Damor Shankarbhaiमैने अक्सर लोगों को ओर खुदको ये बोलते हुए देखा हे ।
1. में तो गरीब हु , में क्या करूं ?
2. हम तो मजदूर लोग हे , इसीलिए मजदूरी ही करनी …
शंकरभाई, आपने खुद लिखा है, में ये हु, इसीलिए ये ऐसा हे। ज़रा देखिए इस वाक्य को गौर से, ये सीमा का बयान नहीं है, ये सीमा को कारण बना देना है। गरीबी एक हालत है, मजदूरी एक काम है, दिव्यांगता एक स्थिति है, लेकिन इसीलिए वाला शब्द इन सबको फैसला बना देता है, ऐसा फैसला जिसके बाद सोचने की ज़रूरत ही खत्म हो जाती है। लुई ब्रेल के सामने भी आँख की वही स्थिति थी, पर उन्होंने में अंधा हु इसीलिए कुछ नहीं कर सकता नहीं कहा, उन्होंने बिंदुओं को देखा। फ़र्क हालत का नहीं था, फ़र्क इस इसीलिए को स्वीकार करने या न करने का था। आज जो आपने देख लिया, कि पहचान वही बन गई जो सीमा थी, यही देखना काफी नहीं है, अब सवाल यह है कि कल जब फिर वही वाक्य मन में आएगा, में ऐसा हु इसीलिए, तो उस पल आप उसे रोकेंगे या फिर से मान लेंगे। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















