आज़ाद जीती हूँ तो अंदर से विरोध उठता है

Acharya Prashant

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आज़ाद जीती हूँ तो अंदर से विरोध उठता है
कमजोर हो इसलिए तुम सहारे नहीं पकड़ते, सहारे पकड़ते हो इसलिए कमजोर हो। जो तुम्हारा सहारा बनकर बैठा है तुम्हारे भीतर, वही कारण है तुम्हारी कमजोरी का। उसी को दफ़ा करो, चाहे वो व्यक्ति हो, चाहे सिद्धांत हो, चाहे वस्तु हो, चाहे ज्ञान हो, चाहे कुछ हो। जिसका भी सहारा लिए बैठे हो न, वही कमजोरी है तुम्हारी। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। व्हेन आई सी माइसेल्फ, द सीइंग इज़ फॉलोड बाय अ लॉट ऑफ क्रिटिसिज़्म, गिल्ट एंड शेम। तो, वो जस्ट सी नहीं हो पाता।

आचार्य प्रशांत: हैव यू सीन हू इज़ द क्रिटिक? ये ऐसी-सी बात है कि मैं अपनी दोस्त से मिलने जाती हूँ, और दोस्त रहती है मैं दरवाज़ा खोलती हूँ उसके घर का, तो मैं दोस्त को खड़ी पाती हूँ और आई हियर अ लॉट ऑफ क्रिटिसिज़्म डायरेक्टेड एट हर। तो फिर उस घर में एक नहीं, दो होंगे, एक आपकी दोस्त और एक क्रिटिक भी होगा।

ये आपने दरवाज़ा कैसा खोला कि आपने बस अपनी दोस्त को देखा और क्रिटिसिज़्म सुना, पर जो क्रिटिक था, जो आलोचक था, जो निंदक था, उसको तो आपने देखा ही नहीं। तो फिर आपने क्या देखा? मतलब, आपने दरवाज़ा ही पूरा नहीं खोला। आपने स्वयं को देखा, चलो स्वयं को देखा और स्वयं को देखते ही तमाम तरह की गालियाँ कान में पड़नी शुरू हो गईं कि “मैं ऐसी हूँ, मैं वैसी हूँ, मैं बेकार हूँ, मैंने ये किया, मैं किसी काम की नहीं हूँ।”

पर ये गाली देने वाला कौन है? उसको भी देखा कि नहीं देखा?

वो गाली देने वाला ये समाज है, ये अतीत है, ये लोकधर्म है। ये वही रामपुर वाली फूफी है, सिलिकॉन वैली वाला डूड है। यही सब हैं जो भीतर घुसे हुए हैं। इनको भी तो देखिए न। इन्हीं से तो मुक्त होना है।

क्या कह रहे हैं आज — कि मेरे जितने अनित्य विषय हैं, सबको जाकर आग में फेंक दिया। यही सब तो आपके विषय हैं, यही तो आपके क्रिटिक हैं। इन्होंने ही तो आपको बोला कि ऐसे-ऐसे होना और अगर ऐसे नहीं होओगी तो हमसे गाली खाओगी, और इन्होंने आपको ऐसी गालियाँ सुनाईं कि वो गालियाँ भीतर घुस गईं आपके। अब गाली खाने के लिए उनकी सशरीर उपस्थिति की ज़रूरत भी नहीं पड़ती, वो नहीं भी हों तो भी आपको अपने भीतर उन गालियों की अनुगूंज सुनाई देती है।

कोई बच्चा हो, उसे बचपन में बात-बात में नाकारा घोषित करो, करते ही जाओ, करते ही जाओ, करते ही जाओ एक-डेढ़ दशक तक। उसके बाद जो नाकारा घोषित कर रहे थे वो मर-मुरा गए, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। वो बच्चा बड़ा भी हो जाएगा तो जो उसको गालियाँ पड़ी हैं न, वो उसके चित्त में गूंजती रहेंगी। अब ज़रूरी नहीं कि कान पर पड़ें, कान पर पड़े बिना ही मन पर पड़ती रहेंगी। वो हैं आलोचक, उनको भी तो देखिए।

