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आओ तुम्हारा भविष्य बताएँ || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा जो सवाल है वो ज्योतिष और राशिफल, राशि-भविष्य या फिर न्यूमरोलॉजी (अंक-ज्योतिष), पाम-रीडिंग (हथेली-पढ़ना), फ़ेस-रीडिंग (चेहरा-पढ़ना) — इनके ऊपर सवाल है। आजकल में मैं जो देख रहा हूँ कि ये जो जुनून है भारत में, वो बहुत ज़्यादा बढ़ता जा रहा है। वो बहुत पहले से था। सैकड़ों सालों से या फिर सदियों से था। मैं उसकी हिस्ट्री (इतिहास) भी पढ़ रहा था कि कहाँ से वो आया था। लेकिन मैं देख रहा हूँ की अभी जो उसका ऑब्सेशन है, ये टेक्नोलॉजी के माध्यम से बढ़ाया जा रहा है।

जैसे मैं जिस समाज में आ रहा हूँ। तो अगर कोई रिश्ता करना है या फ़िर कोई काम के लिए, या फ़िर कोई भी चीज़; दुकान लेने या फ़िर गाड़ी लेनी है, गाड़ी लेते समय भी मुहूर्त दिखाया जाता है और उसके अंक के लिए भी बताया जाता है कि मेरा भाग्यशाली नम्बर कौनसा है। फ़िर रोज सुबह उठकर के लोग देखते हैं, अपना राशि-भविष्य कि आज मेरा दिन कैसा रहेगा? या मैंने ये चीज़ भी ध्यान दिया है; जैसे दीवाली ख़त्म होती है, और फ़िर जो नव-वर्ष आता है दूसरा दिन, नूतन वर्ष। तो उसमें पूरी पत्रिका आती है। और पूरे घर-परिवार, मिलकर के बारी-बारी से देखते हैं कि मेरा पूरा साल कैसा रहेगा? मेरे सम्बन्ध कैसे रहेंगे? मेरा काम कैसा रहेगा? पढ़ाई कैसी रहेगी? छोटे से लेकर के हर उम्र के व्यक्ति बहुत ज़्यादा रुचि लेते हैं।

और मैं आजकल जो देख रहा हूँ कि यूट्यूब खोलता हूँ या फिर गूगल में भी, कि एप्लीकेशंस आती हैं। सेलिब्रिटीज आते हैं और वो प्रचार करते हैं इन चीज़ों को भी कि मैंने ये उपयोग करना शुरू कर दिया। राशि-भविष्य मुझे पता चले फिर ज्योतिष के बारे में मुझे पता चला। और उससे मेरी ज़िन्दगी बदल गयी। मेरे सही निर्णय लेने लगी। तो ये समझना चाहता हूँ कि ये ऑब्सेशन कहाँ से है?

आचार्य प्रशांत: देखो, इंसान की जो मूल हालत है वहाँ से शुरू करते हैं। हम खोये हुए लोग हैं, हम भटके हुए लोग हैं। और ऐसी हालत हमारी जन्म से ही होती है। चूँकि हम नहीं जानते कि हम हैं कौन। तो हम ये नहीं जानते कि हमें जाना कहाँ है। क्या करना हमारे लिए उचित है। हम कुछ नहीं जानते, लेकिन फिर भी एक ज़िन्दगी मिली है जीने के लिए। जीना है ही, कैसे जीना है? जानते नहीं! तो फिर हम अन्धेरे में भटकते हैं, टटोलते हैं, कुछ पता चल जाए। ये जो पूरी बात है: ज्योतिष, राशिफल, माथे की रेखाएँ, हाथ की रेखाएँ, न्यूमरोलॉजी। ये न्यूमरोलॉजी का एक हिस्सा होता है जिसमें आजकल लोग अपना नाम ही बदल देते हैं? जैसे करण अपना नाम रख देगा – केआरएएनएन तो ये उसी में आता है? (प्रश्नकर्ता से पूछते हुए)

