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अंतर है सत्य और धर्म में || महाभारत पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है तथा अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं का सृजन करता हूँ अर्थात् जन्म लेता हूँ।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ७

प्रश्नकर्ता: वह धर्म ही क्या जिसे किसी की रक्षा की आवश्यकता हो; सत्य तो स्वयंसिद्ध होता है। श्रीकृष्ण किस धर्म की रक्षा की बात कर रहे हैं?

बहुत सारे महात्मा लोग आज भी यह कहते हुए कि वेद अपौरुषेय हैं, क़ुरआन अल्लाह की किताब है, इसी बात को दिल-ओ-जान से लगाए बैठे हैं और जो उनकी बातों को नहीं मानता, उसके दुश्मन बन जाते हैं, दंगे-फ़साद करते हैं। उन्हें बस ये छोटी-सी किताब दिखायी देती है। इतना बड़ा जो विश्व-ब्रह्माण्ड है, उसमें उनको कुछ दिखायी नहीं देता। आचार्य जी, समझाने की कृपा करें।

आचार्य प्रशांत: सत्य और धर्म में अंतर होता है। और इसको समझना, तुम कह रहे हो, "वो धर्म ही क्या जिसे रक्षा की आवश्यकता हो।" कृष्ण कह रहे हैं जब-जब धर्म की हानि होती है, अधर्म का बोल बाला चढ़ता है, तब-तब वो प्रकट होते हैं धर्म की रक्षा के लिए।

धर्म की हानि निःसंदेह हो सकती है। क्यों लग रहा है तुम्हें कि धर्म की हानि नहीं हो सकती? धर्म सत्य थोड़े ही है। सत्य किसी से संबंधित नहीं होता, सत्य स्वयंभू होता है, सत्य असम्बद्ध होता है। धर्म जीव के लिए होता है; जीव है तो धर्म है।

जीव को धर्म क्यों चाहिए? ताकि जीव सत्य तक पहुँच सके। सत्य आख़िरी मंज़िल है, धर्म राह है। वो जो आख़िरी मंज़िल है, वो किसी और लोक की है, अलौकिक है, किन्हीं आसमानों में है, अविरल है, अनंत है, अखंड है, अमर है। उसकी कोई हानि नहीं हो सकती, वो अवध्य है। लेकिन जीव को जिस मार्ग से सत्य तक जाना है, उस मार्ग की तो हानि हो सकती है न। कोई निश्चित मार्ग नहीं है, मैं किसी सड़क इत्यादि की बात नहीं कर रहा। मार्ग जीव स्वयं ही बनाता है। तो मार्ग क्या है?

सत्य तक पहुँचने की जीव की इच्छा ही वो मार्ग है, उसी का नाम धर्म है। जो कर्म, जो इच्छाएँ तुम्हें सत्य तक पहुँचाती हों, उन्हीं का नाम धर्म है।

भलीभाँति जानते हो कि सदा तो तुम सत्य के प्रार्थी, सत्य के ग्राहक रहते नहीं न। जब कभी जीव का रास्ता उसे सत्य तक ना ले जाता हो, जब कभी जीव कोई ऐसा रास्ता चुने जो उसे भटकाता हो, तब-तब उस रास्ते का नाम धर्म नहीं, तो हो गई न धर्म की हानि।

अपना ही जीवन देख लो, सदा सच्चाई की ओर ही बढ़ते हो क्या? जब-जब जीव सच्चाई की ओर नहीं बढ़ रहा है, तब-तब हो गई धर्म की हानि।

सच्चाई की कोई हानि नहीं हुई। तुम सच्चाई तक पहुँचो, नहीं पहुँचो, सच्चाई अक्षुण्ण है। सच्चाई की कोई हानि नहीं हुई, पर जीव की हानि हो गई। जीव की हानि ही धर्म की हानि है।

जो कुछ तुम्हारे वास्तविक लाभ में हो, उसका नाम धर्म है और जो कुछ करके, जैसा जीवन जीकर तुम्हारा नुकसान होता हो, तुम्हारी हानि होती हो, वो सब धर्म की हानि है। तुम्हारे ही वास्तविक स्वार्थ का नाम धर्म है।

मैंने कहा, ‘वास्तविक स्वार्थ’, परमार्थ। तुम्हारे ही वास्तविक स्वार्थ का नाम धर्म है। और तुम्हारे ही व्यर्थ अनर्थ का नाम अधर्म है अर्थात् धर्म की हानि है।

क्या कभी तुम अनर्थ नहीं करते? क्या सदा तुम सत्य की ओर ही एकनिष्ठ रहते हो?