अच्छा, तो ठीक है तो ऐसे, तो मैं गई मुझे किसी प्रतियोगिता में भाग लेना था और मैंने देखा, मेरा ऐसा प्रदर्शन रहा। ये तो आपने स्वयं को देखा। ठीक है, आप थीं आपका प्रदर्शन था, यहाँ तक ठीक है। अब उसके बाद आपको आवाज़ें सुनाई दे रही हैं — अभागी कहीं की, बिना बात की, बेकार, यूज़लेस। ये आवाज़ किसकी है? ये नहीं आपने देखा। ये आपकी तो आवाज़ नहीं हो सकती, आप तो प्रतियोगिता में थीं, आप तो दौड़ लगा रही थीं। आप जीत रही थीं कि हार रही थीं, आप जैसी भी थीं आप मैदान में थीं। ये गाली-गलौज आपसे कौन कर रहा था? वो भी तो देखिए।

और फिर अपने आप से पूछिए, मैंने उसको हक़ क्यों दे रखा है अभी भी मेरे मन में बैठे रहने का? ये कौन है जो अतिक्रमण, इन्क्रोचमेंट करके भीतर बैठ गया है और गालियाँ सुना रहा है। हाउ डेयर यू? कोई आपके शरीर को थोड़ा सा छू दे तो आपको बड़ा बुरा लगता है, ख़ासकर महिलाओं को। और कोई आपकी हस्ती के भीतर ही प्रवेश करके बैठ गया है, ये तो कितनी गंदी बात है न। कितनी गंदी बात है। और बैठ ही नहीं गया है, वो थूक रहा है वहाँ बैठ कर के, वो गंदगी मचा रहा है वहाँ बैठ के। गंदी बात है न? बहुत गंदी बात है।

बड़े से बड़े शारीरिक उल्लंघन से ज़्यादा गंदा उल्लंघन है ये, कोई आपके भीतर ही घुस के बैठ गया है और वो क्या कर रहा है? टट्टी कर रहा है। क्या करना चाहिए? लात मार के बाहर निकालो। और लात कैसे मारी जाती है? बस जान के।

दरवाज़ा जब खोलो आत्मवलोकन में तो आधा मत खोलो, पूरा खोलो।

डर जाते हो पूरा खोलने में। यहाँ छोटे बच्चे होते हैं न, वो इतना-सा (थोड़ा सा) खोल के ऐसे झाँकते हैं। जवान हो, पढ़े-लिखे हो, हिम्मत दिखाओ न, ऐसे पूरा पल्ला फेंक दो — “हाँ, क्या चल रहा है भीतर?” ये जो तुम्हारी नज़र होगी, यही भीतर वालों को बाहर कर देगी। एक बार दहाड़ के पूछो तो — “हाँ, कौन घुसा हुआ है भीतर? हाँ साहब, क्या समस्या है? ये गाली-गलौज मैंने सुनी। आपने दी क्या?”

“अरे, नहीं मैं।”

भाग जाएगा। तुम ख़ुद ही अपने आप को दब्बू दिखा देते हो, पहले ही क़दम पर दरवाज़ा भी ऐसे खोलते हो (धीरे-धीरे), एक आँख से देखते हो। और कई बार तो बिना खोले की-होल से देखते हो। कई बार कान ले जाकर बस सुन लेते हो कि अंदर जो है, नरक मचा हुआ है। खटखटा मत देना, भाग लो बाहर से ही।

भीतर आप यदि हैं, अच्छे से समझिए तो आपके विषय भी होंगे। अहम् कभी अकेला नहीं रह सकता। इससे आत्मवलोकन के बारे में हमें एक बड़ी, ज़बरदस्त बात पता चलती है। आप कभी कहें कि मैंने ख़ुद को देखा और सिर्फ़ ख़ुद को देखा, तो आपने कुछ नहीं देखा। क्योंकि अहंकार तो हमेशा जोड़े में होता है — जीव और जगत, विषयता और विषय, दृष्टा और दृश्य, अनुभोक्ता और अनुभव। जब भी आप देखेंगे सचमुच, तो हमेशा दो को देखेंगे।

