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आराम करने में मज़ा आता है?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
26 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, पिछले सत्र में आपने कहा था कि साहस की कमी है, तो मैंने ये रियलाइज़ करा कि मैं चीज़ों को छोड़ कर भाग जाता हूँ, उसका सामना नहीं करता हूँ। तो उसपर काम कर रहा हूँ। आपने दूसरी चीज़ भी बताई थी, संकल्प को लेकर के। संकल्प के लिए मैं कोशिश कर रहा हूँ लेकिन तमसा बहुत ज़्यादा हावी हो जा रही है, उससे मैं बाहर नहीं निकल पा रहा हूँ। उससे बाहर कैसे निकलूँ?

आचार्य प्रशांत: क्यों निकलें बाहर? तमस समझते हैं न क्या होता है? बहुत तरीकों से उसका वर्णन किया गया है पर इस प्रश्न के सन्दर्भ में मैं एक और तरीके से कहे देता हूँ। जैसे माँ की कोख, वहाँ प्रकाश तो नहीं होता, पर परेशानी भी नहीं होती। गर्भ में कौन-कौन परेशान था हममें से? और गर्भ में कौन-कौन चैतन्य था हममें से? कोई था जिसको ज़रा होश था, कुछ खबर थी दुनिया में, क्या हो रहा है क्या नहीं हो रहा है? दुनिया छोड़ दो माँ को भी क्या हो रहा है, ये गर्भ के शिशु को पता होता है?

ये तमस है, उदाहरण के लिए कह रहा हूँ, तमस है ये। क्यों बाहर आएँ, ज़रुरत क्या है? जब आराम है वहाँ पर, कोई फ़िक्र नहीं, तो तमसा छूटे क्यों? यही वजह है कि ज़्यादातर लोगों की तमसा नहीं छूटती। आराम है न, कोई आके झिंझोड़ नहीं रहा, कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। अपने लिए खुद दायित्व उठाते हुए कुछ प्रबंध नहीं करना।

पैदा हो गए अगर होश में, रौशनी में, तो माँ कितनी भी करीब हो आहार के लिए फिर भी चिल्लाना तो पड़ेगा, नहीं तो माँ भी नहीं उठाएगी। तमसा ऐसी ही है। हममें से ज्यादातर लोग इसीलिए कहा जाता है कि कभी पैदा ही नहीं होते। क्योंकि पैदा होने का मतलब ही है कि जान जाओ कि कुछ काम करना है।

जो बच्चा पैदा होता है उसे कोई बड़ा काम भले ही नहीं समझ में आता करने के लिए पर इतना काम तो वो भी समझ जाता है कि आहार चाहिए। गर्भ में एकदम कुछ काम नहीं करना पड़ता था, पैदा होते ही एक काम तो उसके लिए अनिवार्य हो जाता है, क्या? रोना। रोएगा नहीं तो माँ छाती से नहीं लगाएगी, रोएगा नहीं तो पुतड़े नहीं बदले जाएँगे। हो सकता है मच्छर काट रहा हो बैठ करके, रोएगा नहीं तो कोई आकर के मच्छर-मक्खी हटाएगा नहीं।

तो पैदा होने का मतलब ही होता है ज़िम्मेदारी में पैदा होना। हम ज़िम्मेदारियाँ उठाना नहीं चाहते। अब क्यों नहीं उठाना चाहते मत पूछो मैं क्या बताऊँ, ऐसे ही हैं हम। बात ये नहीं है कि क्यों नहीं उठाना चाहते, बात ये है कि नहीं उठाना चाहते तो उसके दुष्परिणाम क्या हैं? वो भोगते रहने को तैयार हैं तो मत उठाइए।

सुबह बिस्तर से उठना किसको अच्छा लगता है? कौन यहाँ ऐसा है जिसको भीतर से ये भाव नहीं उठता सुबह-सुबह कि, "बस पंद्रह मिनट और!" तो आप अगर इस प्रश्न में जीएँगे कि ये वृत्ति हममें होती ही क्यों है, तो ज़्यादा कुछ मिलेगा नहीं। स्वयं उपनिषद् भी कहते हैं कि एक सीमा के बाद ये क्यों क्यों मत पूछा करो, एक बार जान जाओ कि चीज़ क्या और उसका तुमपर प्रभाव क्या है, फिर सार्थक कर्म करो। क्यों का मतलब होता है पीछे जा रहे हैं, पीछे जा रहे हैं, पीछे जा रहे हैं, और अनंत श्रृंखला है। पीछे जाते रहो समय बीतता रहेगा मन बहलता रहेगा, कुछ मिलेगा नहीं।