तो जीवन ग़लत है इतना तो समझ में आता है। दुख मिल रहा है इसका अनुभव होता है। चीज़ें ठीक नहीं जा रही हैं, इसके प्रमाण उपलब्ध हैं। ज़िन्दगी रोज़ ठोकर मारती है। कष्ट प्रतीत तो हो ही रहा है, हम इनकार नहीं कर पाते कि कहीं कुछ गड़बड़ है, भारी है। गड़बड़ क्या है? वो हमको पता नहीं! तो ऐसे में कोई दुकानदार आकर बोल देता है कि गड़बड़ ये है कि तुम्हारा नाम है न! ‘इसकी वर्तनी बदल दो', या कि तुम्हारे घर में रसोई का मुँह फ़लानी दिशा में है, रसोई का मुँह दूसरी तरफ़ कर दो। या शौचालय का आकार दुगुना कर दो; तुम्हारे जीवन की सारी समस्याएँ मिट जाएँगी।’ तो हमें लगता है कि आज़मा लेते हैं इसको भी। क्योंकि अपने बूते तो हमसे कुछ करा जा नहीं रहा। कुछ करेंगे तो तब न जब समझ में आएगा करना क्या है? तो समझ की कमी है! जीवन को चूँकि हम समझते नहीं, तो इसलिए जीवन की समस्याओं का हम फिर कोई भी ऊल-जलूल समाधान स्वीकार कर लेते हैं।

आपको कोई बीमारी हो गयी हो, आपको उसका कोई उपचार नहीं मिल रहा हो, तो आपने देखा है कि आप फिर बिलकुल तैयार हो जाते हैं, कोई कितना भी ऊटपटांग-वाहियात आपके सामने सुझाव लेकर के आए, आप उसे आज़माने लग जाते हैं। कैंसर के रोगी होते हैं, मान लीजिए उनकी आख़िरी अवस्था है। डॉक्टर ने कह दिया है अब कुछ हो नहीं सकता। इनके पास बस कुछ महीने बचे हैं जीने के लिए। उनकी बड़ी दयनीय हालत हो जाती है। नहीं तो दिख रहा है कि कुछ बहुत भयानक हो रहा है उनके साथ, लेकिन करें क्या उनको समझ में नहीं आता! फिर कोई आकर के बोलेगा कि बेर का रस ले लो, उसको भूसे के साथ उबाल के पी जाओ तो लाभ होगा, तो वो करेंगे।

बात हँसने की नहीं है, आप उनकी हालत समझिए! वो क्या करें? उन्हें पीड़ा हो रही है, उपचार कुछ मिल नहीं रहा है तो कोई उन्हें भूसा उबाल के पीने को भी कहेगा तो वो पी जाते हैं। उसी तरीक़े से भूसा उबाल के हम पी रहे हैं। हर आदमी डरा हुआ है, असुरक्षित है, कल न जाने क्या हो जाए? क्योंकि देखिए आज आपने जो चीज़ें पकड़ रखी हैं, वो सारी वही हैं जिन्हें काल छीन लेता है।

जिस चीज़ को काल छीन नहीं सकता, उसकी हमें कोई शिक्षा मिली नहीं है, उसकी ओर हमने ध्यान दिया नहीं है। जब आपकी ज़िन्दगी में हर चीज़़ ऐसी ही है जिसका कल कोई ठिकाना नहीं, तो कल को लेकर के भीतर बड़ी बेचैनी-शंका खड़ी हो जाती है कि कल न जाने क्या हो? अब ऐसे में एक बाबा जी आते हैं, लम्बी दाढ़ी और चेहरा तेज़ से बिलकुल जगमगा रहा है। और बड़े आत्मविश्वास के साथ कहते हैं कि तुम्हारा भविष्य मैं बताऊँगा और सुरक्षित भी कर दूँगा। तो आपको विश्वास करना पड़ता है, क्या करें? मरता क्या न करता!

एक रिश्ता है जीवन में जो बिलकुल ख़राब है। और आप जानते ही नहीं है कि रिश्ते बनाने कैसे हैं? आप जानते ही नहीं कि बिगड़े हुए रिश्तों को करना क्या है? ऐसे में कोई आ जाता है बाबा-शाबा वो बोलता है कि आओ मेरे पास आओ, मैं ये तुम्हें भस्म खिला दूँगा या फ़लाना तुम्हारा ग्रह ख़राब चल रहा है, ‘वो फ़लानी गृह की पूजा कर दूँगा। उसके बाद तुम्हारा पति तुम्हें छोड़कर के उधर नहीं जाएगा!’ तो देवी जी तैयार हो जाती हैं। क्योंकि देवी जी को दिख रहा है कि उनका पूरा संसार बिखर रहा है। शादी के आठ-दस साल हो चुके हैं, दो बच्चे हैं, पति कहीं और जा रहा है, इस समस्या का वास्तविक इलाज क्या है? देवी जी को पता नहीं। बाबा जी ने कहा कि वो गृह-शान्ति की ज़रूरत है। सरसों का तेल लेके आना, मुर्गे की बलि देंगे, पका के खाएँगे, सब ठीक हो जाएगा! देवी जी पहुँच जाती हैं कनस्तर लेकर। उन्हें लगता है इससे सब समस्याएँ दूर हो जाएँगी।

