Brahma kumari Raoजो जीवन मैं जी रही थी उसे कभी मैने परखा ही नहीं , या यूं कहूं
परखना भी होता है यह तो पता ही नहीं था।मुझे तो लगता था कि बस यही है जीवन…
Talking Mirror
राव जी, आपने लिखा कि जो जीवन जिया वो व्यर्थ चला गया। यहीं ज़रा ठहरिए। जिस बोध से आप आज पीछे देख पाईं कि वो जीवन बिना परखे जिया गया, वही बोध तब नहीं था, इसीलिए वो समय व्यर्थ नहीं गया, वो ज़मीन थी जिस पर यह पहचान खड़ी हुई है। व्यर्थ कहना उस यात्रा को खारिज करना है जिसने आपको यहाँ तक लाया। अब शेष जीवन बोध से जीना है, यह एक तय दिशा है, इसे रोज़ की ज़िद बनाइए, सत्रों और आचार्य जी की वाणी से जुड़े रहिए, वहीं यह बोध बना रहेगा और गहराता जाएगा। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