जब तक आप जीवन में अपनी ज़िम्मेदारी को नहीं पहचानेंगे, जब तक आपको नहीं दिखाई देगा कि आपके पास करने के लिए कोई काम है। तब तक आपको गर्भस्त शिशु बने रहने में कोई समस्या आने ही नहीं वाली। मौज है कि नहीं गर्भ में पड़े रहने में बोलो तो? खाना तो छोड़ दो कि कोई और दे देता है, खाना भी दे देता है उसको ऐसा भी नहीं होता कि टट्टी पेशाब हो गई तो सफ़ाई करनी पड़ती है। उन सब चीज़ों का प्रबंध भी गर्भ के अंदर स्वतः होता रहता है।

क्या मौज है, कुछ करना ही नहीं। और देखते नहीं हो जो लोग पैदा भी हो गए हैं, ले दे करके उनका भी जो आदर्श होता है, वो यही होता है कि किसी तरीके से जीवन में ऐसी जगह पर पहुँच जाएँ जहाँ कुछ करना न पड़े, बस मौज-ही-मौज हो। होता है कि नहीं? कहीं और से पैसा आ जाए मुफ़्त का, कहीं और से आराम, अय्याशी मिल जाए। न कोई धर्म हो न कोई कर्तव्य हो, न किसी को जवाबदेही हो। हम कर क्या रहे हैं? आराम।

चिल मारने का जो पूरा कांसेप्ट है, आधुनिक वो और क्या है? जब आप कहते हो कि चिल मारना है उसका और क्या मतलब होता है? अब सैद्धांतिक बहस में मत पड़िएगा कि चिल ये और वो। आप दुनिया में देखते हैं न लोगों को, जब लोग कहते हैं कि, हैविंग अ गुड टाइम (अभी अच्छा समय बिता रहा हूँ), तो उसका क्या अर्थ होता है? यही अर्थ होता है कि अभी साहब कुछ करने के लिए नहीं है। कोई कान उमेठने वाला नहीं है, न बाहर से न भीतर से। न तो बाहर कोई है जिसको जवाबदेही है, न भीतर कोई बैठा है जो पूछ रहा है कि, "ये तेरा धर्म था पालन किया कि नहीं किया?" तो फिर हम क्या बोलते हैं? *आइ एम हैविंग अ गुड टाइम*। ऐसा है कि नहीं? यही तमसा है।

तो हम जन्म से तो ऐसे होते ही हैं, बल्कि गर्भ से तो ऐसे होते ही हैं। जब आप पैदा भी होते हो तो आज की संस्कृति और समाज आपको जो उच्चतम आदर्श दे रहा है वो भी तमसा का ही है। आपसे कहा जा रहा है कि कुछ ऐसा जुगाड़ करो कि जीवन में ऐसी जगह पर पहुँच जाओ जहाँ चिल मार सको।

मैंने अभी तक कोई समाधान नहीं बताया, समाधान मेरे पास है भी नहीं। समाधान आपको खुद खोजना है, मैं बस बता रहा हूँ कि आप जिस तमसा की बात कर रहे हो वो कोई ऐसा नहीं है कि बिमारी है बाहरी जो आ कर के यूँ ही आपकी खाल से चिपक गई है। वो आपके रेशे-रेशे में बैठी हुई वृत्ति है। गर्भ से ही आपमें होती है।

हाँ उसका समाधान ऐसे ज़रूर हो सकता था कि अगर ज़रा जागरूक समाज होता, शिक्षा व्यवस्था थोड़ी चैतन्य होती तो ये सब बाते आपको बचपन से बताई जाती। लेकिन ये तो छोड़ दो कि बचपन से हमें ये बताया जाए कि आप पैदा ही हुए हो सही काम करने के लिए, बचपन से ही हर तरीके से हमारे मन में ये आदर्श डाल दिया जाता है कि आप पैदा हुए हो ताकि अय्याशी कर सको।

तुम मुझे बताओ जिसको पॉपुलर कल्चर कहते हैं, प्रचलित संस्कृति, उसमें मुझे एक आज के समय का गीत बता दो, कहानी बता दो, किरदार बता दो, नायक बता दो जिसको तुम इसलिए पूजते हो क्योंकि वो ज़बरदस्त रूप से मेहनती है। और होंगे भी ऐसे तो सौ में एक या दो। अठानवे, निन्यानवे कौन हैं जो हमें बहुत पसंद हैं? जो हमें दिखाई देते हैं चिल मारते हुए।

