
अद्वैत वेदांत के अनुसार दूसरा कोई नहीं है अगर हम इस आधार पर देखें तो हमारे द्वारा किया जाने वाला हर एक काम प्रकृति को प्रभावित कर रहा है हमारी बेचैनी हमें और स्थिर करती है और वह स्थिरता धीरे-धीरे बढ़कर प्रकृति की अस्थिरता हो गई है, जो इस पिंड में है वही इस ब्रह्मांड में है हमारी बेचैनी हमें और ज्यादा लालची बनती है यह इधर उधर भागती है और ज्यादा उपभोग करवाती है और जब भोग बढ़ता है तो दूसरी आपदाएं भी बढ़ती है जिस प्रकार से समुद्र की एक लहर ही दूसरी लहर को जन्म देती है उसी प्रकार हमारी आंतरिक बेचैनी भी प्रकृति को बेचैन कर रही है और उसका परिणाम हमें क्लाइमेट चेंज के रूप में देखने को मिल रहा है। अगर क्लाइमेटचेंज को रोकनाहै तो सबसे पहले हमें स्वयं को समझाना पड़ेगा स्वयं को सही दिशा देनी पड़ेगी हमारी सही दिशा ही प्रकृति की सही दिशा निर्धारित करेगी क्योंकि हम स्वयं को तो दिशा निर्देशित कर सकते हैं लेकिन प्रकृति की दिशा बदल गई तो उसको रोकना हमारे लिए संभव नहीं है।


