इसीलिए तुम पाते हो कि ऐसी चीज़ उन लोगों में और ज़्यादा पाई जाएगी जिनका काम अनिश्चय से भरा हुआ है, जैसे की फ़िल्म इंडस्ट्री। कुछ पता नहीं कि अगली पिक्चर जो आ रही है उसका क्या होगा? वो दो दिन में भी उतर सकती है और दो महीने भी चल सकती है। तो ये लोग महा अन्धविश्वासी हो जाते हैं। इसी तरह से स्टॉक, ट्रेडिंग वगैरह, जो लोग करते हैं उनमें भी अन्धविश्वास भरपूर पाया जाता है। भविष्य का ठिकाना नहीं न!

इन सब की उत्पत्ति हमारे मूल डर से है। और इस अज्ञान से डर का इलाज क्या है असली? डर का असली इलाज अध्यात्म है, लेकिन जहाँ कहीं असली इलाज होगा, वहाँ असली पीड़ा भी बर्दाश्त करनी होगी। हम असली पीड़ा बर्दाश्त करना नहीं चाहते। तो फिर हम धागे बाँधने वाले इलाज कर लेते हैं। कि हाँ बाह में धागा बांध लो इससे तुम्हारा काम हो जाएगा। नयी पीढ़ी बड़ी आकर्षित रहती है इन चीज़ों के लिए। ठीक कह रहे थे आप, अब एप्स आती हैं, अब एप्स पर बाबा लोग बता रहे हैं कि तुम्हें ऐसा करना चाहिए, तुम अपना ये कर लो, वो कर लो। क्योंकि नयी पीढ़ी तो और अध्यात्म की दिशा में खोखली है। आप अध्यात्म नहीं जानते, ये आपका चुनाव है लेकिन ज़िन्दगी को तो आप को जो सज़ा देनी है वो तो देगी न? कोई फ़र्क नहीं पड़ता आप आज की पीढ़ी के हैं या आज से सौ-साल पहले की।

आप भले ही अपनेआप को आधुनिक समझते हो जेन एक्स, वाई, ज़ेड , कुछ भी बोलते हों, लेकिन अस्तित्व के नियम तो आज भी वही हैं जो आज से दो हज़ार साल पहले थे। आप मॉडर्न (आधुनिक) हों, अल्ट्रा मॉडर्न हों, पोस्ट मॉडर्न हों, कुछ भी हों। आपके चित्त में भी वही वृत्तियाँ बैठी हुई है जो दो हज़ार, चार हज़ार, छह हज़ार साल पहले थीं। आप भी डरे हुए हैं, आशंकित हैं। और आपको भी अध्यात्म की उतनी ही ज़रूरत है, जितनी की किसी को हज़ारों साल पहले थी। और अध्यात्म के अभाव में आपका भी वही होगा जो सदा से किसी का होता आया है। क्या फ़र्क पड़ता है इससे कि आप अपनेआप को उबर कूल बोलते हैं?

ये भी एक अन्धविश्वास है कि अन्धविश्वासी बस पुरानी पीढ़ी होती है; ग़लत! ये जिसको हम आज की नयी फसल कहते हैं, ये गज़ब की अन्धविश्वासी हैं। और नए-नए तरीक़े के इनके अन्धविश्वास हैं। इन्होंने पुराने ही सुपरस्टीशंस को मोडरनाइज कर दिया है। जो चीज़ पहले केले के पत्ते पर होती थी। अब मोबाइल ऐप पर हो रही है, बस यही है। लेकिन काम वही चल रहा है बिलकुल। और सूचना-क्रान्ति के कारण इनके पास अन्धविश्वासों के क्षेत्र में भी बड़े चुनाव आ गए है – चॉइसेस! चॉइसेस बहुत अच्छी लगती है न! नयी पीढ़ी को, तो आप अपनी पसन्द का अन्धविश्वास चुन सकते हैं; 'मेरी मर्जी, माई चॉइस!' लिबरल लोग हैं भाई! तो अपनी लिबर्टी से अपनी पसन्द का अन्धविश्वास चुनते हैं। तोता-कार्ड, और? रीकी, और? बोलो-बोलो? और सब अन्धविश्वासों को! इन्होंने अब अंग्रेज़ी नाम दे दिए हैं। पुराने नाम नहीं, इनसे बोलो कुंडली, पंचांग। इनको पता नहीं कुछ! पंचांग ख़ैर अन्धविश्वास नहीं होता। सभी अन्धविश्वासों के नए नाम ऐसे-वैसे!

