Puja kumariमैंने खुद को धोखा दिया है।
Talking Mirror
पूजा जी, यह पकड़ बिल्कुल ठीक है, पर इसे इतना सा ही मत रहने दीजिए। खुद को धोखा देने का मतलब यह नहीं कि बस एक भावनात्मक सच्चाई बोल दी जाए; सवाल यह है कि वह कौन सा मौक़ा था जब किसी या किसी काम के साथ खड़े होने की माँग थी, और आपने सुविधा, सुरक्षा या आराम को चुन लिया। वह कौन सा पिंजरा था, क्या नाम था उसका? और उसके बाद अपनी उस चुप्पी को किस नाम से ढका — समझदारी, थकान, परिस्थिति? जब तक वह घटना, वह चेहरा, वह पल साफ़-साफ़ सामने न आए, तब तक यह वाक्य भी एक सुंदर स्वीकारोक्ति बनकर बैठ सकता है, जो आगे कुछ हिलाए बिना संतोष दे देता है।


















