कमजोर हो इसलिए तुम सहारे नहीं पकड़ते, सहारे पकड़ते हो इसलिए कमजोर हो। जो तुम्हारा सहारा बनकर बैठा है तुम्हारे भीतर, वही कारण है तुम्हारी कमजोरी का। उसी को दफ़ा करो, चाहे वो व्यक्ति हो, चाहे सिद्धांत हो, चाहे वस्तु हो, चाहे ज्ञान हो, चाहे कुछ हो। जिसका भी सहारा लिए बैठे हो न, वही कमजोरी है तुम्हारी।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। व्हेन आई सी माइसेल्फ, द सीइंग इज़ फॉलोड बाय अ लॉट ऑफ क्रिटिसिज़्म, गिल्ट एंड शेम। तो, वो जस्ट सी नहीं हो पाता।
आचार्य प्रशांत: हैव यू सीन हू इज़ द क्रिटिक? ये ऐसी-सी बात है कि मैं अपनी दोस्त से मिलने जाती हूँ, और दोस्त रहती है मैं दरवाज़ा खोलती हूँ उसके घर का, तो मैं दोस्त को खड़ी पाती हूँ और आई हियर अ लॉट ऑफ क्रिटिसिज़्म डायरेक्टेड एट हर। तो फिर उस घर में एक नहीं, दो होंगे, एक आपकी दोस्त और एक क्रिटिक भी होगा।
ये आपने दरवाज़ा कैसा खोला कि आपने बस अपनी दोस्त को देखा और क्रिटिसिज़्म सुना, पर जो क्रिटिक था, जो आलोचक था, जो निंदक था, उसको तो आपने देखा ही नहीं। तो फिर आपने क्या देखा? मतलब, आपने दरवाज़ा ही पूरा नहीं खोला। आपने स्वयं को देखा, चलो स्वयं को देखा और स्वयं को देखते ही तमाम तरह की गालियाँ कान में पड़नी शुरू हो गईं कि “मैं ऐसी हूँ, मैं वैसी हूँ, मैं बेकार हूँ, मैंने ये किया, मैं किसी काम की नहीं हूँ।”
पर ये गाली देने वाला कौन है? उसको भी देखा कि नहीं देखा?