ये आगे भी चलता रहेगा। अगर मानव प्रजाति बची रही तो आज से तीन सौ-साल बाद भी यही रहेगा। क्योंकि मन थोड़े ही बदल जाना है, मन की मूलभूत संरचना थोड़े ही बदल जानी है। हमको चाहिए सिक्योरिटी (सुरक्षा), आश्वस्ति, एश्योरेंस और वो कोई आपको कैसे दे सकता है, जब आप अपने यथार्थ से ही परिचित नहीं हैं!

सारे अन्धविश्वास किसी-न-किसी तरीक़े से एक झूठी मानसिक सुरक्षा इकट्ठा करने के लिए होते हैं। आप डरे होते हैं भीतर से; आप अनिश्चित होते हैं भीतर से; तो आप कहते हैं, ‘दही चाट लो, इससे कुछ हो जाएगा! अच्छा सा लगता है! दही चाट लिया, दही चाट लिया!’ कुछ तो किया! नहीं तो क्या बोले अपनेआप से कि डर बहुत लग रहा है, हालत ख़राब है, जानते कुछ नहीं, काँपे जा रहे हैं और कुछ कर भी नहीं पा रहे। तो फिर हम कुछ करके दिखाते हैं। क्या करके दिखाते हैं? ज़िन्दगी जब चारों ओर से धमकाती है तो हम दही चाट लेते हैं! हम कहते हैं, 'देखा हमने भी कुछ करके दिखाया है।'

आन्तरिक राक्षस हर तरफ़ से हमको पीट रहे थे, तो ये है ज़िन्दगी को हमारा करारा जवाब! क्या? दही चाट लो! जब भीतर जितने असुर बैठे हुए हैं, वो चारो तरफ़ से हमको पीटते है। तो फिर हमें बहुत करारा पुरुषार्थ-युक्त, वीरता-पूर्ण जवाब देते हैं। हम कहते हैं, ‘थमो और देखो कि अब तुम्हारे साथ क्या होने जा रहा है! तुम जो मुझे इतना सता रहे हो, कोई भविष्य का खौफ़ दिखाकर , कोई वर्तमान की असुरक्षा दिखाकर, कोई रिश्तों का खोखलापन दिखाकर, तुम सब जो मुझे इतना डरा रहे हो, सावधान! अब मैं तुम पर प्रहार करने जा रहा हूँ! नहीं, दही नहीं, योगर्ट! (श्रोतागण हँसते हैं) योगर्ट थेरॉपी!

हम कूल हैं! पुलों पर नारियल फोड़ रहे हैं! क्या है? नारियल पानी अच्छी चीज़ है, पीने के लिए है, फोड़ने के लिए थोड़ी है। नाम पढ़ने मुश्किल हो जाते हैं, ‘सहगल’ नाम होगा, उसकी स्पेलिंग होगी — एसएआईजीवाईएल , ये बाबाजी ने करवाया है। बाबा जी जान गए है कि ये जो नाम इसका बदला है न ! ये पूरी दुनिया में मेरी कला का प्रचार कर देगा। क्योंकि सबको दिख जाएगा कि ये नाम बदलवाया तो किसी बाबे ने है। और खासतौर पर सेलिब्रिटीज का नाम बदला हो तो मज़ा ही आ जाता है! सब समझ जाते हैं कि क्या चल रहा है? लोग कहते हैं अगर इतने बड़े-बड़े लोग इस तरह कर रहे हैं, तो कुछ फ़ायदा होता ही होगा? हम भी कर लेते हैं, रिस्क कौन ले! अंगूठियाँ, कॉनसिक्रेटेड (पवित्र) मामलात, ये रखा है कॉनसिक्रेटेड नारियल पानी, चाहिए किसी को? और क्या-क्या चलता है? बताओ? बात मनोरंजक है मेरे भी ज्ञान में थोड़ी वृद्धि हो।

श्रोता: ह्यूमरोलॉजी?

आचार्य: अच्छा, न्यूमरोलॉजी! ये अच्छा है मैंने सोचा शायद चुटकुले सुनाकर के ठीक करते हैं!

श्रोता: पाराशर-लाइट, एक पाराशर-लाइट नाम से सॉफ्टवेयर आती है, उसके थ्रू (ज़रिए) भी लोग इस तरह की भ्रान्तियाँ फैला रहे हैं। बताते हैं यूएसए में डेवलप हुआ है। मेरे सिस्टम में भी उसको डाउनलोड किया पर मुझे उसमें कुछ लगा नहीं!

