
बबीता जी, आपने जो लिखा उसमें एक बात साफ़ पकड़ में आती है, आप बार बार यह कह रही हैं कि योग्यता नहीं थी, कुछ कर नहीं पाई, अज्ञानता और आसक्ति की वजह से किसी को अच्छी ज़िंदगी नहीं दी, और साथ ही यह भी कह रही हैं कि परिवार ने पूरी आज़ादी दी, पूरा साथ दिया। तो सहारा तो पूरा मिला, कमी अपनी तरफ़ से मानी जा रही है, यह ईमानदार देखना है, इसे कमज़ोरी की तरह मत लीजिए। अब जब आप कह रही हैं कि आचार्य जी मिल गए तो सब हो जाएगा, वहाँ ज़रा ठहरिए। जो अभी लिख पाईं, जो पकड़ पाईं, उसी को रोज़ की सुनने और देखने की आदत बनाइए, सत्र देखिए, जो उपलब्ध है उससे जुड़े रहिए। बाहर आना शुरुआत है, चलते रहना असली काम है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















