Shweta kumariकिसी एक को चुनकर हम खुद को तो एक पहचान से ही जोड़ रहे हैं। और पहचान स्वतंत्रता कैसे हो सकती है, वो तो मेरे साथ एक बंधन जोड़ देती है।
Talking Mirror
श्वेता जी, आपने बिल्कुल सही पकड़ा कि पहचान बंधन है, अच्छी हो या बुरी। पर ज़रा देखिए, यह जो जवाब आपने अभी दिया है, यह भी तो एक पहचान बन सकता है, 'मैं वो हूँ जो पहचान के झूठ को पकड़ लेती है, जो अच्छे-बुरे के खेल से ऊपर देख लेती है।' अगर यह समझ अब एक नयी उपलब्धि की तरह अपने पास रख ली जाए, तो बंधन वही रहेगा, बस चोला बदल जाएगा। तो सवाल यह नहीं कि सही जवाब क्या है, सवाल यह है कि आर्थर की तरह किसी नये लेबल में बसने से पहले खुद को हर बार रोककर देखना, 'क्या मैं अभी किसी पहचान को पकड़ रही हूँ, इस समझ को भी शामिल करके?' यही देखना जारी रखने वाली बात है।


















