्वाग्रह-रहित होकर के पूछा, “अच्छा! कौन हूँ मैं? चलो एक नया प्रयोग करके देखते हैं।"

चलो अभी एक नया प्रयोग करके देखते हैं, ठीक है? कहीं दर्द हो रहा है शरीर में?

प्र: हाँ, पीठ में।

आचार्य: पीठ में दर्द हो रहा है। बाकी अंगों का ख़्याल क्यों नहीं आ रहा? अगर तुम शरीर हो तो तुम्हें शरीर के सारे अंग एक-साथ अनुभव होने चाहिए न? तुम्हें सिर्फ पीठ का ही अनुभव क्यों हो रहा है?

प्र: क्योंकि उसमें पीड़ा है।

आचार्य: बात ये नहीं है कि पीठ में क्या है, बात ये है कि पीठ में कौन-सी चीज़ है जो अनुभव ले रही है। ये मत बोलो, “पीठ में पीड़ा है।“ मैं कहूँगा, “पीठ में चेतना है।" तुम्हारी चेतना जाकर के पीठ में चिपक गई है इसलिए पीठ का अनुभव हो रहा है। तो शरीर पहले आ रहा है या चेतना पहले आ रही है?

प्र: चेतना।

आचार्य: चेतना ही तुम्हें शरीर का एहसास करा रही है न? अगर शरीर में ही बहुत सामर्थ्य होती, तो शरीर के जितने हिस्से थे सब तुम्हें अपना एहसास करा रहे होते। शरीर में कोई कुछ नहीं; शरीर तो ऐसा है जैसे ये सब कुछ पड़ा हुआ है (अपने सामने मेज पर रखे सामान की तरफ़ इशारा करते हुए) और एकदम अंधेरा है, और फिर इस पर टॉर्च की रोशनी मारी जाए। तुम्हें वही हिस्सा दिखाई देगा न जिस पर टॉर्च की रोशनी पड़ रही है?

चेतना क्या है? टॉर्च की रोशनी। शरीर क्या है? ये सब जो जड़ वस्तुएँ यहाँ पड़ी हुई हैं; वो कहने को तुम्हारी हैं, तुम्हारे ही कमरे में पड़ी हुई हैं, पर तुम्हें उनका कोई अनुभव ही नहीं होगा जब तक उन पर चेतना की रोशनी नहीं पड़ेगी। बंद कमरे में; तुम्हारा ही कमरा है, तुम्हारी ही चीज़ें हैं; बंद कमरे में जब चीज़ें पड़ी हैं तो तुम्हें उनका कोई अनुभव होता है? दृष्टि के माध्यम से? कोई होता है अनुभव?

जब उन पर क्या पड़ता है? चेतना का प्रकाश, तो अनुभव होता है। तो पहले क्या आया?

प्र: चेतना।

आचार्य: तो इस तरीके के सवाल दिन-भर पूछने होते हैं।

ये एफर्मेशन कि मैं नहीं बात कर रहा हूँ, कि तुमने अपने-आपको बिलकुल मंदबुद्धि बना करके रट लिया है, “मैं तो चेतना हूँ। मैं तो चेतना हूँ। मैं चेतना हूँ।" ये नहीं करना है; ठोस सवाल पूछने हैं, ठोस सवाल पूछने हैं और उनके तर्कयुक्त उत्तर ढूँढने हैं। और वो सारे उत्तर तुम्हें जब एक ही दिशा में जाते दिखेंगे तो तुम्हें मानना ही पड़ेगा, कि साहब...(मैं तो चेतना ही हूँ)।

और करने हैं प्रयोग?

प्र: जी हाँ।

आचार्य: चलो ठीक है!

एक दिन तुम अपने शरीर से संबंधित जितने भी नाप-जोख़ ले सकते हो ले लेना; अपना वज़न नाप लेना, अपना ब्लड-प्रेशर (रक्त-चाप) नाप लेना, अपनी हृदय- गति नाप लेना, ठीक है? तुम्हारे रक्त में ग्लूकोज़ कितना है ये नाप लेना, और दो-चार कर लेना; ये ऐसे दिन करना जिस दिन तुम्हारा कुछ काम करने का मन न हो रहा हो, उदास हो, और बिलकुल आलस भी छा रहा है। और कोई दिन तुम पकड़ना जिस दिन मन बिलकुल प्रफुल्लित है, उत्साह से भरा हुआ है; उस दिन भी शरीर से संबंधित जितने आँकड़े हैं वो भी देख लेना। और तुम्हें ये पता चले, कि मन की स्थिति में ज़मीन-आसमान का अंतर है और शरीर की स्थिति में कोई ज़्यादा अंतर नहीं; शरीर की स्थिति में एक-प्रतिशत, दो-प्रतिशत का ही अंतर है, लेकिन मन की स्थिति में ज़मीन-आसमान का अंतर है; तो तुम्हें क्या पता चला?

