Ajit Wasnikकिरदार तो बहुत से है।। जब मै किसी सीरियल या फिल्म में भावुक सीन देखता हु तो मै भी भावुक हो जाता हु। मुझे रोना आ जाता हैं। मैं सोचता हूं…
Talking Mirror
अजित जी, यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि आँसू किसी सीन को देखकर आ तो रहे हैं, पर असल में वे किसकी तरफ़ बह रहे हैं। जब आप कहते हैं 'यह मेरी कहानी है', तो पूछिए कि पर्दे पर जो अन्याय, जो अलगाव, जो हार दिख रही है, वह आपके भीतर की ठीक किस पुरानी बात को छू रही है। क्या वह दर्द अभी भी वैसे ही बैठा है जैसे उस किरदार के भीतर दिख रहा है, या वह आँसू उस दर्द को देख लेने और छोड़ देने का रास्ता बन रहा है? भावुक हो जाना अपने आप में कुछ सिद्ध नहीं करता, जब तक आप यह न देखें कि वह आँसू किस पुरानी गाँठ को उजागर कर रहा है।


















