अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोशों का परिचय क्या है? || सर्वसार उपनिषद् पर (2019)

आचार्य प्रशांत: फ़िर पूछा है कि “अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोशों का परिचय क्या है?”
ये सब कोश किसके हैं? ये सब कोश जीव के हैं—शुरुआत हमेशा यहाँ से करो, ये अध्यात्म का सूत्र है।
उपनिषदों को पढ़ना भी अपने आप में एक कला है, लगातार पूछते रहना पड़ता है कि ये जो बात कही जा रही है, किससे कही जा रही है, किसके लिए कही जा रही है। जिनको आध्यात्मिक ग्रंथों को पढ़ना नहीं आता या जिनको आध्यात्मिक वार्ता को सुनना नहीं आता, वो पढ़ने और सुनने से पहले तो पढ़ने-सुनने की कला विकसित करें। एक खास तरीका होता है इन ग्रंथों को पढ़ने का या इन वार्ताओं को सुनने का, जिनको वो तरीका नहीं आता, वो अर्थ का अनर्थ कर लेते हैं, उन्हें लाभ नहीं होता, उन्हें क्रोध वगैरह ज़्यादा आ जाता है। उन्हें लगता है, “ये क्या बात हो रही है ऐसी-वैसी?“
तो ये जो जीव है, इसमें जो चीज़ सबसे बाहर है, उसको कहते हैं अन्नमय-कोश। अन्नमय-कोश माने वो सब कुछ जो बाहर से ले करके बना है—बाहर से अन्न ले करके, जल ले करके, हवा ले करके, धूप ले करके जिसका निर्माण हुआ है, उसको कहते हैं अन्नमय-कोश। तो शरीर का रेशा-रेशा कहलाता है अन्नमय-कोश।
इस अन्नमय-कोश में, अगर हम अस्तित्व की ही बात कर रहे हैं, तो अन्नमय-कोश से भी बाहर का एक कोश तुम और जोड़ सकते हो। अगर पाँच कोश हैं तो एक छठा कोश भी जोड़ा जा सकता है, छठा कोश बताओ क्या होगा?
भीतर से बाहर की ओर आते-आते जो तुम्हें सबसे बाहरी कोश मिला, वो है अन्नमय-कोश, ये (हथेली की ओर इशारा करते हुए)। इससे भी बाहर एक कोश और तुम कह सकते हो कि होता है, हालाँकि शास्त्रीय तौर पर उसका कोई उल्लेख नहीं है लेकिन फ़िर भी कह सकते हो, क्या? संसार। तो सबसे बाहरी कोश तो संसार है। मैं उसको इसलिए जोड़ना चाहता हूँ क्योंकि संसार भी है तो हमारे ही अस्तित्व का हिस्सा न?