प्र: कि हम शरीर नहीं हैं।

आचार्य: तुमसे कोई पूछ रहा है दूसरे दिन, “कैसे हो?” तुम कह रहे हो, “बहुत-बहुत मस्त हूँ।“ पहले दिन भी पूछ रहा है, “कैसे हो?” तो कह रहे हो, “फाँसी का फंदा ढूँढ रहा हूँ।“ सब कुछ बदल गया है तुम्हारी हालत में, किसके बदलने के कारण? क्या शरीर बदला?

प्र: नहीं।

आचार्य: तो क्या बदला था? चेतना की स्थिति बदली थी न?

चेतना बदली, तुम बदल गए। चेतना के बदलने में उत्साहित होने और आत्महत्या के लिए उत्सुक होने जितना अंतर है; और शरीर? शरीर बिलकुल नहीं बदला था। अब बताओ तुम्हारा पहला संबंध फिर चेतना से है, या शरीर से है? बोलो?

प्र: चेतना से।

आचार्य: एक से एक जवान लोग जिनका शरीर बिलकुल हट्टा-कट्टा है; हट्टा ही कट्टा नहीं है, सांड जैसा सशक्त शरीर; वो क्या कर लेते हैं कई बार? आत्महत्या कर लेते हैं। क्यों? शरीर तो अच्छा था, क्या बुरी हो गई थी?

प्र: चेतना की स्थिति।

आचार्य: तो तुम्हारा पहला संबंध किससे है फिर, शरीर से कि चेतना से?

अगर शरीर से तुम्हारा पहला संबंध होता, तो शरीर इतना प्यारा है, सुंदर है, आकर्षक है, बलिष्ठ है, क्यों करी आत्महत्या? क्योंकि तुम्हारा पहला संबंध किससे नहीं है? शरीर से नहीं है। शरीर बहुत अच्छा हो तो भी तुम्हारा मन कर सकता है कि जीवन समाप्त कर दो; लेकिन चेतना अगर अच्छी है तो तुम्हारा मन कभी नहीं करेगा कि जीवन समाप्त कर दो।

तो बताओ तुम पहले क्या हो, चेतना या शरीर; क्या हो?

प्र: चेतना।

आचार्य: यही सब सवाल रोज़ पूछने होते हैं।

प्र: इस उदाहरण में हम चेतना और मन को एक जैसा ही मान रहे हैं।

आचार्य: हाँ। तुम्हारा घुटना ‘मैं' नहीं बोलता; तुम्हारी पहली पहचान ही घुटने के साथ नहीं है।

तुम कई बार कहते हो, “मेरा अपमान हो गया।" बताओ शरीर का क्या बिगड़ा है? और बहुत ज़बरदस्त चोट लगती है न? अंदर से बिलकुल मुरझा जाते हो। मेरा क्या हो गया? अपमान हो गया। बताओ शरीर का क्या बिगड़ा है? नाक पर चोट लगी है? जब कहते भी हो, “मेरी नाक कट गई, मेरा अपमान हो गया।“ नाक पर वाकई चोट लगती है क्या? नाक तो वैसे ही है, लेकिन तुम भीतर से कुम्हला गए बिलकुल; ये क्या हुआ है? कहाँ चोट लगी है? शरीर पर तो लगी नहीं। फिर भी तुम्हारी हालत इतनी ख़राब है कि तुम मुँह छुपाना चाहते हो इधर-उधर। क्या हुआ है? बोलो?

और कई दफ़े तुम शरीर पर खूब घाव खाकर भी बड़े आनंदित रहते हो। शरीर हो तुम क्या? अगर शरीर होते तुम, तो शरीर पर घाव लगने पर तो तुम्हारी हालत निश्चित रूप से ख़राब होनी चाहिए थी, पर ऐसा नहीं है। कई बार शरीर का घाव बुरा लगता है, और कई बार शरीर के घाव पर गौरव भी होता है, होता है कि नहीं?

