uday dangi जब मैं रोड पर जाता हूं कोई व्यक्ति दिखता है जिसे मैं जानता हूं वो मुझे जानता है नाम से तो एक झूठी मुस्कुराहट देने का अंदर से आता है और …
Talking Mirror
उदय जी, ध्यान दीजिए कि असहजता मुस्कुराने में नहीं, उस हिसाब-किताब में है जो भीतर चल पड़ता है — 'अगर नहीं मुस्कुराया तो वह क्या सोचेगा'। यह डर किसी वास्तविक नापसंदगी से नहीं, बल्कि इस बात से है कि दूसरे के मन में आपकी एक छवि बनी रहे, अच्छी छवि। मुस्कुराहट झूठी तब लगती है जब वह सहजता से नहीं, बल्कि उस छवि को बचाने की चिंता से आती है। सवाल यह नहीं कि सामने वाला क्या सोचेगा, सवाल यह है कि आप उसकी राय के सामने अपने होने को क्यों दांव पर लगा देते हैं। जिस दिन यह परवाह गिरेगी, मुस्कान आएगी तो सच्ची आएगी, न आई तो भी कोई बोझ नहीं रहेगा।


















