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अपना अपमान करना सीखो || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने स्वयं का अपमान करने की बात कही थी, तो स्वयं का अपमान मतलब अहम् को नकारना है। तो क्या शरीर की आवश्यकता को भी नकारना है इसमें?

आचार्य प्रशांत: अहम् की आवश्यकता को नकारना है। जिस हद तक शरीर की आवश्यकता – शरीर की है, पूरी कर दो। जिस हद तक शरीर की आवश्यकता – अहम् की है, उसका अपमान करो। पशुओं के शरीर की आवश्यकता सिर्फ़ शारीरिक होती है। हमारे शरीर की जो आवश्यकता होती है, वो अधिकांशतः मानसिक होती है। उसका अपमान ज़रूरी है। ये सवाल आपको अपनेआप से ही पूछना पड़ेगा। अभी जो मेरा शरीर माँग रहा है, क्या वो शरीर के काम आने वाला है या मन के काम आने वाला है? शरीर मात्र के काम आने वाला है, दे दीजिए शरीर को। मन के काम आने वाला है, मत दीजिए शरीर को। ये अन्तर करना आना चाहिए।

एक कपड़ा होता है जो आप पहनते हो ताकि शरीर को ठंड न लगे और एक कपड़ा होता है जो आप पहनते हो ताकि मन घमंड में और इतरा सके, कि देखो मेरा कपड़ा कितना महीन है। ये अन्तर करना आना चाहिए।

एक खाना है जो आप खाते हो क्योंकि शरीर को ऊर्जा की और पोषण की ज़रूरत है। और एक खाना है जो आप खाते हो क्योंकि ज़बान ललचा रही है, लपलपा रही है और-और, और। ये अन्तर करना आना चाहिए।

हमारे शरीर की जो अधिकांश माँगें हैं, वो वास्तव में मन की माँगें हैं जिन्हें वो शरीर के माध्यम से माँग रहा है। शरीर की अगर कोई माँग होगी, अगर कोई माँग विशुद्ध शारीरिक होगी, तो उसकी पहचान ये होगी कि पूरा नहीं करोगे तो शरीर को क्षति हो जाएगी। और अगर कोई माँग है मानसिक, पर लग रही है शारीरिक, उसकी पहचान ये होगी कि उसे नहीं भी पूरा करो, तो शरीर का कोई नुक़सान नहीं होता। हाँ, उसे पूरा करो तो मन फूलकर कुप्पा हो जाता है। जैसे, कामवासना।

हम बार-बार कह देते हैं, ये तो शारीरिक होती है, शारीरिक होती है। अरे, वासनापूर्ति नहीं करोगे तो शरीर से खून बहने लगेगा? हाथ-पाँव कटकर गिर जाएँगे? खाओगे नहीं तो मर जाओगे। पर वासना पूरी नहीं होगी तो मरने लगोगे क्या? कोई विटामिन कम हो जाएगा शरीर में? तो वासना शारीरिक बहुत कम होती है, वो अधिकांशतः मानसिक होती है, इसीलिए फिर कहा जाता है कि वासना पर नियन्त्रण करो।शारीरिक होती तो क्यों कहा जाता? फिर तो बहुत सहज प्रकृति की बात थी, कोई काहे को आपको रोकने आता? अगली पहचान होती है शारीरिक माँग की, कि वो हमेशा सीमित होती है।

भूख शरीर की माँग है, सीमित होती है, इतना नहीं खा सकते हैं (दोनों हाथ फैलाकर ज़्यादा का संकेत करते हुए)। सावधिक भी होती है। इस समय लगेगी, इस समय नहीं लगेगी। मानसिक माँग की पहचान ये होती है कि वो अनन्त होती है और सावधिक नहीं होती है।

एक व्यक्ति जिसके दिमाग में काम-ही-काम भरा हो, वो चौबीस घंटे काम के बारे में सोच सकता है। काम माने वासना और तब भी उसका मन तृप्त नहीं होगा। खाना आपको एक सीमा से अधिक खिलाया जाएगा, आप उलटना शुरू कर दोगे क्योंकि वो पूर्णतया शारीरिक एक माँग है।

धन मानसिक माँग है, वो कभी पूरी नहीं होगी। ऐसा नहीं हो सकता कि आपको एक सीमा से ज़्यादा धन दे दिया गया, तो आप धन उलटना शुरू कर दो। धन आप लेते जाओगे, लेते जाओगे, पेट कभी नहीं भरेगा। हाँ, खाना खा लोगे, पेट भर जाएगा। थोड़ी देर में फिर भूख लग सकती है।