प्र: होता है।

आचार्य: तो फिर?

शरीर से तुम्हारा संबंध ज़रुर है, लेकिन वो तुम्हारी पहली पहचान नहीं है।

बहुत भूख लगी है, कोई फेंक के खाना देदे; क्यों ठुकरा देते हो? भूख तो बहुत लगी थी। शरीर क्या बोल रहा था? “खा लो।“ तो क्यों ठुकरा दिया? और कई बार बहुत भूख लगी है, चाहे एकदम भूख नहीं लगी है, और एकदम सड़ा-गला खाना है पर किसी ने प्यार से दिया, खा लेते हो। तुम्हें पता भी है कि गंधा रहा है, दो दिन पुराना है, पर वो देने वाला इतने प्यार से दे रहा है, तुम कहते हो, “अच्छा लाओ।“ क्यों? शरीर को तो नुकसान करेगा, क्यों खा गए? शरीर ही होते तुम तो ठुकरा देते न खाना वो? पर क्यों नहीं ठुकरा देते?

इन सब बातों पर रोज़-मर्रा की ज़िंदगी में क्या रखते हैं? नज़र; इसी को मैं बोला करता हूँ, “पल-प्रतिपल जीवन का अवलोकन करते चलो।” बहुत बातें अपने-आप चलते-फिरते खुलती रहती हैं; चल रहे हो, फिर रहे हो, खा रहे हो; बातें खुल रही हैं।

प्र: यही प्रयोग अगर कोई जानवर करे अपने पर, तो जो परिणाम आएँगे, नतीजे आएँगे, वो उल्टे आएँगे।

आचार्य: भिन्न आएँगे; एकदम भिन्न हो सकता है न आएँ, पर भिन्न आएँगे।

प्र: ये मुख्य सवाल है; चेतना की जो अवस्था है वो बदलती रहती है, बदलाव ही नियम है। बदलती चेतना की अवस्था में आदमी कैसे सम रहे, या फिर कैसे एक संतुलन बनाए रखे?

आचार्य: वो तब ही हो सकता है जब दिखाई दे कि ये सारे बदलाव क्या माँग रहे हैं; देखो वरना पगला जाओगे।

अभी तुम ऊपर गए थे हिमालय पर थोड़ा-सा, और कोई दिशा नहीं होगी; उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम, जिधर को तुम्हारी गाड़ी ने मुँह न किया हो। वो जो पूरी आठ-दस घंटे की यात्रा है उसको याद करो। ठीक है? तुम जब इस एक बिंदु से चले हो और तुम्हें पहुँचना वहाँ दूसरे बिंदु पर है, तो कायदे से तो गाड़ी को निरंतर सिर्फ़ इसी दिशा में मुँह करके ऐसे बढ़ते रहना चाहिए था। लेकिन जैसे चेतना की अवस्थाएँ तुम कह रहे हो बदलती रहती हैं, वैसे ही गाड़ी की दिशा कभी यूँ भी हुई है, कभी यूँ भी हुई है, कभी यूँ हुई है, कभी यूँ हुई है; तो तुम चिल्लाने क्यों नहीं लग गए, कि, “जाना तो मुझे यहाँ है”? और गाड़ी कई बार विपरीत दिशा में चलती हुई भी दिखाई दी होगी तुम को; बिलकुल चली है, पहाड़ी रास्ता है, पूरा ऐसे जब गोल-गोल घूमेगा तो तीन सौ साठ डिग्री (अंश) घूमेगा न? हर दिशा को कभी-न-कभी गाड़ी का मुँह हो रहा है। तुमने कहा क्यों नहीं कि “दिशाएँ इतनी बदल क्यों रही हैं”? बोलो क्यों नहीं कहा?

अरे बाबा! प्रश्न समझ रहे हो?