और कभी तुम पूछते नहीं कि ये जो बैठे हुए हैं इस समय आराम के शिखरों पर, रत्न जड़ित पलंगों पर, ये सब इनको मिला कहाँ से, ये आया कहाँ से? अभी उस दिन बेंगलुरु में शिविर था तो मैं पूछ रहा था न सबसे कि ये तुम करते तो हो गूची , अरमानी , और बी एम डब्ल्यू , और ऑडी , ये आई कहाँ से, ये तो बताओ। ये तमसा ही है।

उस सोने के पलंग पर लेट करके कुछ वैसी ही भावना आएगी जैसी माँ के गर्भ में आया करती थी। हम पैदा ही ऐसे होते हैं।

अब कुछ करना हो तो इस बारे में करिए, नहीं तो इसीलिए तो भारत में मुहावरा चला है, अनंत जन्मों का। वो हमारे ही जैसे लोगों का मन बहलाने के लिए है, कि बड़ी लम्बी यात्रा है, अनंत जन्म लगते हैं। "भाई तुझे मेहनत करने की कोई ज़रुरत नहीं, यात्रा ही कुछ ज़्यादा लम्बी है, इसमें तो लगने ही अनंत जन्म हैं।" तो इस जन्म में मेहनत करने का दायित्व अपने-आप कम हो गया। "हम क्या करें! यात्रा इतनी लम्बी है कि कम-से-कम छह-सात-सौ जन्म तो लगेंगे न? सभी के लगते हैं छह-सात-सौ जन्म तो हमें बहुत मेहनत क्यों करनी है, इस जन्म में हो क्या जाएगा? जस्ट चिल !"

तो जो आलसी हैं वो तो हैं ही आलसी, जो मेहनती भी हैं, वो भी मेहनती इसीलिए हैं ताकि एक दिन आलसी बन सकें। यही उच्चतम आदर्श है हमारा। जिनको पाओ भी कि ज़बरदस्त रूप से घिसाई कर रहे हैं। वो क्यों कर रहे हैं? कि बस जल्दी-से-जल्दी वो एक लम्हा आ जाए जब हमें करने को कुछ नहीं है, और मालदीव में किसी बीच पर पड़े हुए हैं बिलकुल आराम करते हुए।

उच्चतम आदर्श ही क्या हो गया? आखिरी मंज़िल ही फिर हमारी क्या है? अय्याशी। तो तुम्हारे भीतर का गणितज्ञ कहता है कि, "जब वो आखिर में अय्याशी ही करनी है किसी बीच पर लेट करके तो सुबह-सुबह अपने बिस्तर पर ही क्यों न कर लें?" और ये तर्क बहुत गलत भी नहीं है भाई। कि है? जब दुनिया भर की मेहनत करनी ही इसलिए है कि एक दिन कहीं पर लेट कर तुम अय्याशियाँ करो, तो वही अय्याशी अपने बिस्तर पर ही क्यों न कर लें, सोए पड़े रहो!

वही हालत आपने अभी बयान करी, कि पड़े रहते हैं। तो सवाल व्यक्तिगत है लेकिन स्थिति सार्वजनिक है। ये जो आपने बात पूछी न, एक-एक बंदे की हालत यही है। मैं कह रहा हूँ कि यहाँ पर जो लोग मानते हैं कि वो आलसी हैं वो भले, जो कहते हैं कि मेहनती हैं वो तो मेहनत के रास्ते आलस तक की यात्रा कर रहे हैं। "बस एक बार, किसी तरह से वो ख़ास नौकरी लग जाए, उसके बाद जीवन भर का चैन हो जाएगा।" बड़ी मेहनत कर रखी है, ज़मीन आसमान एक कर रखा है, किसलिए? बोलो न!

कि वहाँ तक पहुँच जाएँ फिर कुछ करने को नहीं होगा।

इसमें सम्बंधित कुछ बातें दिखाई दे रही हैं? जो काम आप कर रहे हो वास्तव में आप उससे करते हो नफ़रत और आप चाहते हो कि हो जाए वो जल्दी-से-जल्दी ख़त्म। चाहते आप यही हैं कि बस जल्दी-से-जल्दी ये काम ख़त्म हो और उस एक जगह पर पहुँच सकें जहाँ पलंग तोड़ा जाएगा। काम कर रहे होगे कुर्सी और मेज पर बैठ करके, पर इस मेज से प्यार नहीं है। न इससे (नोटबुक से) प्यार है न इससे (कलम से) प्यार है, हो सकता है तुम्हारे हाथ में जो कलम हो उसमें बड़ी ताकत हो। किसी बड़ी संस्था में पदाधिकारी हो सकते हो, सरकारी ओहदा हो सकता है, कलम में बड़ी ताकत है, पर कलम से प्यार नहीं है।