ऐसा तो होता नहीं न। तो धर्म की हानि होती है। और जब जीव बहुत ही भटक जाता है, समाज ही पूरा दलदल में धँसता प्रतीत होता है, तब कृष्ण कह रहे हैं कि उन्हें प्रकट होना ही पड़ता है। इस बात का अर्थ समझना, ‘तदात्मानं सृजाम्यहं’।

जब तुम अधर्म की राह चलोगे तो जीवन कैसा हो जाएगा तुम्हारा?

दुःख, दारिद्र्य, कष्ट, तमाम तरह के रोग, संकीर्णताएँ, क्षुद्रताएँ, बेचैनियाँ। जब अधर्म इतना बढ़ जाता है, तो उसी अनुपात में फिर जीव की बेचैनी बढ़ जाती है। तब विवश होकर जीव को आँख खोलनी ही पड़ती है। तब विवश हो करके अपना सपना तोड़ना ही पड़ता है, बिस्तर छोड़ना ही पड़ता है। तब विवश हो करके मानना ही पड़ता है कि जैसा हम जी रहे हैं और जिस राह हम चल रहे हैं, वो राह ग़लत है और तब विवश हो करके जीव को सत्य की ओर मुड़ना ही पड़ता है। जीव के सत्य की ओर मुड़ने को ही कृष्ण स्वयं के सृजन का नाम का दे रहे हैं।

अवतार इत्यादि आवश्यक नहीं हैं कि कोई विशिष्ट पुरुष ही हों। तुम्हारे भीतर जब भी रोशनी उठी, समझ लो कि सत्य अवतरित हुआ। तुम अधर्म के अंधेरे की ओर बढ़ते जा रहे हो, बढ़ते जा रहे हो और ठोकरें खाते जा रहे हो, लहूलुहान हो रहे हो, और अंततः परेशान हो करके तुम सत्य की ओर मुँह करते हो, अधर्म को पीठ दिखाते हो।

सत्य की ओर तुमने ज्यों ही मुँह किया, वैसे ही तुम्हें क्या दिखायी दी? रोशनी। अधर्म की ओर अँधेरा है, सत्य की ओर रोशनी है। रोशनी के इस प्रादुर्भाव को ही सत्य का अवतरण कहते हैं। कृष्ण आवश्यक नहीं हैं कि तुमसे बाहर कोई चलते-फिरते, जीते-जागते मनुष्य हों। तुम्हारे ही भीतर कृष्णत्व बैठा हुआ है, विराजमान है।

तो कृष्ण कह रहे हैं कि जब-जब धर्म की बहुत हानि होगी, जब-जब अंधेरा बहुत बढ़ जाएगा, तब-तब जीवों को विवश हो करके प्रकाश की ओर मुड़ना ही पड़ेगा। यही है अवतरण परमात्मा का – जीव जब भी अंधेरे को पीठ दिखाएगा, परमात्मा को अपने समक्ष पाएगा। यही है परमात्मा का अवतरण।

वास्तव में परमात्मा का कोई अवतरण नहीं होता, क्योंकि परमात्मा तो सर्वत्र है, सर्वदा है, सर्वव्यापक है, कूटस्थ है। वो तो लगातार है। तुम उसकी ओर पीठ करे रहते हो, तुम उसकी ओर आँखें बंद करे रहते हो। जब तुम अपनी आँखें खोल लेते हो उसके प्रति, तो तुम कह देते हो कि परमात्मा अवतरित हुआ।

परमात्मा नहीं अवतरित हुआ, तुमने आँखें खोल ली। और आँखें तुम तभी खोलोगे जब आँखें बंद करे रहना तुम्हारे लिए बड़ा महँगा सौदा बन जाए, जब तुम कहो कि "अभी अगर और आँखें बंद करे रहे, तो न जाने और कितने कष्ट झेलने पड़ेंगे। तो अब तो बेहतर है कि आँखें खोल ही लें। आँख बंद करे रखने की ज़िद बड़ी महँगी पड़ रही है। तो, भाई, अब तो कोई चारा नहीं है, आँख खोल ही ली जाए।" आँख खोलोगे और सामने कृष्ण को खड़ा पाओगे। वास्तव में आँख का खुलना और कृष्ण का समक्ष दिखायी देना, दोनों एक घटना हैं।

तुम्हारी आँख के खुलने का नाम ही कृष्णत्व है। कृष्ण तुम्हारी आँख से हटकर कुछ और नहीं हैं। तुम्हारी आँख बंद है तो अधर्म, तुम्हारी आँख खुली है तो कृष्ण।

धर्म की हानि होती है; होने मत देना, कष्ट पाओगे। जीव है ही वो जिसके अधिकार में है कि कभी वो धर्म पर चले और कभी अधर्म पर भी चल सकता है। अपने इस अधिकार का दुरुपयोग मत करना। ये बड़ा ख़तरनाक अधिकार मिला हुआ है तुमको, दुधारी तलवार है, सोच-समझकर चलाना।

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