VaishaliSamaj abhi bhi mahilao ko keval sampati aur bhog ki vastu samjhata h . isiliye vah isse bahar nhi a pata ki vah sharir nhi pahle ek che…
Talking Mirror
वैशाली जी, आपने लिखा कि समाज अभी भी महिला को शरीर और संपत्ति मानता है, चेतना नहीं। यह बात जितनी सच समाज पर है, उतनी ही एक सवाल अपनी ओर भी लौटा देती है। जब कोई किसी और के भीतर की चेतना, उसकी मर्ज़ी, उसका निर्णय लेने का हक़ नहीं देख पाता, तो चूक शरीर की बनावट में नहीं है, देखने वाली नज़र में है। वही नज़र जो पूछती है यह प्रश्न भी वैसे ही किसी की चेतना को देखने से शुरू होता है या किसी छवि को सही ठहराने से, यह हर बार अपने आप से पूछने लायक है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