चाहते यही हो कि इस कलम का इस्तेमाल कुछ और पाने के लिए कर लूँ। और इसी को मैं दस साल से समझा रहा हूँ कि ये जीवित नर्क है। जब आप जो कर रहे हो वो उचित ही नहीं है, तो आपको उससे होता नहीं प्रेम, और जब उससे प्रेम नहीं होता तो जी कैसे लेते हो क्षण-प्रतिक्षण? अभी जी रहे हो, ठीक अभी किस भाव में जिए? प्यार नहीं था, उकताहट थी, बेसब्री थी, इंतज़ार था, कि ये पल बीते जल्दी से। फिर अगले पल में आए, वहाँ भी क्या है? उकताहट।

समझिएगा, मैं उस घिसीपिटी धारणा की बात नहीं कर रहा जिसमें कहा जाता है कि, " लिव इन द प्रेसेंट (वर्तमान में जिओ) और द मैग्निफिसेंसे ऑफ़ नाओ (वर्तमान की सुंदरता)।" समझ रहे हो? वर्त्तमान में जीना इत्यादि, ना, ना, ना।

वो कहते हैं कि ये क्षण ही अपने-आपमें संपूर्ण है, तुम इसी में जिए जाओ। नहीं, सच्चाई तो ये है कि इस क्षण में जो तथ्य है वो कतई अपूर्ण है। बहुत कुछ है जो गलत है। तो फिर इस क्षण में जीएँ कैसे? आग लगी हुई है चारों तरफ़, और हम उस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। हम नहीं कह सकते कि ये क्षण अपने-आप में पूर्ण है, परफ़ेक्ट है। नहीं, हमें दिख रहा है आग लगी हुई है, मैं कैसे मान लूँ कि जो है वही है? न, बिलकुल भी नहीं।

तो फिर जीएँ कैसे? जीने का तरीका समझिएगा। जीने का तरीका ये है कि, "हाँ, चारों तरफ आग लगी हुई है पर मैं जो अधिकतम, और उच्चतम कर सकता हूँ वो मैं अपनी ओर से कर रहा हूँ।" ये है जीने का तरीका। समझ में आई बात?

न तो ये कर देना है, जैसा कि आधुनिक अध्यात्म में चलने लगा है, कि एक्सेप्ट थिंग्स एस दे आर, इट इस जस्ट लाइफ़ (चीज़ों को जैसा है वैसा स्वीकार करो, यही तो जिंदगी है)। बहुत तरह के बेशर्म और बद्तमीज़ जुमले उछाल दिये गए हैं अध्यात्म के नाम पर। शायद मुझसे ज़्यादा आपको पता हों। ‘जो है सो है।’ और? ‘कुछ भी हो रहा हो मौन रहो, जहाँ बोलना भी चाहिए वहाँ मौन सर्वश्रेष्ठ है।’

प्रश्नकर्ता: पर्पस ऑफ़ लाइफ़ इस टु बी हैप्पी (जीवन का लक्ष्य खुशी है)।

प्र२: नथिंग नीड्स टु बि चेंज्ड (कुछ भी बदलने की ज़रूरत नहीं है)।

प्र३: हरि जो चाहें सो होय।

आचार्य: (व्यंग्य करते हुए) "भगवान ने जो करा अच्छे के लिए ही करा तुम उसे बदलने वाले होते कौन हो? तुम भगवान से ज़्यादा होशियार हो? भई ये दुनिया किसने बनाई? भगवान जी ने। दुनिया को चला कौन रहे हैं? भगवान जी चला रहे हैं। तो तुम कहाँ के क्रांतिकारी आ गए जी? तुम काहे बता रहे हो ये ठीक नहीं है, ये ठीक है, ये बदलो, वो बदलो। जो है बिलकुल एकदम ठीक है। और जो होता है भले के लिए ही होता है बस तुम्हें पता नहीं चलता क्योंकि तुम भगवान जी नहीं हो।"

हम ये सब जुमले ले करके बैठे हैं। नहीं मैं इनकी बात नहीं कर रहा हूँ। ये बातें न सिर्फ़ मूर्खतापूर्ण हैं, बल्कि खतरनाक हैं। इनमें बेवकूफ़ी ही नहीं है, इनके पीछे साज़िश है। बेवकूफ़ी में तो फिर भी जैसे एक भोलापन होता है। इनमें भोलापन नहीं है, इनमें भयानक कुटिलता है। तो मैं उस छोर की बात नहीं कर रहा जहाँ कहा जाता है कि सब ठीक है। और अगर कुछ बदलेगा भी तो रामकृपा से बदलेगा क्योंकि उसकी मर्ज़ी बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता। नहीं, उसकी बात नहीं कर रहा मैं।

