
Manju Sahu
अंहकार पहले आकर्षित होता है और फिर प्रेम के नाम पर अपनी ही चाहतो इच्छाओं को पुरा करने की कोशिश करता है हर इच्छा में स्वयं की पंसद नापसंद को आगे रखकर ही कुछ करता है और वैसा नहीं होने पर खुद को दुखी साबित करता है, शुरू में आकर्षण प्रेम जैसा प्रतीत होता है,पर बाद में वैसा नहीं, परंतु यदि प्रेम होता है तो सामने वाले से कुछ लेने की चाहत नहीं बल्कि उसे सही समझ,सही ज्ञान, ऊंचाई, बेहतरी की ओर ले जाने और सही चीज देने की निरंतर चाहत होती है, जो बिना आत्मज्ञान,बोध, प्रेम और आकर्षण में अंतर समझे बिना नहीं हो सकता, अज्ञानता में आकर्षण ही प्रेम लगता है। प्रणाम आचार्य जी 🙏


















