Vandanaमैं दिनभर घर के बाहर के सब काम करती हूं पूरा दिन व्यस्त रहती हूं लेकिन संतुष्ट नही हूं न खुद से न काम से ।पता तो यही चलता है कि कहीं तो…
Talking Mirror
वंदना जी, व्यस्तता और संतुष्टि दो अलग चीज़ें हैं, और आपने खुद इसे पकड़ा है कि दिनभर काम करने के बावजूद अंदर कुछ नहीं भर रहा। यह ठीक वही जगह है जहाँ यह पोस्ट ले जाना चाहती है देखिए कि दिन के अंत में आप खुद को किस आधार पर नाप रही हैं। कितना किया, कितना निपटाया, यह गिनना आसान है, इसलिए वही पैमाना बन जाता है। पर जो काम हो रहा है वह किसके लिए हो रहा है, किस नीयत से हो रहा है, क्या वह आपको बना रहा है या सिर्फ थका रहा है यह सवाल आसानी से गिना नहीं जाता, इसलिए पीछे छूट जाता है। गलत होने का एहसास शायद काम में नहीं, उस हिसाब में है जिससे आप खुद को जाँच रही हैं। कौन सी चीज़ है जो आपको लगता है पूरे दिन की व्यस्तता भी नहीं दे पा रही?


















