
मोबाइल से मिलने वाले आनंद की शुरुआत जिज्ञासा से होती है, लेकिन धीरे-धीरे वही हमें अपने बंधन में ले लेता है। ऐसा इसलिए नहीं कि केवल मोबाइल में कोई समस्या है, बल्कि इसलिए कि हम अपने ही साथ सही संबंध नहीं बना पाए हैं। मन जहाँ थोड़ा-सा भी सुख, आराम या मनोरंजन दिखता है, उसी की ओर दौड़ पड़ता है। जब हमारा केंद्र अहंकार और कामनाओं से संचालित होता है, तब हम सहज ही सस्ते और तात्कालिक उपायों को पकड़ लेते हैं। ऐसे में यदि माता-पिता स्वयं अपने भीतर स्पष्टता और स्थिरता विकसित नहीं कर पाए हैं, तो वे बच्चों को भी वही दे पाएँगे जो उनके पास है। इसलिए सबसे आवश्यक है कि हम अपने केंद्र को समझें, उसे बोधगम्य करें। यही बच्चे के प्रति सबसे बड़ा उत्तरदायित्व है, क्योंकि बच्चा उपदेश से कम और उदाहरण से अधिक सीखता है। वह वही बनता है, जो वह अपने सामने जीते हुए देखता है।


