मान लो तुम दक्षिण से चले हो, तुम्हें उत्तर को जाना है तो गाड़ी का मुँह निरंतर किधर को होना चाहिए? उत्तर को होना चाहिए। पर ये जीवन की गाड़ी है, रास्ते घुमावदार हैं; तो जाना भले ही अंततः उत्तर की ओर हो लेकिन मायावी रास्तों पर कभी उसका मुँह किधर को दिखाई पड़ता है? कभी दिखाई दे रहा है पश्चिम की ओर, कभी पूरब की ओर दिखाई दे रहा है, कभी दक्षिण-पूर्व की ओर दिखाई दे रहा है, कभी थोड़ा ऊपर आसमान की ओर भी कर रखा है मुँह; चढ़ाई आ गई है, कभी लग रहा है गोता खाने जा रही है गाड़ी, ढलान में आ गई है; ये सब क्या चल रहा है? और ये सब जो चल रहा था, इसके बीच में भी तुम सम कैसे रह गए?

समता माँगी है न तुमने प्रश्न में अपने? बताओ तुम सम कैसे रह गए?

प्र: क्योंकि मोबाइल में दिशा से दिख रहा था।

आचार्य: नहीं होता तो मोबाइल?

प्र: क्योंकि ये आश्वस्ति थी कि सही जगह ही जा रहे हैं।

आचार्य: हाँ, ये विश्वास, कि “किधर को भी घूम लूँ, मुझे मालूम है कि हर मोड़ मुझे लेकर ‘वहीं’ जा रहा है; रास्ता सही चुना है, अपनी पूरी सामर्थ्य से, पूरे बोध से रास्ता सही चुना है। अब इस रास्ते पर भी बहुत घुमाव आते हैं, मैं करूँ क्या? लेकिन जा सही रहा हूँ। बहुत अच्छा होता अगर मुझे मिल जाता सीधे उत्तर की ओर ही जाने वाला रास्ता।“ पर जीवन ऐसा है नहीं; उत्तर की ओर भी जाना है तो कभी इधर को, कभी उधर को घूम-घूमकर जाना पड़ता है। जैसे तुम पहुँचे थे कौड़ियाला; हज़ार तरीके से घूम-घाम के पहुँचे हो, ऐसे-वैसे...

समझ में आ रही है बात कुछ?

जीवन जॉमेट्रिकल (ज्यामितीय) नहीं है, कि शॉर्टेस्ट डिस्टेंस बिटवीन टू प्वाइंट्स इज़ द स्ट्रेट लाइन (दो बिंदुओं के बीच की न्यूनतम दूरी सीधी रेखा होती है), वहाँ तो चेतना के रंग बदलते रहते हैं; लेकिन समता फिर भी बनी रहेगी, शांत रहोगे बिलकुल, ठंडे, शीतल; अगर जानते हो कि निशाना तुम्हारा सही जगह है, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार वो सब कुछ कर रहे हो जो तुम्हें तुम्हारे अंत तक ले जा सकती है चीज़।

समझ में आ रही है बात?

तो चेतना के रंग बदलते रहते हैं, पर ये निश्चित कर लेना बहुत ज़रूरी है कि हर रंग माँग एक ही चीज़ को रहा है।

चेतना की दिशा बदलेगी, रूप, आकार बदलेगा; ये सब होता रहेगा, लेकिन इन सबके बीच ये सुनिश्चित करे रहो कि ये जो कुछ भी हो रहा है उसी अंत तक पहुँचने के लिए हो रहा है। कभी हल्के पड़ना पड़ेगा, कभी भारी पड़ना पड़ेगा। कभी क्रोधित होना पड़ेगा, कभी शीतल होना पड़ेगा। कभी किसी के गले लगे होओगे, कभी युद्ध की भी नौबत आ सकती है। कभी थोड़ा रुक भी जाना पड़ेगा, कभी ज़ोर से दौड़ना पड़ेगा। ये सब बदलाव बाहर-बाहर चलते रहेंगे, भीतर ही भीतर तुम सम रहोगे; क्योंकि तुमको आश्वस्ति है कि जा तो सही ही दिशा रहे हो न। और जो कुछ भी तुम कर रहे हो ये सारा नाच-गाना, राग-रंग, ये सारा कार्यक्रम, ये सारी उथल-पुथल, ये सब उपद्रव; ये हो किसकी ख़ातिर रहा है? ये मंज़िल की ख़ातिर हो रहा है।

