Ankita pal ha mujhe bhi yesa hi mahasus hota hai ki ye mera chunav nahi hai phir bhi mai us kam ko kar rahi hoti hu
Talking Mirror
अंकिता जी, यह देख पाना ही अपने आप में बड़ी बात है, कि हाथ वही कर रहा है जो मन असल में नहीं चुन रहा। पर एक बात पर ठहरिए, जब आपने कहा फिर भी मैं वो काम कर रही होती हूँ, वहाँ भी ज़रा गौर करें, क्या वहाँ भी किसी की स्वीकृति की वही चाह काम कर रही है, कि कम से कम दिखने में तो चूकना नहीं है। देखना सस्ता नहीं है, देखने के बाद भी वही आवाज़ें फिर से हावी हो जाना, यह उतना ही सच है जितना देख लेना।


















