
कर्ण ने दुर्योधन को अधर्म करते वक्त विरोध भी किया है,कर्ण अंग का राजा जरुर था पर वो इतना भी लाचार नहीं था कि मित्र के हर बात मे सहमती दे,कर्ण के अभेद्य कवच कुंडल को देखकर दुर्योधन ने उसे राजा बनाया था, दुर्योधन का स्वार्थ था,पर कर्ण के मन मे वो बात ही नहीं थी, दुर्योधन ने हमेशा कर्ण पर किया उपकार जताना भी चाहा,पर कर्ण सर का ताज त्याग कर जाने को तैय्यार था, फिर दुर्योधन रोक लेता, दुर्योधन का स्वार्थ था और कर्ण कि सच्ची मित्रता थी, जीवन भर कर्ण ने दुर्योधन को छल,कपट और अधर्म से दूर रहने की सलाह दी है, सच्चे मित्र की यही पहचान हैं, कर्ण वचन से ना बंधा होता तो वो दुर्योधन को छोडता भी, पर फिर भी आज इतिहास कर्ण को गद्दार और अधर्मी ठहराता,आज हम ही कहते "मित्र का वचन नहीं निभाया और राज्य के लिये अपने सगे भाईयों के तरफ आया गद्दार कही का", इतिहास मे यही कर्ण की पहचान होती,कर्ण का आज नाम जितने आदर के साथ लेते हो, उतना दुर्योधन का नाम कोई नहीं लेता, कर्ण पर कितनी किताबे है, क्या दुर्योधन पर है??कर्ण पर पूरी किताब लिखो तो,कर्ण की गलती सिर्फ "एक वाक्य में सिमीत हो जायेगी",इतनी अच्छाईया थी,कर्ण का अपना स्वार्थ नहीं था, दुर्योधन के कपट का कर्ण शिकार बना है, दुर्योधन की बूरी नियत मे कर्ण फसा,कर्ण निष्कपट था, निर्मोही था🥹!!♥️ कृष्ण ♥️


