कहीं पहाड़ तोड़ रखा है, गाड़ी रोक दी तो उतर कर जा रहे हो, और जिन्होंने गाड़ी रोक दी है उनसे कह रहे हो, “अरे भाई बहुत देर हो गई, चलो हटाओ मशीन, हमारी गाड़ी निकलेगी।" अब यात्रा में ये सब भी हो रहा है; ये सब होता रहेगा लेकिन भीतर से तुम बेचैन नहीं हो जाओगे, क्योंकि तुम को पता है कि ये बातचीत भी किसलिए कर रहे हो। मनोरंजन के लिए नहीं कर रहे हो बातचीत; क्यों गए थे बातचीत करने? दोस्त बनाना था? चाय पीनी थी? रिश्तेदारी करनी थी? क्या करना था? मंज़िल तक पहुँचना था इसलिए बात करने गए थे; ये हमेशा तय करके रखो बिलकुल, “जो कुछ भी कर रहा हूँ उसी (परमात्मा) के लिए कर रहा हूँ।“ और उसके लिए सब कुछ करना पड़ेगा, “तेरा इश्क नचावे मने थैया, थैया,” वो नचाकर रखेगा; सारे रंग जब तक तुम जीवन के देख नहीं लोगे, हर तरीके से वो तुम को परख नहीं लेगा, तब तक मंज़िल आएगी ही नहीं।

छह गियर होते हैं गाड़ी में, और सातवाँ एक और, कौन सा? रिवर्स ; वो सारे लगवा देता है, कहता है, “मेरी तरफ़ आना है तो सारे गियर तुमको लगाने आने चाहिए।“ कहीं बहुत धीरे-धीरे चलना पड़ेगा, कहीं बहुत तेज़ चलना पड़ेगा; कई बार जब आगे पहुँचे तो थोड़ा पीछे भी जाना पड़ेगा। और सामने रख दिया है स्टीयरिंग , कि इधर भी काटो, उधर मोड़ो, ये करो, वो करो; तुम्हें सब कुछ करना आना चाहिए। ये गणित का पर्चा नहीं है कि सीधे जाएँगे और घुस जाएँगे परमात्मा के घर में, धड़ाक से, नाक की सीध में जाएँगे बिलकुल; ऐसे नहीं होता है।

कुछ बात समझ में आ रही है?

सब करना पड़ेगा, पर ये नहीं करना है कि रास्ता छोड़ दिया, रास्ता नहीं छोड़ना है। रास्ता सीधा नहीं है, और, रास्ता छोड़ना नहीं है; हमें ये दोनों बातें एक साथ समझ में ही नहीं आतीं। इन दोनों में से एक बात कोई भी समझ में आ जाएगी, दोनों एक साथ नहीं समझ में आतीं। ये दोनों जो एक साथ याद रख ले, वो विलक्षण मन होता है। रास्ता सीधा नहीं है, और पता भी चले कि सीधा नहीं है, टेढ़ा-टपरा हो रहा है, तो भी उसे छोड़ना नहीं है, क्योंकि है वही; उसको छोड़ दिया तो फिर ज़िंदगी के अन्य तमाम भटकाने वाले रास्ते हैं, उन पर भटकते रहो, भटकते रहो।

तो जो कुछ भी कर रहे हो उसमें ये तय करके रखो कि वो समर्पित है उसी मंज़िल को।

मैं गाड़ी पर चढ़ा क्यों? मंज़िल की ख़ातिर। मैं गाड़ी से उतरा भी क्यों? मंज़िल की ख़ातिर। मैं गाड़ी में ड्राइवर सीट पर क्यों आ गया? मंज़िल की ख़ातिर। मैं गाड़ी पर पिछली सीट पर जाकर सो भी क्यों गया? मंज़िल की ख़ातिर; अब ये सब तुम अलग-अलग काम कर रहे हो कि नहीं कर रहे हो? कभी तुम गाड़ी चला रहे हो, कभी ड्राइवर (चालक) के बगल में बैठे हो, कभी पीछे जाकर सो गए; ये सब बदलते हुए रंग हैं न चेतना के, कि नहीं हैं? सुषुप्ति में भी चले गए बीच-बीच में, गाड़ी में ही; स्वप्नावस्था भी देख ली, कहाँ? गाड़ी में ही। पर ये जो कुछ भी तुम करो, इतना तय करके रखो कि तुम कर किसकी ख़ातिर रहे हो? मंज़िल की ख़ातिर; बस फिर ठीक है।

और ये पक्का रखो कि मंज़िल तुमसे; जैसा अभी कहा, सब करवाकर मानेगी। वो तुमको हर तरीके से जाँचेगी, तुम्हारी एक-एक, छोटी-से-छोटी खोट खोज-खोज कर निकालेगी और तुमको परेशान करेगी; जब तक कि तुममें कोई भी कमी है वो उसी कमी को कोंचती रहेगी।