आचार्य: बाप रे! गज़ब!

श्रोता: लोग उसमें डर जाते हैं कि पता नहीं क्या नयी चीज़ सॉफ्टवेयर से निकलकर आएगी।

आचार्य: सॉफ्टवेयर से निकलकर आया है! पहले तो ये होता था कि सड़क किनारे वो बैठा हुआ है, बोल रहा है कौन इसका यकीन कगारे! अब तो सॉफ्टवेयर से निकला है, बाप रे बाप! भाई सॉफ्टवेयर तो तुम्हें ही लिखना है न? उसको जो बोल दोगे वो बता देगा। क्रैप इन, क्रैप आउट (बकवास अन्दर, बकवास बाहर), जो इनपुट दोगे वो उसमें से आउटपुट आ जाएगा। वो सॉफ्टवेयर क्या करेगा? उसकी अपनी थोड़ी चेतना है! ले-देकर के बात बहुत छोटी सी है, जिसका हम इतना भद्दा समाधान खोजते हैं। समस्या बस इतनी है कि हमारे पास जीने के लिए कोई माकूल वजह नहीं है। हमारी ज़िन्दगी, हमारे कर्म, हमारे रिश्ते किसी ठोस आधार पर नहीं खड़े हैं। हम बहुत डरे हुए हैं! और जब आप डरे होते हैं तो फिर किसी भी भद्दी जगह पर आप डर का निदान खोज सकते हैं। हम काँप रहे हैं! वही ताक़तें जो आपसे बाज़ार में उल्टी-पुल्टी शॉपिंग करा लेती हैं। वही ताक़तें जो आपको किसी व्यर्थ नौकरी में धकेल देती हैं, या ज़हरीले रिश्ते में बाँध देती हैं। वही ताक़तें हैं जो आपको अन्धविश्वास की ओर भी प्रेरित करती हैं। ये कौनसी ताक़त है? ये अज्ञान की ताक़त है। कौन-सा अज्ञान? भीतरी अज्ञान! हम अपनेआप को लेकर के आश्वस्त नहीं हैं, पक्के नहीं हैं, निर्णीत नहीं है।

हमें अपने ही बारे में कुछ नहीं पता। इसीलिए तो जब हमें स्वयं को भी देखना होता है तो दूसरों की आँखों से देखते हैं। बार-बार पूछते हैं न, ये ठीक किया न मैंने? पाया है? हमें तो ये भी नहीं पता हम दिखते कैसे है। आप सात-शृंगार कर लेंगे फिर किसी दूसरे से पूछते हैं; 'मैं ठीक लग रहा हूँ?' तुम्हारी आँखें नहीं हैं क्या अपनी? देख लो कैसे लग रहे हो। 'मैं मोटा तो नहीं लग रहा?' अब होओग तो लगोगे, नहीं तो नहीं लगोगे।

आध्यात्मिक न होने का कितना बड़ा खमियाज़ा भुगतना पड़ता है! हर तरह की मूर्खता के गुलाम हो जाते हैं हम। कोई भी आकर के आपसे कुछ भी बोल दे, न आप उसे पूरी तरह स्वीकार कर पाते हो, न सिरे से ख़ारिज कर पाते हो। मैं आपसे जो कुछ भी बोल रहा हूँ, ऐसा थोड़ी है कि अगर वो आपको ठीक भी लग रहा हो तो आप उसे पूरी तरह स्वीकार कर लेंगे। आप उसमें थोड़ी सी गुंजाइश छोड़ते हैं, कि नहीं इनकी बात ठीक है, ‘लेकिन रमोली वाले बाबा जी की बात भी… देखो ऐसा नहीं है; कॉनसिक्रेटेड (पवित्र) जामून होता है!’

