
मेरे जीवन में ऐसी कई कामनाएँ हैं, जिनसे जुड़े विचारों को मैं बार-बार पकड़े रहता हूँ। कभी सोचता हूँ कि मैं एक अच्छा अधिकारी या मैनेजर बनूँ, कभी कंटेंट क्रिएटर, कभी यूट्यूबर, कभी सोशल मीडिया पर कुछ बड़ा करूँ, कभी जिम जाकर शरीर बनाऊँ, कभी गाँव जाकर खेती करूँ या कहीं नई शुरुआत करूँ। इनमें से कई इच्छाएँ अपने-आप में गलत नहीं हैं। समस्या यह है कि मैं उन्हें वास्तविक कर्म में बदलने के बजाय उनके विचार और कल्पना में ही जीने लगता हूँ। मन में ही मैं सफल हो जाता हूँ, शरीर बना लेता हूँ, बड़ा अधिकारी बन जाता हूँ, लोगों को प्रभावित कर देता हूँ—लेकिन वास्तविक जीवन में उसके लिए आवश्यक कदम नहीं उठाता। यहीं मेरी दुर्दशा शुरू होती है। विचार मुझे थोड़ी देर का सुख देता है, लेकिन कर्म से बचाता है। एक कल्पना पूरी होते ही दूसरी कल्पना शुरू हो जाती है और मेरा उद्देश्य भी बदलता रहता है। इसलिए अब मुझे अपनी हर इच्छा से यह पूछना है— > “क्या मैं इसे वास्तव में जीना चाहता हूँ, या सिर्फ इसके बारे में सोचकर मिलने वाले सुख को जीना चाहता हूँ?” अगर वास्तव में चाहिए, तो कल्पना कम और कर्म अधिक करना होगा। वरना मेरी कामनाएँ ही मेरे लिए एक ऐसी दुनिया बनाती रहेंगी, जिसमें मैं सब कुछ पा लेता हूँ—लेकिन वास्तविक जीवन में कुछ भी नहीं बदलता।


