अब सोचो एक ड्राइवर है उसको रिवर्स लगाना नहीं आता, पहुँच जाएगा वो मंज़िल तक? लो फँस गया। एक ही कमी थी, क्या कमी थी? रिवर्स लगाना नहीं आता था, फँस गए। एक ड्राइवर है उनको यही नहीं आता कि शीशे पर पानी कैसे मारना है, ये भी फँस जाएँगे। छोटी-से-छोटी भी तुममें कमी है; टायर (पहिया) बदलना नहीं आता, जैक लगाना नहीं आता; कहीं-न-कहीं फँस जाओगे। अंत तक वही पहुँचेगा जो अपनी आख़िरी कमी को भी सुधारने के लिए प्रतिबद्ध है,कि, “बताओ और क्या? और क्या सीखूँ? बताओ और क्या? बताओ कहाँ खोट है? उसको भी हटाएँगे।"

और करना सब कुछ पड़ेगा; जो सबसे ज़्यादा अजीब चीज़ हो सकती है वो भी करनी पड़ेगी, क्या? कि कई बार मंज़िल उत्तर की तरफ़ है और तुम अपने आपको जाता पाओगे दक्षिण की तरफ़; वो भी होता है। और बुरा नहीं लगेगा दक्षिण की ओर जाना, अगर तुम को पता है कि दक्षिण की ओर भी जा रहे हो तुम मंज़िल की ही ख़ातिर; फिर बुरा नहीं लगेगा, समभाव में स्थित रहोगे।

इसका विपरीत भी हो सकता है। हो सकता है कि तुम सही सड़क पर हो किसी वजह से; तुम्हें किसी ने बैठा दिया एक सही गाड़ी पर, तुम्हारा कोई शुभचिंतक है; लेकिन तुममें मंज़िल के प्रति न अनुराग है, न बोध, दोनों बातें नहीं हैं। मंज़िल पर पहुँचने की तुम्हारी कोई लालसा भी नहीं है, और मंज़िल है कहाँ ये तुम जानते भी नहीं; और तुम गए सो गाड़ी में, और तुम्हारी नींद खुली। नींद खुलने के बाद थोड़ी देर तक आदमी का होश ही नहीं रहता है न? गाड़ी सही जा रही है, लेकिन तुम्हारे भीतर कोई समभाव नहीं रहेगा। तुम इधर-उधर देखोगे बिलकुल भौंचक्के होकर के, “कौन-सी गाड़ी है? मैं कहाँ बैठा हूँ? क्यों जा रही है?” हुआ है कभी ऐसा? कि सो कर उठे हो और दो मिनट तक समझ में ही नहीं आया है कि, “मैं कौन हूँ? मैं कहाँ बैठा हूँ? और ये गाड़ी कहाँ को, क्यों जा रही है?” जबकि गाड़ी सही जा रही है, लेकिन तुम्हें अभी निश्चित नहीं है न।

तो तुम्हारे भीतर वो चीज़ निश्चित होना, वो समर्पण का उठना ज़रूरी है, कि, “मैं सोया भी किसके लिए था? मंज़िल के लिए, उठा भी? मंज़िल के लिए।“

प्र: जब मैं अपनी चेतना की अवस्थाओं को परिस्थितियों के हिसाब से और माहौल के हिसाब से बदलते हुए देखता हूँ; और पिछले कुछ समय से वो बहुत ही ज़्यादा बदल रहीं हैं, मतलब घंटों में, और एक कोण से दूसरे कोण, एकदम चरम सीमा तक बदल रहीं हैं; विचार बदल जाते हैं, भावनाएँ बदल जाती हैं, सब कुछ बदल जाता है। तो मैं किसी भी परिस्थिति के कारण, किसी भी भावना में या किसी भी मनोस्थिति में होता हूँ, तो मैं उसको अनुभव कर रहा होता हूँ, उसी हिसाब से जी भी रहा होता हूँ। लेकिन मुझे ये भाव उठता है कि ये तो कुछ परिस्थितियाँ बनी उसके कारण ये ऐसा बन गया, परिस्थितियाँ बदलेंगी ये भी बदल जाएगा...