शत-प्रतिशत कुछ नहीं है हमारे पास! न इनकार, न स्वीकार। हम किसी के नहीं हो पाते पूरी तरह से। तो इसलिए हम सबके ग़ुलाम हैं। न नकारने की हमारी हिम्मत है, न स्वीकारने का हममें प्रेम है, बीच के बिच्छु हैं। किसी से भी हमारी पूरी वफ़ा नहीं है। और कुछ भी हमारे लिए ऐसा नहीं है जो पूरी तरह अस्वीकार्य हो। कोई चीज़ होगी जिसको आप कहते होंगे, ‘नहीं, नहीं, नहीं, मुझे नहीं करनी, मुझे नहीं करनी!’ बस अभी समुचित, पर्याप्त आप पर दबाव नहीं डाला गया है, आप सबकुछ कर डालेंगे। आप किसी भी चीज़ से बहुत इनकार करते हो कि नहीं, 'ये काम तो मैं कर नहीं सकता।' बात बस इतनी सी है कि अभी पूरा दबाव पड़ा है या नहीं, या पूरा लालच दिखाया गया है या नहीं, सब कर डालेंगे! पूर्ण कुछ नहीं है हमारे भीतर। पूर्ण नकार जैसा कुछ नहीं है। कुछ भी सेंट परसेंट (सौ प्रतिशत), एब्सोल्यूट (पूर्ण) नहीं है। और ये जो ब्सोल्यूटनेस (पूर्णता) होती है, यही अध्यात्म का लक्ष्य होती है। उसके बिना हमारे पास नियम ही नहीं, उसके बिना हम आधार से ही हिल-डुल रहे हैं।

सोचिए आप बैठें हैं और आपके नीचे की ज़मीन लगातार, ऐसे-ऐसे तैर रही हो, हिल रही हो, आपको कैसा लग रहा होगा? आप लगातार सशंकित होंगे। आप कुछ जान नहीं पाएँगे, समझ नहीं पाएँगे, जीवन जीने लायक नहीं रहता। हम सारा समय बस रिस्क-मैनेजमेंट कर रहे होते हैं। ‘अच्छा, इससे भी रिश्ते ठीक रख लो, क्या पता कभी काम आ जाए? इससे भी नेटवर्किंग कर लो, उसकी बात थोड़ी सी सुन लो, थोड़ी सी उसकी बात भी सुन लो।’ किसी को अगर मना करना भी है, तो प्यार से मना कर दो। क्योंकि क्या पता आगे काम आ जाए! जिससे प्रेम भी करते हो उससे थोड़ी दूरी बनाकर रखो, सिक्योरिटी (सुरक्षा) ज़रूरी है।

अभी आजकल एक कैम्पेन (अभियान) चला हुआ है जिसमें कह रहे हैं कि शादी से पहले लड़कों को कानून की फ़लानी-फ़लानी दफ़ाओं का ज्ञान दिया जाना ज़रूरी है। कौन-कौनसी है वो धाराएँ? जिसमें बताया गया है कि… ४९८? (श्रोतागण उत्तर देते हैं) हाँ, ये सब हैं जो आपको पता होनी चाहिए वो क्रुएलिटी बाय हसबैंड (पति द्वारा क्रूरता) नहीं, क्रुएलिटी बाय वाइफ (पत्नी द्वारा क्रूरता) वाली, कि लड़कों को ये सब पता होना चाहिए कि एलिमोनी के क्या नियम है? और ये सब पता कर लो!

ये तो हमारे प्रेम की दशा है! कि विवाह से पहले ही आप कवच तैयार करते हो। और ज़रूरत पड़ती है क्योंकि आप नहीं जानते कि आप जिससे विवाह कर रहे हो, कल क्या करेगी? या क्या कल करेगा? तो आप पहले से ही सुरक्षा का प्रबन्ध करके रखते हो। 'ये चीज़ें अगर गड़बड़ हों तो देखो. पहले से ही मैंने सब ठीक करके रखा हुआ है।'

ग़लत जीवन जीने के दुष्परिणाम हैं ये सब! अन्धविश्वास बस यही थोड़े ही है कि किसी को हाथ की रेखाएँ दिखाईं और उसने कहा ऐसा-ऐसा होगा और आपने मान लिया। अन्धविश्वास इसमें भी तो है कि कोई व्यक्ति आपको दिखा, और आपने अन्धा विश्वास कर लिया कि ये व्यक्ति मेरे जीवन को अमृत कर देगा बिलकुल। ये भी तो अन्धा विश्वास है न? जिन भी चीज़ों में हम विश्वास रखते हैं। और हम सब बहुत सारी चीज़ों में विश्वास रखते हैं। रखते हैं कि नहीं? आप अपनेआप से पूछिए — उस विश्वास में सार्थकता कितनी है? वो सब भी तो अन्धविश्वास हैं!

