अपनी कमज़ोरी का स्वीकार, अध्यात्म की शुरुआत || आचार्य प्रशांत, त्रिपुरा रहस्य पर (2018)

प्रश्नकर्ता: दत्तात्रेय सेड टु परशुराम, ‘लिसन, ओ भार्गवा, आइ शैल नाउ कंटिन्यू द होली नैरेटिव।‘
हैविंग हर्ड व्हॉट शी (प्रिन्सेस हेमलेखा) हैड टु से, द एंजॉयमेंट्स सीज़्ड टु इंटरेस्ट हिम (प्रिन्स हेमचूड़ा), ही डेवलप्ड अ डिसगस्ट फ़ॉर देम, एंड बिकेम पेन्सिव। बट द फ़ोर्स ऑफ़ हैबिट स्टिल रिमेन्ड विथ हिम। ही वॉज़ देयरफ़ोर अनेबल इदर टु एन्जॉय हिम्सेल्फ़ ऑर टु डिज़िस्ट ऑल ऑफ़ अ सडेन। ही वॉज़ हाउएवर टू प्राउड टु कन्फ़ेस हिज़ वीकनेस टु हिज़ बी-लवेड। त्रिपुरा रहस्य (चैप्टर फ़ाइव, वर्स 5,6,7 एंड 8)
(दत्तात्रेय ने परशुराम से कहा, “सुनो हे भार्गव! मैं अब ये पवित्र कथा आगे सुनाता हूँ।”
राजकुमारी हेमलेखा जो कहना चाहती थी, उसे सुनने के बाद भोग-विलास में राजकुमार हेमचूड़ा की रुचि कम हो गयी, उसके मन में उन चीज़ों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी और वह उदासीन व चिन्ताग्रस्त हो गया। लेकिन आदत का ज़ोर अब भी उस पर क़ायम था, इसलिए वह न तो पूर्णतया भोग-विलास का सुख ले पा रहा था, और न ही अचानक से ये सबकुछ त्यागकर विरक्त हो पा रहा था। हालाँकि, वह अपनी प्रेमिका के सामने अपनी कमज़ोरी क़ुबूल करने में बहुत गर्व महसूस कर रहा था।) त्रिपुरा रहस्य (अध्याय ५, श्लोक ५, ६, ७ और ८)
तो आचार्य जी, ये 'टू प्राउड' क्यों लिखा गया है?
आचार्य प्रशांत: हम ऐसे ही तो होते हैं, हम कहाँ मानते हैं कि हालत ख़राब है हमारी। अध्यात्म की तो शुरुआत ही उस दिन से होती है जिस दिन तुम चैतन्य रूप से ये स्वीकार कर लो कि तुम्हारी हालत ख़स्ता है। पर अगर मान लिया कि हालत ख़स्ता है हमारी, तो ये भी मानना पड़ेगा कि जीवन भर जो श्रम का, समय का निवेश किया, वो निवेश व्यर्थ गया। और ये बात दिल तोड़ देती है न!