आचार्य: उस परिस्थिति में तुम हो क्यों?

तुम को किसी की दवाई लाने के लिए बाज़ार भेजा गया है, बाज़ार क्या है तुम्हारी? परिस्थिति। तुम कह रहे हो कि वो परिस्थिति तुम्हारे मन को बदल देती है। तुम दवाई लाने बाज़ार गए थे और बाज़ार तुम्हारे मन को बदल देगी, तुम वहाँ बैठकर बर्गर खाने लगोगे?

हम सब किसी-न-किसी परिस्थितियों में होते हैं, उन परिस्थितियों में तुम किसी वजह से हो न? ये उम्मीद करता हूँ। तुम्हें बाज़ार भेजा गया है दवाई लाने के लिए और तुम कह रहे हो, “मैं बाज़ार आया, बाज़ार एक परिस्थिति है, उस परिस्थिति ने मेरे मन को बदल दिया। मैं वहाँ बैठकर बर्गर खाने लग गया, क्योंकि मुझे बर्गर की दुकान दिखाई दे गई।“ अरे! तुम्हें दवा की दुकान के लिए भेजा गया है, तुम कह रहे हो, “मुझे परिस्थितियों ने बदल दिया।“ तुम्हें कुछ याद भी है कि तुम्हें उस परिस्थिति में डाला क्यों गया है? या तुमने स्वयं ही अपने-आपको उस परिस्थिति में क्यों डाला है? तुम ये बिलकुल भूल जाते हो।

तुम जहाँ भी हो, जो भी तुम्हें अनुभव हो रहा है, क्या वो पूरे तरीके से निष्प्रयोजन है? बेतरतीब है? या कोई प्रयोजन है, कार्यक्रम है, प्रोजेक्ट है, उपक्रम है; तुम जिसके हिस्से हो। और अगर तुम उसके हिस्से हो, तो वो जो प्रयोजन है वो याद रहेगा न हर समय? फिर तुम परिस्थितियों का उपयोग करोगे; फिर तुम परिस्थितियों का शिकार थोड़े ही बन जाओगे। असल में परिस्थितियों का शिकार कोई बनता भी नहीं कभी; जब तुम्हें ये याद नहीं रहता न, कि तुम परिस्थितियों का उपयोग करने के लिए हो, तब तुम परिस्थितियों का उपभोग करना शुरू कर देते हो; यही माया है।

तुम गए थे बाज़ार का उपयोग करने किस चीज़ के लिए? दवाई के लिए। और वहाँ तुम्हें क्या दिख गया? बर्गर। और तुमने बर्गर का क्या शुरू कर दिया? उपभोग। और फिर कह रहे हो, “वो तो मेरा मन बदल गया बाज़ार को देखकर।" नहीं, नीयत बदल गई, नीयत में खोट है। जिसके लिए दवाई लाने गए हो, उसके लिए मन में कोई प्रेम नहीं, कोई करुणा नहीं, तो फिर परिस्थितियाँ हावी हो गईं, बर्गर हावी हो गया; अब बैठकर बर्गर चबा रहे हो, बहुत रस ले रहे हो। फिर पीछे से एक फ़ोन आया, फ़ोन से जूते बरसे तो फिर कहा, “अब देखो, अब परिस्थितियाँ बदल गईं, मन बदल गया। अब बड़ी लज्जा लग रही है, मैं बर्गर खा रहा था।“

मूल बात क्या है यहाँ पर? मूल भूल क्या है? जिसको बचाने के लिए बाज़ार भेजा गया था उसके प्रति शायद तुम में प्रेम ही नहीं, नहीं तो परिस्थितियाँ तुम पर हावी कैसे हो जातीं? तुम परिस्थितियों का उपयोग करते न? तुम कहते, “कहाँ है दवाई की दुकान? कहाँ है? ये रही।“ बर्गर की दुकान को तुम ऐसे-ऐसे-ऐसे करके क्या करते? ठुकराते चलते; उसको तो तुम गिनते नहीं, वो तुम्हारे लिए नगण्य हो जाती। नगण्य माने जानते हो न? जिसकी गिनती ही नहीं की जा सकती; अब परिस्थितियाँ तुम पर हावी कैसे हो जातीं?