कोई यहाँ ऐसा नहीं बैठा होगा जिसका कम से कम दस बातों में पूरा विश्वास न हो! आप परखिए उनमें से एक-एक बात को! आपको कैसे पता कि जिसमें आप विश्वास कर रहे हो उसमें कुछ दम भी है? और कहीं-न-कहीं आप जानते हैं कि उसमें दम नहीं है! चूँकि दम नहीं है, फिर भी विश्वास है इसलिए डर है! जहाँ डर है वहाँ बाबाजी की घुट्टी भी है।

आपके सामने कोई आता है एकदम ही मूर्खतापूर्ण बात बता दे, एकदम ही! बोलता है, ‘फ़लानी जगह है और मेरी मौसी जी थीं,उनको भूत चढ़ा करता था। मैं वहाँ पर लेकर के गया। तो उन्होंने उनके भूत को पहले प्रकट करा, फिर उसको आइसक्रीम खिलाई, फिर उसको नेटफ़्लिक्स का सब्सक्रिप्शन दिलाया। तो फिर वो खुश होकर चला गया!’ आपके सामने कोई ये बात एकदम गम्भीर शक्ल बनाकर के बोल दे, बिलकुल यही बात, आप पूरी तरह इनकार नहीं कर पाओगे। आपको शक भले ही हो जाएगा, ऐसा हो सकता है क्या? लेकिन आप में हिम्मत नहीं पड़ेगी कि आप खुलेआम बोल दो कि तुम बेवकूफ़ी की बात कर रहे हो! पूछिए अपनेआप से।

एकदम गम्भीर शक्ल बना कर, कोई व्यक्ति आपके सामने बड़े आत्मविश्वास से बोले – ‘मौसी जी पर भूत चढ़ता था, मैं उनको लेकर गया, वहाँ पर ओझा बैठा था। उसने हुई-हा कर-करके भूत बाहर निकाला, उसको सॉफ्टी खिलाई, फिर उसको मूवी दिखाई। तो भूत ने फ्लाइंग किस दी और भाग गया।’ आप मान लोगे! पूरी तरह नहीं, क्योंकि पूरा तो हमारे जीवन में वैसे भी कुछ नहीं है। पूरी तरह नहीं मानोगे, सन्देह के साथ मान लोगे, सन्देह रखोगे पर मान लोगे, पूरा कुछ है नहीं हमारे पास! और आदत बना ली है हमने इस चीज़ की, ऐसे ही जीने की। कुछ भी निश्चित नहीं है, लेकिन ठीक है चलते रहो। अरे, रुक क्यों नहीं जाते, रुककर के निश्चित क्यों नहीं कर लेते? कहा‌ंँ को भागने की इतनी जल्दी है कि कुछ पता नहीं लेकिन भागना ही है।

यहाँ बैठे हैं बहुत सारे जवान लोग पच्चीस के हो गए, तीस के हो गए, अभी निश्चित नहीं है कि सामने जिससे सम्बन्ध का प्रस्ताव आ रहा है, वो ठीक भी है या नहीं? कर ही लेते हैं यार! क्या? क्यों? निश्चित करने में, पक्का करने में, पूरी जिज्ञासा करने में, पूरी तरह जाचँने में, क्या आपत्ति है? हाँ, ठीक है कि तुम कितना भी जाँच लो, फिर भी हो सकता है कि कुछ कमी रह जाए जाँच में। हो सकता है कि आपकी पूरी जाँच-परख के बावजूद कहीं कुछ गड़बड़ हो जाए, बिलकुल हो सकता है! लेकिन इस बात की क्या माफी है की आपने जाँचा ही नहीं, कोई जिज्ञासा ही नहीं करी। जो कुछ भी सामने आया, बस कह दिया – 'ठीक ही होगा, ये भी सही है!' और एक विशेष प्रजाति होती है, उसके सामने कुछ भी बोलो, एकदम ही कोई आउटरेजियस (अपमानजनक) बात। तो बोलेंगे – ‘अच्छा जी!’ ये उनका तरीक़ा है बोलने का कि बात सही नहीं लग रही, लेकिन हम में दम नहीं है, कि इनकार कर दे इस बात से। तो कहते हैं ‘अच्छा जी!’ वो अचरज दिखाते हैं 'अच्छा जी' बोलकर, जैसे अचरज हुआ हो! आप उनको बोलिए नारियल के पेड़ पे अगर गोबर लेप दो तो उससे कमल का फूल खिलता है। तो कहेंगे, ‘अच्छा जी!’