एक अवधी के बाद, एपिसोडिक डिज़ायर (प्रासंगिक इच्छा) होती है वो। उसके दौर आते हैं, उसके प्रसंग आते हैं। धन जितना आ गया, अभी और चाहिए, और चाहिए। तो इन माँगों में अन्तर करना आना चाहिए कि कौन सी चीज़ शारीरिक है, कौन सी मानसिक। बताये देता हूँ, शारीरिक माँगें बहुत कम होती हैं, बहुत छोटी होती हैं, बहुत-बहुत छोटी। निन्यानवे प्रतिशत से भी ज़्यादा हम जो चीज़ें माँग रहे होते हैं, वो शरीर के नहीं, मन के काम आती हैं। वो बस अहंकार को फुलाती हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, 'अपमान' शब्द जो है इसका गहराई में अर्थ क्या होता है?

आचार्य प्रशांत: न मानना, मान्यता न देना। वो आपके सामने खड़ा होगा। ‘मैं सच हूँ।’ आप मान्यता नहीं देंगे।

मान्यता क्या चीज़ होती है? मान का अर्थ होता है किसी चीज़ को वास्तविक समझना। मान का अर्थ उसका आकार भी होता है। जैसे, द्रव्यमान कहते हो न, आकार। कह देते हैं न? तेरा कोई आकार नहीं है, तू शून्य है, तू मिथ्या है, मैं तुझे कोई मान्यता नहीं देता। ये अपमान है।

अपमान माने आवश्यक नहीं कि गाली-गलौज। तुम जिस भी चीज़ के अस्तित्व को स्वीकृति न दो, उसका तुमने कर दिया अपमान। उदाहरण के लिए, कोई इस कमरे में आये, आपमें से कोई उसकी ओर देखो ही नहीं आधे घंटे, ये अपमान हो गया। क्योंकि आपने उसके अस्तित्व को स्वीकृति ही नहीं दी, ये अपमान है।

अहंकार भीतर से कुछ बोल रहा है, ऐसा करना है, वैसा करना है, तुम्हें सुनाई ही नहीं दे रहा है। कोई आपसे कुछ बोले बार-बार और आप उस पर ध्यान न दो, ये अपमान हो गया न। ऐसे अपमान करा जाता है।

शरीर कुछ चिल्ला-चिल्लाकर बोल रहा है। ये चाहिए, वो चाहिए, ध्यान ही नहीं देंगे। मन कह रहा है ये चाहिए, वो चाहिए, ध्यान ही नहीं देंगे, ये अपमान है।

समझ में आ रही है बात?

वास्तव में जो एकदम सही शब्द है, वो है अमान करो। पर अपमान ज़्यादा उपयोगी है, पूछो क्यों? क्योंकि पहले हमने सम्मान कर रखा है, चूँकि सम्मान कर रखा है, इसलिए मैं बोल रहा हूँ अपमान करो। अन्यथा उसे अमान्य कर देना ही काफ़ी है। अमान्य माने रिजेक्टेड, ख़ारिज कर दिया, अवैध घोषित कर दिया, अमान्य। पर मैं अमान की जगह, अपमान ही बोल रहा हूँ क्योंकि बात हम सबकी हो रही है, जो अहंकार को देते हैं सम्मान।

चूँकि सम्मान देते हैं इसलिए सम्मान से पलट कर अपमान देना सीखो। अन्यथा बस इतना करना है कि उसकी मान्यता रद्द करनी है। अब तुम मान्य नहीं हो, अब हम तुमको नहीं मानते, अब तुम अमान्य हो। पर अमान्य शायद हमारे कम काम आये इसीलिए मैं कह रहा हूँ, अपमान्य में हो अब तुम। कुछ छोटी-छोटी बातें हैं, कुछ ज़रूरी है, उसे दर्द में करना सीखो। जीतना है, दर्द में खेलना सीखो; काम करना है, भूख को, नींद को परे रखना सीखो।