पर आप कहते हैं, मैं तो ख़ुद को देख रहा हूँ, ख़ुद को। आप ख़ुद को कैसे देखोगे? तुम हो ही नहीं अकेले। हमेशा कोई और भी होगा। वो जो दूसरा है न दूसरा, द अदर इज़ हेल। अब ये किसने बोला है खोज के लाओ, द अदर इज़ हेल।

अकेले जो रह ले, वो तो आत्मा है। जिसको सदा जोड़ा बनाना है, वो अहंकार है।

तो आत्मवलोकन का मतलब है कि एक नहीं, सदा दो दिखने चाहिए। वो दूसरा कौन है? जाओ खोज के लाओ। वो दूसरा ही हेल है। भीतर अपने देखोगे तो कोई बहुत हिमालय की सुंदर, नैनाभिराम चोटियाँ तो दिखाई देंगी नहीं। इधर (देह) कचरा, यही दिखाई देता है। वो फैलाया किसने है? कौन है जो भीतर घुसा हुआ है? उसी को निकालना है। यही निर्वाण है, यही कैवल्य है। “अहमेव ही केवलम्,” मेरे भीतर बस मुझे होना चाहिए किसी और को नहीं।

लेकिन भीतर जो बैठ गया है न बिल्कुल लठ गाड़ के, वो बड़े दावे ठोकता है। कहता है, “हमारी ज़मीन है, हम यहीं रहेंगे, हक़ है हमारा।” उसने लठ गाड़ रखा है, तुम्हें लठ चलाने की कोई ज़रूरत नहीं — ज्ञान ही आग है, तुम्हारी नज़र काफ़ी है। ज्ञान में एक ही हथियार होता है — क्या? नज़र तुम्हारी, ये आँखें। इसीलिए जानने को सीइंग भी बोलते हैं। अच्छे से देख लो बस, अच्छे से देख लो ये जो भीतर बैठे हैं ये सब रफ़ूचक्कर हो जाएँगे। ये भीतर बैठे ही हैं क्योंकि तुमने इनके सामने नज़रें झुका रखी हैं।

नज़रें झुकाओ मत — ऐसे, रीढ़ सीधी, आँख खुली। अच्छा सूत्र है — देखो, रीढ़ सीधी, आँख खुली। “अनधिकृत कब्ज़ा हटाओ आंदोलन।” ट्रेसपासर्स शैल बी प्रॉसिक्यूटेड। कुछ आ रही है बात समझ में? या आप में और बात के बीच में फूफी बैठी है फील्डिंग सजा के, जितनी भी मैं गेंदें फेंक रहा हूँ सब फूफी ने लपक लीं। बहुतों के साथ होता है। कहते हैं, “कुछ समझ में नहीं आता, आचार्य जी बोलते तो हैं पर हम तक कुछ नहीं पहुँचता।” क्योंकि बेटा, तुमने अपने आगे बैठा रखी है फूफी और मैं जो भी कुछ भेजता हूँ, वो लपक लेती है। तुम पीछे ऐसे बैठे हुए हो (मुँह खोल के)। फूफी बड़ी चंट है, बाबा जी का आशीर्वाद है उस पर।

आपके भीतर आपका टॉरमेंटर, आपका पर्सिक्यूटर बैठा हुआ है, आपका शुभेच्छु बनकर, आपका प्रोटेक्टर बनकर। पर्सिक्यूटर पोज़िंग ऐज़ प्रोटेक्टर। पर्सिक्यूटर को पहचानें कैसे? जो अपने आप को प्रोटेक्टर बोलता हो वही है। किसी सुरक्षा की, किसी सहारे की आपको ज़रूरत है नहीं।

क्या कहा था?

कमजोर हो इसलिए तुम सहारे नहीं पकड़ते, सहारे पकड़ते हो इसलिए कमजोर हो।

जो तुम्हारा सहारा बनकर बैठा है तुम्हारे भीतर, वही कारण है तुम्हारी कमजोरी का। उसी को दफ़ा करो, चाहे वो व्यक्ति हो, चाहे सिद्धांत हो, चाहे वस्तु हो, चाहे ज्ञान हो, चाहे कुछ हो। जिसका भी सहारा लिए बैठे हो न, वही कमजोरी है तुम्हारी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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