एक मानसिक प्रयोग करके देखिए। आप के सामने एक सवाल आया है गणित का। आप कुछ नहीं जानते, क्या लिखा है? हल कैसे करना है? हल तो तब करोगे, जब सवाल समझ में आएगा! प्रश्न ही समझ में नहीं आ रहा, समाधान दूर है। आपके सामने चार-पाँच लोग आ जाते हैं दिखाने के लिए कि देखो, ऐसे हल किया जाएगा, ऐसे हल किया जाएगा, ऐसे हल किया जाएगा। आप क्या करेंगे? आप न तो किसी को कह पाएँगे, इसने ठीक हल करा है, न किसी को कह पाएँगे कि इसने ग़लत हल करा है। आपके लिए सबकुछ स्वीकार होगा। वैसे ही हमारी ज़िन्दगी है।

हम किसी भी चीज़ को लेकर के शत-प्रतिशत इनकार नहीं कर पाते क्योंकि हम किसी भी चीज़ को समझते ही नहीं हैं। अब प्रयोग को आगे बढ़ाइए। वो सवाल आप समझ गए, उसका समाधान भी आप समझ गए। अब आपके पास कोई आता है, कोई बेवकूफ़ी भरा समाधान लेकर के। अब आप क्या करेंगे? अब आप क्या करेंगे? अब आप हिम्मत के साथ और विश्वास के साथ इनकार कर देंगे। आप कहेंगे हटाओ, तुमने ग़लत करा है! हम इसलिए इनकार नहीं कर पाते!

कोई भी लॉजी आ जाए कचड़ा- लॉजी , भूसा- लॉजी , हमारे लिए सब लॉजी विज्ञान बन जाते हैं। और सब अपनेआप को यही बोलते हैं – ’द साइंस ऑफ प्रेडिक्टिंग योर फ्यूचर एक्यूरेटली फ्रॉम भूसा!’ (कूड़े से आपके भविष्य की सटीक भविष्यवाणी करने का विज्ञान!) साइंस , अब ये साइंस है! और आप इनकार नहीं कर पाते। क्योंकि हमें ख़ुद ही नहीं पता न, ज़िन्दगी का सवाल, उसका समाधान! सच को आप सच माने, तब न झूठ को झूठ कह पाएँगे! अभी तो सब मिश्रित हैं, सब गड़बड़ है, खिचड़ी बनी हुई है। सच में झूठ मिला हुआ है, हाँ में ना मिली हुई है। धुंधला-धुंधला सा है सब जीवन कोहरे के बीच! वहाँ सबकुछ चलता है।

इनकार और इकरार, ये ऐसे होते हैं जैसे नदी के दो तट। जिसे नकारना आ गया, वो भी बच जाता है। जिसमें सत्य के प्रति श्रद्धा आ गयी, वो भी बच जाता है। ये दोनों ही बच जाते हैं। इन्हीं को प्रेम मार्ग और ज्ञान-मार्ग कहा गया है। ज्ञानी झूठ को तत्काल पहचान के नकारता है, वो भी बच जाता है। वो एक तट पर है। प्रेम-मार्ग में सत्य के प्रति अगाध श्रद्धा होती है, वो भी बच जाता है, वो दूसरा तट है। बाक़ी सब बीच के होते हैं।

ये जो मिडिल रोडर्स होते हैं वो बीच के हैं। मिडिल ऑफ वॉट? द मिडिल ऑफ द रीवर! (किस के मध्य में? नदी के मध्य!) वहाँ डूब के मरोगे। लेकिन हमको लगता है मध्य में सुरक्षा है। हम कहते हैं 'वी आर द मिडलर्स।' हम अति नहीं करते और अति न करने का क्या अर्थ है? कि हम सच में और झूठ में सामंजस्य बैठा के रखते हैं। अगर हम पूरी तरह सच की तरफ़ चले जाएँगे, तो वो तो अति हो जाएगी न? और हमें बताया गया है कि अति नहीं करनी चाहिए! एक्स्ट्रीम्स (अति) नहीं लेनी चाहिए, ’द ट्रुथ इज ऑलवेज एन एक्स्ट्रीम’ (सत्य हमेशा चरम पर होता है)। जो अति नहीं कर सकता, सत्य उसके लिए नहीं है! जिसको सड़क के बीचों बीच ही चलना है, जिसको नदी के बीचों-बीच ही चलना है, वो बस मरेगा।

अपना किनारा पकड़िए, हिम्मत दिखाइए, किसी निष्कर्ष पर आइए। कब तक आप सच और झूठ को एक ही स्थान देते रहेंगे? आध्यात्मिक यात्रा में पहली चीज़ होती है विवेक। और विवेक का अर्थ होता है, एक को ऊँचा जानना, एक को नीचा जानना, एक को स्वीकार करना, एक को त्यागना। सार और असार का भेद, ग्राह्य और अग्राह्य का भेद। जिस व्यक्ति के लिए सबकुछ स्वीकार है, वो अध्यात्मिक कभी नहीं हो सकता!

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