कोई तुम्हें साफ़-साफ़ नहीं बता सकता, एक उदाहरण दे रहा हूँ कि तुम्हारे लिए आठ घंटे की नींद ज़रूरी है या साढ़े पाँच घंटे की। तुम साढ़े पाँच घंटे की नींद ले रहे हो तो भी तुम जाओगे किसी विशेषज्ञ के पास, वो कहेगा, 'ठीक ही है लगभग साढ़े पाँच भी।’ तुम साढ़े-आठ घंटे की ले रहे हो; तुम जाओगे, कहेगा, ‘ये भी ठीक ही है लगभग।‘ तुम साढ़े-पाँच घंटे की लेना सीखो। साढ़े-पाँच घंटे के बाद भी ये (शरीर की ओर इशारा करते हुए) बोल रहा होगा कि अ, अ….। तुम इसे अमान्य कर दो। तुम उसकी माँग को अमान्य कर दो। नहीं माना और तथ्य यही है कि तुम्हारे शरीर को जितना लाभ साढ़े-आठ घंटे में होता है, उतना ही लाभ साढ़े-पाँच-छ: घंटे में भी हो जाता है।

तुम्हारे शरीर को; अगर बात पूर्णतया विशुद्ध शारीरिक माँग की है, तो तुम्हारे शरीर के लिए साढ़े-पाँच-छ: घंटे से ज़्यादा की नींद चाहिए ही नहीं। तो ये जो अतिरिक्त तुम प्रतिदिन तीन घंटे दे रहे हो। ये तुम शरीर को नहीं दे रहे हो, ये तुम अहंकार को दे रहे हो, तुम मन को दे रहे हो। मन सो रहा है, शरीर नहीं सो रहा है। शरीर की तो माँग पूरी हो गयी थी साढ़े-पाँच-छ: घंटे में ही। उसके आगे अब ये मन ने माँगा है कि अभी पड़े रहो न, अभी बढ़िया है एसी चल रहा है, पड़े रहो। ठुकराना सीखो।

वो तुम्हारे सामने खड़ा हुआ है अपना माँगों का दस्तावेज़ लेकर। ऐसे फ़ाइल लो, उसकी और ऐसे फेंक दो (फेंकने का संकेत करते हुए), हट! अभी और सोना है, अभी और खाना है! इतना ज़ोर से उसको डाँटो, ऐसा अपमान करो कि तुम्हारे सामने दोबारा अपनी माँगें लेकर आये ही नहीं।

समझ में आ रही है कुछ?

तुम एक ज़रा सा गुणा करके देख सकते हो, कितने तुम साल खो रहे हो प्रतिदिन तीन घंटे के हिसाब से? तीन घंटे प्रतिदिन के हिसाब से साठ साल में कितने साल खोये? साठ-बटे-आठ। साढ़े-सात साल तुमने अतिरिक्त सोने में गँवा दिये हैं। साढ़े-सात साल! कल्पना कर सकते हो, साढ़े-सात साल अतिरिक्त सोने में गँवा दिये। कोई आये, तुमसे कहे, ‘तुम्हारे साढ़े-सात साल ज़िन्दगी के मैं छीन लूँगा।’ तुम कहोगे, ‘हत्या कर रहा है मेरी, मार रहा है, साढ़े-सात साल छीन लिये; सज़ा दो, सज़ा दो। और तुम अपने बडे़ दुश्मन सबसे ख़ुद नहीं हो क्या? अपने साढ़े-सात साल तुम खा गये, अपमान के अधिकारी हो या नहीं हो, बोलो?

ये तो मैं एक बार सोने की बात कर रहा हूँ। ऐसे-ऐसे सूरमा होते हैं, वो आठ घंटे रात में सोते हैं, फिर दो घंटे दिन में सोते हैं। उनका हिसाब अलग, उनके पन्द्रह साल निकलेंगे और इस तरह के तुमको अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे। यहाँ माँगें ठुकराना ज़रूरी है और माँगें ठुकराकर के तुम शरीर का कोई नुक़सान भी नहीं कर रहे। हाँ, अपना बहुत फ़ायदा कर ले रहे हो। शरीर का नुक़सान भी नहीं हुआ, अपना फ़ायदा भी कर लिया।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये बात सुनने में तो बहुत रोमांचक सी लग रही है, पर प्रैक्टिकली (व्यावहारिक) तो बहुत‌ कठिन है।

आचार्य प्रशांत: मत करो। मेरे लिए कर रहे हो क्या? नहीं करना है, मत करो। ये सारी बातें सिर्फ़ उनके लिए हैं जो करने के इच्छुक हैं। जो नहीं करना चाहते हैं। उनके पास हज़ार बहाने हैं।

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