वो कोई ऊपर थोड़े ही बैठा है, वो पत्ता हिलाना चाहता है तो कैसे हिलाता है? वो आपके माध्यम से हिलाता है। तो अगर आपके भीतर की सच्चाई पुकार कर कह रही है कि, "पत्ता ही नहीं हिलाना है, मुझे सिंहासन हिला देने हैं!" तो ये राम की मर्ज़ी हुई कि नहीं हुई? तो फिर आपने कैसे कह दिया कि, "जो करना होगा राम करेगा, हम होते कौन हैं करने वाले"? राम के अपने हाथ, अपने पाँव हैं? राम उतरेंगे ज़मीन पर कुछ करने के लिए? आज तो राम को जो भी कराना है वो आपके माध्यम से कराएँगे न। तो आपके भीतर जो राम बैठा है, आप उसको उसका काम करने क्यों नहीं देते?

तो इसलिए मैं उस सिरे की बात नहीं कर रहा हूँ। न मैं उस सिरे की बात कर रहा हूँ जो क्या कहता है कि मौज करो।

एक तरफ़ ये साफ़-साफ़ मानना भी है कि ज़बरदस्त गड़बड़ हैं चीज़ें। और दूसरी तरफ़ ये भी जानना है कि जीना तो इसी के बीच में है। ये कैसे करें? जब पता है कि सब कुछ ग़लत ही हो रहा है तो उसके बीच में जीएँ कैसे? लगातार यही बताते रहें अपने-आपको कि सब कुछ गलत है तो तनाव से और रक्तचाप से ही मर जाएँगे। ये करें कैसे कि सब जान भी रहे हैं कि सब ग़लत है, जो ग़लत है उसके ख़िलाफ़ जी जान से लड़ भी रहे हैं, लेकिन फिर भी भीतर से एकदम शांत हैं। ये करें कैसे?

ये आपकी तमसा का इलाज बता रहा हूँ, समझिएगा। इसका तरीका एक ही है, ‘सम्यक कर्म’। सही काम में अपने-आपको आकंठ डुबो देना। बल्कि आकंठ ही नहीं, पानी सर से ऊपर निकल जाने दीजिए। पूरे ही डूब जाइए। और क्या बोलिए? "हाँ चीज़ें बहुत खराब हैं, और जो मैं अधिकतम कर सकता हूँ—मुझे दो छोटे हाथ ही दिए हैं—जो मैं अधिकतम कर सकता हूँ—मुझे बस इतनी ही शक्ति दी है—उसको मैं यथासंभव, यथा शक्ति, पूरी ईमानदारी के साथ कर रहा हूँ। यही जीवन है मेरा।"

अब इसमें न तो ये धोखेबाज़ी है कि सब ठीक है, एवरीथिंग इस ऑलरेडी ऑलराइट (सब पहले से ही ठीक है), उस तरह की धोख़ेबाज़ी भी नहीं है, और न ये है कि सब कुछ गलत है तो मैं तो तनाव से ही मर जाऊँगा। या जो चल रहा है उसके प्रति मेरी कोई ज़िम्मेदारी ही नहीं। अब आप जो कह रहे हैं वो बात पूरी इमानदारी की है। कि, "मैं मान तो रहा हूँ कि बहुत कुछ है जो कि किया जाना चाहिए, मैं ये भी मान रहा हूँ कि जो किया जाना चाहिए वो इतना बड़ा है कि मुझ एक अकेले से शायद निपटेगा भी नहीं, मेरी एक ज़िन्दगी बहुत छोटी है उसके लिए, लेकिन मैं ये भी कह रहा हूँ कि जितनी ताकत और जितनी प्राकृतिक योग्यता लेकर के मैं पैदा हुआ था उसके साथ जो अधिकतम, ज़्यादा-से-ज़्यादा मैं कर सकता था वो मैं कर रहा हूँ।"

अब मैं सर उठा कर जी सकता हूँ, अब मैं अपनी ही नज़रों में अपराधी नहीं हूँ। और जो ये कह रहा है वो तो तमसा से बहुत दूर होगा न। समझ रहे हो?

