Dipti Sharma१) पहले था ऐसा कि मैं दूसरे के देखे अपनी पहचान बनाती थी । पर अब ये कम है।
२)अब जब मैं किसी को देखती हूँ तो उसकी पहचान अपने हिसाब से नही…
Talking Mirror
दीप्ति जी, दूसरा वाला कदम पहले से भी ज़्यादा असली है। किसी को देखकर 'बेचारा' या 'किस धर्म का' उठे विचार को पकड़कर उससे पूछ लेना, ये तुरंत फैसला सुनाने से रुक जाना है। और यही अष्टावक्र वाली बात है, न, कि जो धारणा उठी उसे तुरंत सच मान लेने के बजाय पहले उसे ही देख लेना कि यह उठी कहाँ से। बस एक बात ध्यान देने की है, जब आप खुद से पूछती हैं ऐसा क्यों सोचा, तो वो पूछना जाँच के लिए हो, फैसले पर मोहर लगाने के लिए नहीं। जैसे कोई जज खुद अपने ही फैसले को दोबारा पढ़े, बस देखने के लिए कि गलती कहाँ हुई, सज़ा तो पहले ही तय है। सवाल वहीं तक रहे तो देखना जिंदा रहता है।


















