
मै भी एक छोटे से गांव की हु एक मै ही हु गांव में शायद जो आचार्य जी को सुनती हु और लोगो तक उनकी बातें पहुंचाई हु लेकिन आचार्य जी को कोई सुनने को तैयार नहीं घर में भी मैने अथक प्रयास की हु हसबैंड को भी सुनने बोली हसबैंड ने कहा टकला तुमको बिगाड़ के रख दिया इसके लिए मैने लड़ाई भी की क्यों मेरे आचार्य जी ke बारे में ऐसे नहीं बोलो हर रोज मै प्रयास करती हु घर के लोगों से सब मेरा मजाक उड़ाते हैं और कहते है ज्ञान बांटने aa गई हैं कोई उनको सुनने को तैयार नहीं है दूध मांस खाने नहीं बोलती तो सब बोलते है इधर के चांद उधर हो जाएगा लेकिन खायेंगे ही लेकिन अब मै लोगों से कहना छोड़ दी हु घर के क्योंकि मैं 1 साल सो सबको बोल रही हु कोई सुनने को तैयार नहीं उल्टा मेरा ही मजाक बना देते हैं लेकिन मुझे उनलोगों पे तरस आता है कि ये लोग की कितने बेहोश हैं इनकी चेतना कितने छोटे ताल पे है


