हमारी वृत्ति चिल्ला-चिल्ला कर कहती है आराम करो, और अध्यात्म आपको ये बताने के लिए है कि आप पैदा मेहनत करने के लिए हुए हो। तो आप कहेंगे, “फिर वो सब क्या है वो जो हमें अध्यात्म के नाम पर बताया जाता था कि विश्राम में रहो इत्यादि, इत्यादि? आचार्य जी आप भी तो जो शिविर करते थे उनका नाम विश्रांति रखा था न, तो हम लोग बोलते थे विश्राम और शान्ति। तो ये फिर मेहनत करें कि विश्राम करें कुछ समझ नहीं आ रहा।" हम विश्राम ही तो करते हैं।

अध्यात्म उस ख़ास विश्राम की बात करता है जो घोर कर्म के बीचों-बीच है। वो विश्राम नहीं जो कर्म से मुँह चुरा कर किया जाता है। वो विश्राम नहीं है, वो चीज़ हराम है। समझ रहे हो?

उस आराम की कला सीखो जो काम के बीचों-बीच मिलता है। काम के बीचों-बीच ऐसे भी कि काम कर रहे हैं और भीतर पूरी सफ़ाई और संतुष्टि है कि जो मैं अधिकतम कर सकता हूँ वो कर रहा हूँ, तो कोई ग्लानि नहीं है भीतर। अपनी सारी ऊर्जा मैंने किसको दे दी है अभी? काम को। तो ऊर्जा बची ही नहीं है भीतर शोर मचाने के लिए। जब सारी ऊर्जा काम को दे दी तो भीतर क्या है एकदम? शान्ति है, मौन है, ये ही असली और एकमात्र मौन है।

कुछ छोड़ा ही नहीं है भीतर कि कु-कु चाएँ-चाएँ करे, है ही नहीं। और अगर भीतर कोई आता है, शोर मचाता है, तो हम उसका कान पकड़ कर बोलते हैं, "चल तू भी काम कर। तूने शोर मचाया इसी से पता चल गया कि तू कहीं छुपा बैठा था।"

दस लोग लगे हैं काम में हमारे, हमारे दस संसाधन हैं, मान लो दस इन्द्रियाँ, ऐसे ही बोल लो। वो सब के सब काहे में लगे हैं? काम में लगे हैं। ये एक बेइमान कहीं छुपा रह गया था। तो अब ये क्या कर रहा है? ये शोर मचा रहा है, तो हमने इसको भी पकड़ लिया है। ऐसे ही पकड़ लिया, शोर मचा रहा था इसलिए पकड़ लिया, शोर नहीं मचाता तो पकड़ा नहीं जाता शायद। शोर मचाते को पकड़ कर बोला कि अब तू भी लग जा। क्या करने में? काम करने में लग जा।

सब कुछ जो तुम्हारे पास है वो काम में ही झोंक दो, फिर शान्ति। तो काम कर रहे हो उस समय भी शान्ति है, फिर थक जाओगे नींद आ जाएगी उसमे भी बहुत शान्ति रहेगी। सोए ही इसीलिए हैं कि उठेंगे और सही काम करेंगे।

सन दो-हज़ार-बारह-चौदह के आसपास का समय होगा, उसकी रिकॉर्डिंग भी शायद अभी पड़ी हो यूट्यूब पर। गुलाल फ़िल्म का गीत था। तुम (स्वयंसेवी) बताओ, सही बोल रहा हूँ न पियूष मिश्रा की आवाज़ में, ‘आरम्भ है प्रचंड'?

स्वयंसेवक: जी।

आचार्य: तो दो-तीन कॉलेजों में छात्र थे उनके साथ करा था। तो वहाँ मैं उनको बोला करता था कि इसमें एक पंक्ति है, बिलकुल ध्यान से पकड़ लो कि, ‘जिस कवि की कल्पना में ज़िंदगी हो प्रेम गीत, उस कवि को आज तुम नकार दो'।

खेद की बात ये है कि सिर्फ़ कवियों की ही कल्पना में ज़िंदगी प्रेम गीत नहीं है। न जाने कहाँ से ये एक घटिया तरीके का अध्यात्म उठा है जिसमें गुरुओं की कल्पना में भी ज़िंदगी प्रेम गीत ही बन गई है। और तुमसे कहा जा रहा है ज़िंदगी और है क्या? रोमांस का एक मौका, तुम तो प्रेम करो।

प्रेम करो! (चेहरे पे खिन्नता दिखाते हुए) जिससे तुम बोल रहे हो कि प्रेम करो उसी का भाई बाहर नशा करके मर रहा है। अगर मुझे प्रेम भी है इससे तो इससे प्रेम करूँ या इसके भाई को बचाऊँ? जवाब तो दे दो! तुम्हारे घर में आग लगी है, तुम अपनी श्रीमती जी को लेकर शयन कक्ष में घुस जाओगे? कि गुरुदेव ने बोला है तुम तो प्रेम करो। और जिसको नहीं दिखाई पड़ रहा कि घर में आग लगी है वो अंधा कम है बेइमान ज़्यादा है। अंधे मात्र होते तो आँच तो पता चलती, खाल तो जलती।

हम एक विशेष समय में खड़े हुए हैं। ये वैदिक युग नहीं है, हम उन कुछ आखिरी पीढ़ियों में से हैं जो पृथ्वी का विनाश देखने को भी बची हुई हैं। आप प्रेम गीत गाना चाहते हो?

