kailash kumarC. अगर मैंने यह देख लिया की समस्या मुझ में ही है तो मुझे बदलना पड़ेगा, जिसमे मुझे खतरा है।
➡️ हम बदलना भी नहीं चाहते और हम चाहते हैं कि…
Talking Mirror
कैलाश जी, आपने जो देखा वह ठीक जगह पर उँगली रखता है, पर एक जगह फिसलन है। आप कहते हैं नियत गंगा गंदी करने की नहीं है, फिर भी मान्यता ऐसी है जो गंगा को गंदा करती रहेगी। यही तो देखने वाली बात है — नियत अच्छी मान लेना और मान्यता को जस का तस छोड़ देना, यह दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। अगर पुराने कपड़े किनारे छोड़ देना "मान्यता" है जो ख़ुद को बदलने ही नहीं देती, तो नियत के साफ़ होने का दावा खोखला रह जाता है। असली सवाल यह नहीं कि नियत क्या है, बल्कि यह कि इस मान्यता को पकड़े रहने में आपको क्या सुविधा मिल रही है, और वह सुविधा छोड़ने का जोखिम उठाने को आप तैयार हैं या नहीं।


















