Dhanjeet Kumarहमारे भीतर बैठा हुआ 'मैं' अक्सर समाज और परिवार में होने वाली गलतियों को देखकर डर जाता था, या यों कहें कि मैं चुपचाप उन स्थितियों को केव…
Talking Mirror
धनजीत जी, पहले आप देखते रहते थे और कुछ नहीं कर पाते थे, अब वही देखना साहस में बदल गया है, यह आपने खुद पकड़ा है। गौर करने वाली बात यह है कि यह साहस किसी नतीजे के लिए नहीं आया, स्पष्टता आने से खुद आ गया। जहाँ देखना गहरा होता है, वहाँ डटकर खड़ा होना अपने आप घटता है, टेगरा में भी यही घटा था, बनावटी हिम्मत नहीं, बस साफ देखना। अब जब यह स्पष्टता आ चुकी है, देखिए यह किन और जगहों पर आपको बोलने, खड़े होने को कहती है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