और प्रेम ऊँची चीज़ है मुझे प्रेम से समस्या नहीं, पर इस समय प्रेम की उच्चतम अभिव्यक्ति क्या होगी? एक आदमी पड़ा हुआ है सड़क पर, उसका सर फट गया है, खून बह रहा है। प्रेम इसमें है कि तुम उसके होंठ चूमने लगो या इसमें है कि तुम दवा लेने भागो? जवाब दो।

तो ये कौन सा अध्यात्म परवान चढ़ा हुआ है जिसमें आपसे कहा जा रहा है कि कहीं कोई एकांत में ध्यान करे, कहीं सामूहिक नृत्य हो रहे हैं?

सब ठीक हो जाए उसके बाद आपको जितना रास मचाना हो कर लीजिएगा। पर ये समय ज़रा ख़ास है अभी घर में एमर्जेन्सी है। नहीं?

(एक श्रोता को संबोधित करते हुए) गर्दन तो हिला रहे हो, तुम बताओ सोए पड़े रहोगे? प्यार के अभाव का क्या इलाज है? अब मैं क्या बताऊँ तुमको, इसी के आगे तो मैं रोज़ हारता हूँ, *लवलेसनेस*। आलस तुम्हें जितना आता है उतना ही मुझे भी आता है, तुमसे ज़्यादा ही आता होगा पर आलस के अलावा भी मेरे पास कुछ है जो मजबूर कर देता है कि खड़े हो जाओ और करो।

प्र२: आलस न हो शरीर में, मन भी बहुत उत्सुक हो, पूरी ज़ील (उत्साह) हो, लेकिन शरीर मजबूर करे रोगों से तो फिर इसका कोई उपाय बताइए।

आचार्य: शरीर बस एक संसाधन है, आपके पास अनेक अन्य संसाधन भी तो हैं। किसने कह दिया कि जो होना है शरीर से ही होना है? आपके पास बहुत दूसरे संसाधन भी तो हैं। स्टीफ़ेन हॉकिंस का क्या शरीर काम करता था? जब शरीर न हो बिलकुल, पूरी तरह ही न हो, तो भी आपका काम चलता रह सकता है। आप दूसरे तरीके से काम करिए न। कुछ दिनों तक मेरा एक कन्धा खराब रहा, मैंने काम रोक दिया क्या? मैं क्या कर रहा था? दूसरा हाथ काहे के लिए है!

जब आपका एक संसाधन किसी वजह से टूट जाता है तो ज़ाहिर सी बात है आप क्या करोगे? वही काम करने का दूसरा तरीका निकालोगे। आप कहोगे, "अच्छा, पहले ये काम मैं इस तरीके से करता था पर अब वो तरीका ही नहीं बचा"—मान लीजिए उस तरीके का नाम था शरीर, "पर अगर काम ज़रूरी है तो मैं उसको करने के लिए, दूसरा तरीका निकालूँगा न।" तो कोई दूसरा तरीका निकालिए। और ये जो मैं कह रहा हूँ वो करने की ऊर्जा फिर एक ही चीज़ से आती है इसका नाम प्यार है। थोड़ी शास्त्रीय भाषा में उसी को धर्म बोल देते हैं।

ज़मीनी तौर पर बोलें तो क्या बोलेंगे? कर रहे हैं क्योंकि प्रेम है। और शास्त्रीय तौर पर बोलें तो कहेंगे, कर रहे हैं क्योंकि यही हमारा धर्म है। अंतर दोनों में कुछ नहीं है।

और बिलकुल मैं आपकी बात समझ रहा हूँ, कि कोई स्थिति ऐसी आ सकती है कि कोई व्यक्ति बहुत हद तक मजबूर हो जाए। लेकिन अगर आपने वहाँ तक कोशिश कर ली, जहाँ तक आप फिर पूरी तरह ही मजबूर हो गए कि अब तो कुछ नहीं कर सकते, तो फिर आप बहुत चैन से, शांत बैठ सकते हैं। क्योंकि जवाब तो खुद को ही देना होता है न। आप अपने-आपको बता सकते हैं, कि, "आखिरी बूंद तक जो मैं कर सकता था मैंने किया और अगर अभी भी कुछ संभव है तो खोज रहा हूँ रास्ता, और करूँगा। फिर मेरी गलती नहीं।"