भई इतने तो हम मुक्त कभी होते नहीं है, कि खाली बैठे हैं और बाज़ार में घूम रहे हैं। तुम जहाँ कहीं भी हो, क्या कभी मुक्त हालत में हो? नहीं, चूँकि तुम मुक्त नहीं हो इसीलिए तुम्हारे पास हमेशा क्या होता है एक? उद्देश्य होता है, वो उद्देश्य तुम भूल कैसे जाते हो? बाज़ार तुम पर तब हावी होगा न जब तुम बाज़ार में तफ़री मारने लगो, “अच्छा! और क्या-क्या है इस बाज़ार में?” अरे भाई! तुम वहाँ तफ़री मारने नहीं आए, तुम वहाँ दवा लेने आए हो।

इससे एक बात अच्छे-से समझ लेना; जिसको तुम डिस्ट्रैक्शन (विचलितता) बोलते हो, उसमें और प्रेमहीनता में, लवलेसनेस ( प्रेमहीनता) में बहुत सीधा रिश्ता है।

तुम डिस्ट्रैक्ट (विचलित) हो ही नहीं सकते जब तक तुम लवलेस ( प्रेमहीन) ना हो।

कोई बोले, “मैं दिन भर डिस्ट्रैक्ट था,” इसका मतलब यही है कि तुम आदमी अंदर से कठोर हो, क्रूर हो, हिंसक हो, प्रेम नहीं है तुम्हारे भीतर; प्रेम नहीं है तुम्हारे भीतर इसीलिए दवा की दुकान में भी बर्गर माँग रहे हो, और बर्गर चबाते-चबाते जब फ़ोन पर गालियाँ पड़ीं तो आँसू झर आए।

जानते हो त्रासदी क्या है? ये आँसू भी तुम्हारे उस मरते हुए आदमी के लिए नहीं आ रहे जिसको तुमने दवाई नहीं लाकर दी; ये आँसू भी तुम्हारे तुम्हारे अपने अहंकार के लिए हैं, कि, “हाय! मुझे डाँट पड़ गई।" अभी भी तुम रोकर भी जो वक्त गुज़ार रहे हो उसमें मरने वाला मौत के और करीब पहुँचता जा रहा है, और तुम रो रहे हो, लेकिन तुम्हारे इन आँसुओं में भी ज़बरदस्त क्रूरता है, क्योंकि तुम अपने लिए रो रहे हो। तुम इसलिए थोड़े ही रो रहे हो कि, “महापाप हो गया, वो मरने वाला मर गया,” क्योंकि अगर तुम को ये पता ही चल रहा होता कि महापाप हो गया, और मरने वाले को दवाई चाहिए, तो तुम्हें रोने की भी फ़ुरसत नहीं मिलती। तुम कहते, “मैं रोऊँ कैसे? पहले ही देर कर दी है, अब भागो, दवाई लेकर के जाओ।“ ये जो तुम बैठकर के मातम मनाते हो और शोक में छाती पीटते हो, ये भी तो ज़बरदस्त तरीके का अहंकार ही है न? और क्रूर अहंकार, कि नहीं है?

लोग बोलते हैं, “आचार्य जी, आपकी बातों से हमें चोट लग गई।“ मैं कहता हूँ, “काश! ऐसा हो पाता।" तुम्हें लगी ही नहीं; नहीं तो एक चोट काफ़ी होती है, काम हो जाता है। तुम इतने ढीठ हो कि तुम्हें लगती ही नहीं। कैसे? बताता हूँ; मैं चोट देना चाहता हूँ यहाँ पर (हृदय की ओर इशारा करते हुए), तुम इतने ढीठ हो कि ऐसे-ऐसे करके (हाथों को अपने हृदय के ऊपर रखकर), सब कुछ करके बचा लेते हो। तो तुम्हें चोट लगती भी है तो कहाँ लगती है? कभी यहाँ (दाएँ हाथ) लगी, कभी यहाँ (बाएँ हाथ) लगी; वहाँ तुम लगने ही नहीं देते चोट जहाँ एक चोट लग जाए तो काम हो जाए। बाकी सब जगह तुम चोटें खा लोगे, वो एक जगह बचा लोगे जो तुम्हारे अहंकार का अड्डा है; वहाँ तुम को पक्का पता है कि इस जगह पर चोट नहीं पड़नी चाहिए।

तो बाकी सब चोटें खा लोगे और फिर रो लोगे; इसीलिए कह रहा हूँ, “वो रोना भी अहंकार का ही काम है।“

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