अभी थोड़ी देर पहले मैं कह रहा था न, ये छोटे हाथ ले कर ही तो पैदा हुए हैं, और बुद्धि भी ऐसी कोई हममें ख़ास होती नहीं, कि एक बार में ही सब समस्याओं को उखाड़ दें। तो इसमें कोई अपमान की बात नहीं है, कुछ छोटे नहीं हो गए हम, कि बहुत ज़्यादा हम परिणाम नहीं ला पाए, या किसी सीमा पर जा कर हमारे संसाधन चूक गए, ख़त्म हो गए। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है।

शर्म की बात है बेईमानी करने में। जो मैं कर सकता था मैंने वो भी नहीं किया। हमेशा यही सवाल पूछा करिए अपने आप से; "जो कर सकता हूँ उतना किया क्या?" उत्तर अगर 'हाँ' में आता है, यही समाधी है, यही मुक्ति है। उत्तर 'ना' में आता है, तो नर्क से बाहर निकलो। कहाँ के नर्क से? अपने ही भीतर के नर्क से। बेइमानी से बड़ा आतंरिक नर्क दूसरा नहीं है।

प्र३: जैसे किसी बड़े काम में अगर अपनी शक्ति लगा रहे हैं और उसके साथ-साथ कोई और समस्या आ जाती है, जैसे मैं जिस विभाग में हूँ वहाँ के मेरे उच्चाधिकारी बहुत घपलेबाजी करते हैं। तो यदि मैं इसमें कुछ बोलूँ तो वेतन काट देते हैं और लगता है गलत जगह अपनी ऊर्जा लगा रहा हूँ और न बोलूँ तो मन में अशांति बनी रहती है। ऐसे स्थिति में क्या करें?

आचार्य: इसका मैं तुम्हें क्या जवाब दूँ, मैंने इस्तीफ़ा देने से पहले तुमसे पूछा था क्या? ये तो अपनी समझ पर है न, अपने ईमान पर है, अपनी धार्मिकता पर है, अपनी सच्चाई, अपने प्यार पर है।

खरी-खरी बात कह रहा हूँ। मैं इसमें तुम्हें गुलाब-जामुन भी खिला सकता हूँ कुछ इधर का कुछ उधर का, कि, "देखो, ‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा', कण-कण में नारायण बसते हैं तो ये जो तुम्हारे धूर्त और घूसखोर अफ़सर हैं ये भी तो ब्रह्म स्वरुप ही हैं, क्या पता इसमें भी प्रभु की कुछ लीला हो। वो खा रहे हैं तुम भी खाओ और प्रसाद समझ कर दूसरों में भी बाँटों।" ये सब भी तुम्हें बोल सकता हूँ।

अब बेइमानी के बहाने तो हज़ारों निकल सकते हैं, निकालना चाहें आप तो। जिसे करना है वो कर जाता है। और मैं नहीं कह रहा हूँ कि तुम इस्तीफ़ा दे दो भाई, मेरे ऊपर मत डाल देना क्योंकि मैंने किसी से पूछ करके नहीं छोड़ा था। मेरी बात है, मेरी ज़िम्मेदारी है, उसका जो भी अंजाम होगा मैं भुगतूँगा। ये नहीं होना चाहिए कि, "ये आचार्य जी ने मेरी नौकरी छुड़वा दी, अब मैं क्या करूँ?"

तो आखिरी कर्म क्या है वो तो तुम्हें ही करना है। तुम जानों, मुझसे न पूछो, न वो मेरी ज़िम्मेदारी है। वीडियो पर इतना बड़ा डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) इसीलिए लगा होता है।

या तो जहाँ हो वहाँ पर ही सही काम करने का कोई तरीका निकाल लो, नहीं तो निष्कर्ष साफ़ है, बाहर निकलो। इसमें लाग लपेट क्या? इसमें जटिलता क्या? इसमें मैं तुमको क्या पेचीदगियाँ समझाऊँ कि. "नहीं देखो ऐसा करते हैं कि तुम न तबादले का आवेदन डाल दो। क्या पता जो तुम्हें नया इधर उधर विभाग वगैरह मिले उसमें इंद्र आदि देवता तुम्हारे अफ़सर हों। और नहीं मिल रहा हो सही तबादला तो नारद मुनि के हाथों कुछ सोर्स सिफ़ारिश लगवा दो।

ये पट्टी पढ़ाऊँ, चाहते हो? बात बहुत सीधी है, जहाँ हो वहाँ कोशिश कर के देख लो, सफल हो गए बहुत अच्छी बात, नहीं सफल हुए तो बाबा दूसरा रास्ता देखो।

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